श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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यह समझ ठीक नहीं। संसारमें जो कुछ आँखोंसे दीख रहा है, उसके परे जाकर इन
गहन प्रश्नोंका यथाशक्ति शास्त्रीय रीतिसे विचार करनेके लियेही वेदान्तशास्त्र प्रवृत्त
हुआ है, कि "मै कौन हूँ ? इस सृष्टिकी जड़में कौनसा तत्त्व है? इस तत्त्वसे मेरा
क्या संबंध है ? इस संबंधपर ध्यान दे कर इस संसारमें मेरा परम साध्य या अंतिम
ध्येय क्या है ? इस साध्य या ध्येयको प्राप्त करनेके लिये मुझे जीवनयात्राके किस
मार्गको स्वीकार करना चाहिये, अथवा किस मार्गसे कौनसा ध्येय सिद्ध होगा?"
बल्कि निष्पक्ष-दृष्टिसे देखा जाय तो यह मालूम होगा, कि समस्त नीतिशास्त्र अर्थात्
मनुष्योंके पारस्परिक व्यवहारका विचार उस गहन शास्त्रकाही एक अंग है। सारांश
यह है, कि कर्मयोगकी उपपत्ति वेदान्तशास्त्रहीके आधारपर की जा सकती है, और
अब संन्यास-मार्गीय लोग चाहे कुछभी कहें, परंतु इसमें संदेह नहीं, कि गणितशास्त्रके
जैसे - शुद्ध गणित और व्यावहारिक गणित ये दो भेद हैं, उसी प्रकार वेदान्तशास्त्र-
केभी दो भेद शुद्ध वेदान्त और नैतिक अथवा व्यावहारिक वेदान्त होते हैं। कांट तो
यहाँ तक कहता है, कि मनुष्यके मनमें 'परमेश्वर' ( परमात्मा ), 'अमृतत्व' और
( इच्छा ) 'स्वातंत्य'के संबंधके गूढ़ विचार इन नीति-प्रश्नका विचार करते करतेही
उत्पन्न हुए हैं, कि "मैं संसारमें किस तरह बर्ताव करूँ ? या इस संसारमें मेरा
सच्चा कर्तव्य क्या है ? " और ऐसे प्रश्नोंके उत्तर न देकर नीतिकी उपपत्ति केवल
किसी बाह्य-सुखकी दृष्टिसेही बतलाना मानो मनुष्यके मनकी उस पशुवृत्तिको - जो
स्वभावतः विषयसुखमें लिप्त रहा करती है - उत्तेजित करना एवं सच्ची नीतिमत्ताकी
जड़परही कुल्हाड़ी चलाना है।* अब इस बातको अलग करके समझानेकी
कोई आवश्यकता नहीं, कि यद्यपि गीताका प्रतिपाद्य विषय कर्मयोगही है, तोभी
उसमें शुद्ध वेदान्त क्यों और कैसे आ गया। कांटने इस विषयपर "शुद्ध ( व्यवसा-
यात्मक बुद्धिकी मीमांसा " और "व्यावहारिक ( वासनात्मक ) बुद्धिकी मीमांसा "
नामक दो अलग अलग ग्रंथ लिखे हैं। परंतु हमारे औपनिषदिक तत्त्वज्ञानके अनुसार
भगवद्गीतामें इन दोनों विषयोंका समावेश किया गया है; बल्कि श्रद्धा-मूलक
भक्ति-मार्गकाभी विवेचन उसीमें होनेके कारण गीता सबसे अधिक ग्राह्य और
प्रमाणभूत हो गई है।
- "Empiricism on the contrary, cuts up at the roots the mora-
lity of intentions (in which, and not in actions only, consists the
high worth that men can and ought to give themselves) ... ...
Empiricism, moreover, being on this account allied with all the
inclinations which (no matter what fashion they put on) degrade
humanity when they are raised to the dignity of a supreme practical
principle,...is for that reason much more dangerous." Kant's
Theory of Ethics, pp. 163 and 236-238. See also Kant's Critique
of Pure Reason, (trans. by Max Muller) 2nd Ed. pp. 640-657.