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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 581, कुल 956 में से

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पृष्ठ 581

मन कभी-सा है। ब्रह्मसूत्रके उक्त दोनों स्थानोंके (ब्र. सू. २. ३. ४५; ४. २. २१)
विषयमें इस प्रसंगपरभी अवश्य ध्यान देना चाहिये - जीवात्मा और परमात्माके
परस्पर-संबंधका विचार करते समय, पहले "नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः"
(ब्र. सू. २. ३. १७) इस सूत्रसे यह निर्णय किया है, कि सृष्टिके अन्य पदार्थोंके
समान जीवात्मा परमात्मासे उत्पन्न नहीं हुआ है; उसके बाद "अंशो नाना-
व्यपदेशात्०" (ब्र. सू. २. ३. ४३) सूत्रमें यह बतलाया है, कि जीवात्मा पर-
मात्माहीका 'अंश' है; और आगे 'मंत्रवर्णाच्च' (ब्र. सू. २. ३. ४४) इस प्रकार
श्रुतिका प्रमाण देकर अंतमें "अपि च स्मर्यते" (ब्र. सू. २. ३. ४५) - "स्मृतिमेंही
यही कहा है" - इस सूत्रका प्रयोग किया गया है। सब भाष्यकारोंका कथन
है, कि यह स्मृतिही गीताका "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः" (गीता
१५. ७) यह वचन है। परंतु इसकी अपेक्षा अंतिम स्थान (अर्थात् ब्रह्मसूत्र ४. २.
२१) औरभी अधिक निस्संदेह है। यह पहलेही, दसवें प्रकरणमें, बतलाया जा
चुका है, कि देवयान और पितृयाण गतियोंमें क्रमानुसार उत्तरायणके छः महीने
और दक्षिणायनके छः महीने होते हैं; और उनका अर्थ काल-प्रधान न करके बाद-
रायणाचार्य कहते हैं, कि इन शब्दोंसे तत्कालाभिमानी देवता अभिप्रेत हैं (वे. सू.
४. ३. ४)। अब यह प्रश्न हो सकता है, कि दक्षिणायन और उत्तरायण शब्दोंका
काल-वाचक अर्थ क्या कभी लियाही न जावे ? इसलिये "योगिनः प्रति च स्मर्यते"
(ब्र. सू. ४. २. २१) अर्थात् ये काल "स्मृतियोंमें योगियोंके लिये विहित माने
गये हैं" इस सूत्रका प्रयोग किया गया है; और गीतामें (गीता ८. २३) यह बात
साफ़ साफ़ कह दी गई है, कि "यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः" - ये
काल योगियोंको विहित हैं। इससे भाष्यकारोंके मतानुसार यही कहना पड़ता है,
कि उक्त दोनों स्थानोंपर ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे भगवद्गीताही विवक्षित है।
परंतु जब यह मानते हैं, कि भगवद्गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका स्पष्ट उल्लेख है;
और ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे भगवद्गीताका निर्देश किया गया है; तो दोनोंमें
काल-दृष्टिसे विरोध उत्पन्न हो जाता है। क्योंकि भगवद्गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका साफ़
साफ़ उल्लेख है, इसलिये ब्रह्मसूत्रोंका गीताके पहले रचा जाना निश्चित होता है,
और ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे गीताका निर्देश माना जाय तो गीताका ब्रह्मसूत्रोंके
पहले होना निश्चित हुआ जाता है। ब्रह्मसूत्रोंका एक बार गीता पहले रचा जाना
और दूसरी बार उन्हीं सूत्रोंका गीताके बाद रचा जाना संभव नहीं। अच्छा, अब यदि
इस झगड़ेसे बचनेके लिये गीताके 'ब्रह्मसूत्रपदैः' शब्दसे शांकरभाष्यमें दिये हुए अर्थको
स्वीकार करते हैं, तो 'हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः' इत्यादि पदोंका स्वारस्यही नष्ट हो
जाता है; और यदि यह मानें, कि ब्रह्मसूत्रोंके 'स्मृति' शब्दसे गीताके अतिरिक्त
कोई दूसरा स्मृति-ग्रंथ विवक्षित होगा; तो यह कहना पड़ेगा, कि सभी भाष्यकारोंने
भूल की है। अच्छा; यदि उनकी भूल कहें; तोभी यह बतलाया नहीं जा सकता, कि