श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताध्याय-संगति ४६७
केवल सांप्रदायिक है। यद्यपि ये सब तात्पर्य सांप्रदायिक हों, तथापि यह प्रश्न किया
जा सकता है, कि कुछ लोगोंको गीतामें ये सांप्रदायिक अर्थ — विशेषतः संन्यास-प्रधान
अर्थ — ढूँढ़नेका मौक़ा कैसे मिल गया ? जबतक इस प्रश्नका भी विचार न हो
जायगा, तब तक यह नहीं कहा जा सकता, कि सांप्रदायिक अर्थोंकी चर्चा पूरी
हो चुकी है, इसलिये अब संक्षेपमें इसी बातका विचार किया जायगा, कि ये
सांप्रदायिक टीकाकार गीताका संन्यास-प्रधान अर्थ कैसे कर सके, और फिर यह
प्रकरण पूरा किया जायगा।
हमारे शास्त्रकारोंका यह सिद्धान्त है, कि चूंकि मनुष्य बुद्धिमान् प्राणी है,
इसलिये पिंड-ब्रह्मांडके तत्त्वको पहचाननाही उसका मुख्य काम या पुरुषार्थ है,
और इसीको धर्मशास्त्रमें 'मोक्ष' कहते हैं। परंतु दृश्य सृष्टिके व्यवहारोंकी ओर
ध्यान देकर शास्त्रोंमेंही यह प्रतिपादन किया गया है, कि पुरुषार्थ चार प्रकारके
हैं — जैसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यह पहलेही बतला दिया गया है, कि इस
स्थानपर 'धर्म' शब्दका अर्थ व्यावहारिक, सामाजिक और नैतिक धर्म समझना
चाहिये। अब पुरुषार्थको इस प्रकार चतुर्विध माननेपर यह प्रश्न सहजही उत्पन्न
हो जाता है, कि पुरुषार्थके चारों अंग या भाग परस्पर पोषक हैं या नहीं ? इसलिये
स्मरण रहे, कि पिंडमें और ब्रह्मांडमें जो तत्त्व है, उसका ज्ञान हुए बिना मोक्ष नहीं
मिलता, फिर वह ज्ञान किसीभी मार्गसे प्राप्त हो। इस सिद्धान्तके विषयमें शाब्दिक
मतभेद भलेही हो; परंतु तत्त्वतः कुछ मतभेद नहीं है। कमसे कम गीता-शास्त्रका
तो यह सिद्धान्त सर्वथैव ग्राह्य है। इसी प्रकार गीताको यह तत्त्वभी पूर्णतया मान्य
है, कि यदि अर्थ और काम, इन दोनों पुरुषार्थोंको प्राप्त करना हो, तो वेभी नीति-
धर्मसेही प्राप्त किये जावें। अब केवल धर्म '(अर्थात् व्यावहारिक चातुर्वर्ण्य-धर्म)
और मोक्षके पारस्परिक संबंधकाही निर्णय करना शेष रह गया। उनमेंसे धर्मके
विषयमें तो यह सिद्धान्त सभी पक्षोंको मान्य है, कि धर्म के द्वारा चित्तको शुद्ध
किये बिना मोक्षकी बात ही करना व्यर्थ है। परंतु इस प्रकार चित्तको शुद्ध करनेके
लिये बहुत समय लगता है; इसलिये मोक्षकी दृष्टिसे विचार करनेपरभी यही सिद्ध
होता है, कि तत्पूर्वकालमें पहले पहल संसारके सब कर्तव्योंको 'धर्म-से' पूरा कर लेना
चाहिये (मनु. ६. ३५-३७)। संन्यासका अर्थ है 'छोड़ना'; और जिसने धर्मके द्वारा
इस संसारमें कुछ प्राप्त या सिद्ध नहीं किया है वह त्यागही क्या करेगा ? अथवा
जो 'प्रपंच' (सांसारिक कर्म) ही ठीक ठीक साध नहीं सकता, उस 'अभागी'से
परमार्थभी कैसे ठीक सधेगा (दास. १२. १. १-१०; १२. ८. २१-३१)?
किसीका अंतिम उद्देश्य या साध्य चाहे सांसारिक हो अथवा पारमार्थिक, परंतु यह
बात प्रकट है, कि उसकी सिद्धिके लिये दीर्घ प्रयत्न, मनोनिग्रह और सामर्थ्य इत्यादि
गुणोंकी एक-सी आवश्यकता होती है; और जिसमें ये गुण विद्यमान नहीं होते उसे
किसीभी उद्देश्य या साध्यकी प्राप्ति नहीं होती। इस बातको मान लेनेपरभी कुछ