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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 843

७९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
§ § अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मे भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥ १८ ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥
(१३) जो किसीसे द्वेष नहीं करता, जो सब भूतोंके साथ मित्रतासे बर्तता
है, जो कृपालू है, जो ममत्व-बुद्धि और अहंकारसे रहित है, जो दुःख और सुखमें
समान है, एवं जो क्षमाशील है, (१४) जो सदा संतुष्ट, संयमी तथा दृढ निश्चयी है,
जिसने अपने मन और बुद्धिको मुझमें अर्पणकर दिया है, वह मेरा (कर्म-)योगी
भक्त मुझको प्यारा है। (१५) जिससे न तो लोगोंको क्लेश होता है और न जो
लोगोंसेभी क्लेश पाता है, ऐसेही जो हर्ष, क्रोध, भय और विषादसे अलिप्त है, वही
मुझे प्रिय है। (१६) मेरा वही भक्त मुझे प्यारा है, कि जो निरपेक्ष, पवित्र और
दक्ष है, अर्थात् किसीभी कामको आलस्य छोडकर करता है, जो (फलके विषयमें)
उदासीन है, जिसे कोईभी विकार डिगा नहीं सकता, और जिसने (काम्य फलके)
सब आरंभ याने उद्योग छोड़ दिये हैं। (१७) जो न (किसीभी बातका) आनंद
मानता है, न द्वेष करता है, जो न शोक करता है और न इच्छाभी रखता है, जिसने
(कर्मके) शुभ और अशुभ (फल) छोड़ दिये हैं, वह भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय
है। (१८) जिसे शत्रु और मित्र, मान और अपमान, सर्दी और गर्मी, सुख और
दुःख समान हैं, और जिसे (किसीमेभी) आसक्ति नहीं है, (१९) जिसे निंदा
और स्तुति दोनों एकसी हैं, जो मितभाषी है, एवं जो कुछ मिल जावे उसीमें संतुष्ट
है, जिसका चित्त स्थिर है, और जो अनिकेत है अर्थात् जिसका (कर्म-फलाशारूप)
ठिकाना कहींभी नहीं रह गया है, वह भक्तिमान् पुरुष मुझे प्यारा है।