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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 627, कुल 956 में से

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पृष्ठ 627

५८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
(मि. प्र. ३. ७ २) यहभी कहा है, कि "किसी मनुष्यकी सारी उम्र दुराचरणोंमे
क्यों न बीत गई हो; परंतु मृत्युके समय यदि वह बुद्धकी शरणमें जावे, तो उसे स्वर्गकी
प्राप्ति अवश्य होगी"; और सद्धर्मपुंडरीकके दूसरे तथा तीसरे अध्यायोंमें इस
बातका विस्तृत वर्णन है, कि सब लोगोंका "अधिकार, स्वभाव तथा ज्ञान एकही
प्रकारका नहीं होता; इसलिये अनात्मपर निवृत्ति-प्रधान-मार्गके अतिरिक्त भक्तिके
इस मार्गको (यान) बुद्धनेही दया करके अपनी-"उपायचातुरीमे निर्मित किया है।"
स्वयं बुद्धके बतलाये हुए इस धर्म-तत्त्वको एकदम छोड़ देना कभीभी संभव नहीं
था, कि निर्वाणपदकी प्राप्ति होनेके लिये भिक्षु-धर्महीको स्वीकार करना चाहिये;
क्योंकि यदि ऐसा किया जाता, तो मानो बुद्धके मूल उपदेशपरही हरताल पोता जाता।
परंतु यह कहना कुछ अनुचित नहीं था, कि भिक्षु हो गया तो क्या हुआ; उसे जंगलमें
'गैंडे'के समान अकेले तथा उदासीन न बने रहना चाहिये; किंतु धर्मप्रसार आदि
लोकहित तथा परोपकारके काम 'निरिस्सित' बुद्धिमे करते जानाही बौद्ध भिक्षुओंका
कर्तव्य है;† इसी मतका प्रतिपादन महायान-पंथके सद्धर्मपुंडरीक आदि ग्रंथोंमें
किया गया है; और नागसेनने मिलिंदसे कहा है, कि "गृहस्थाश्रममें रहते हुए निर्वाण-
पदको पा लेना बिल्कुल अशक्य नहीं है - और इसके कितनेही उदाहरणभी है"
(मि. प्र. ६. २. ४)। यह बात किसीकेभी ध्यानमें सहजही आ जायगी, कि ये विचार
अनात्मवादी तथा केवल संन्यास-प्रधान मूल बौद्ध धर्मके नहीं हैं, अथवा शून्यवाद
या विज्ञान-वादको स्वीकार करकेभी इनकी उपपत्ति नहीं जानी जा सकती; और
पहले पहल अधिकांश बौद्ध धर्मवालोंको स्वयं मालूम पड़ता था, कि ये विचार बुद्धके
मूल उपदेशसे विरुद्ध हैं। परंतु फिर यही नया मतही स्वभावमे अधिकाधिक लोकप्रिय
होने लगा; और बुद्धके मूल उपदेशके अनुसार आचरण करनेवालेको 'हीनयान'
(हल्का मार्ग) तथा इस नये पंथको 'महायान' (बड़ा मार्ग) नाम प्राप्त हो
गया।* चीन, तिब्बत और जापान आदि देशोंमें आजकल जो बौद्ध धर्म प्रचलित
† सुत्तनिपातमे खग्गविसाणसुत्तके ४१ वे श्लोकका ध्रुवपद "एको चरे
खग्गविसाणकप्पो" है। उसका यह अर्थ है, कि खग्गविसाण याने गेंडा और उसीके
समान बौद्ध भिक्षुको जंगलमें अकेले रहना चाहिये।

  • हीनयान और महायान-पंथोंका भेद बतलाते हुए डॉक्टर केर्नने कहा है, कि:-
    "Not the Arhat, who has shaken off all human feeling, but the
    generous self-sacrificing, active Bodhisattva is the ideal of the
    Mahayanists, and this attractive side of the creep has, more per-
    haps than anything else, contributed to their wide conquests, whereas
    S. Buddhism has not been able to make converts except where the
    soil had been prepared by Hindusism and Mahayanism"-Manual
    of Indian Buddhism, p. 69. Southern Buddhism अर्थात् हीनयान है।
    महायान-पंथमे भक्तिकाभी समावेश हो चुका था। "Mahayanism lays