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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 956 में से

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पृष्ठ 464

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भक्तिमार्ग ४१९

उन सबमें गीता-प्रतिपादित भक्ति-मार्गरूपी विद्या अर्थात् साधन श्रेष्ठ (गुह्यानां
विद्यानां च राजा ) है। क्योंकि हमारे मतानुसार उक्त श्लोकका भावार्थ यह है,
कि वह (भक्ति-मार्गरूपी साधन) ज्ञान-मार्गकी विद्याके समान 'अव्यक्त' नहीं है;
किंतु वह 'प्रत्यक्ष' आँखोंसे दिखाई देनेवाला है और इसी लिये उसका आचरणभी
सुखसे किया जाता है। यदि गीतामें केवल बुद्धिगम्य ज्ञान-मार्गही प्रतिपादित किया
गया होता, तो वैदिक धर्मके सब संप्रदायोंमें आज सैकड़ों वर्षमे इस ग्रंथकी जैसी चाह
होती चली आ रही है, वैसी हुई होती या नहीं इसमें संदेह है। गीतामें जो मधुरता,
प्रेम या रस भरा है, वह उसमें प्रतिपादित भक्ति-मार्गहीका परिणाम है। पहले तो
स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने – जो परमेश्वरके प्रत्यक्ष अवतार हैं – यह गीता कही है;
और उसमेंभी दूसरी बात यह है, कि भगवानने अज्ञेय परब्रह्मका कोरा ज्ञानही नहीं
कहा है; किंतु स्थान स्थानमें प्रथम पुरुषका प्रयोग करके अपने सगुण और व्यक्त
स्वरूपको लक्ष्य कर कहा है, कि "मुझमें यह सब गूंथा हुआ है" (गीता ७.
७), "यह सब मेरीही माया है" (गीता ७. १४), "मुझसे भिन्न और कुछभी
नहीं है" (गीता ७. ७), "मुझे शत्रु और मित्र दोनों बराबर हैं" (गीता
९.२९), "मैंने इस जगतको उत्पन्न किया है" (गीता ९. ४), "मेंही ब्रह्मका
और मोक्षका मूल हूँ" (गीता १४. २७) अथवा "मुझे पुरुषोत्तम कहते है"
(गीता १५. १८)। और अंतमें अर्जुनको यह उपदेश किया, कि "सब धर्मोंको
छोड़ तू अकेले मेरी शरण आ, में तुझे सब पापोंसे मुक्त करूँगा, डर मत" (गीता
१८. ६६)। इससे श्रोताकी यह भावना हो जाती है, कि मानों मैं ऐसे साक्षात्
पुरुषोत्तमके सामने खड़ा हूँ, जो सम-दृष्टि, परमपूज्य, और अत्यंत दयालु है;
और तब आत्मज्ञानके विषयमें उसकी निष्ठाभी बहुत दृढ़ हो जाती है। इतनाही
नहीं; किंतु गीताके अध्यायोंका इस प्रकार पृथक् पृथक् विभाग न कर – कि एक
बार ज्ञानका तो दूसरी बार भक्तिका प्रतिपादन हो -- ज्ञानहीमें भक्ति और भक्तिहीमें
ज्ञानको गूंथ दिया है; जिसका परिणाम यह होता है, कि ज्ञान और भक्तिमें अथवा
बुद्धि और प्रेममें परस्पर विरोध न होकर परमेश्वरके ज्ञानके साथही प्रेमरसकाभी
अनुभव होता है; और सब प्राणियोंके विषयमें आत्मौपम्य-बुद्धिकी जागृति होकर
अंतमें चित्तको विलक्षण शांति, समाधान और सुख प्राप्त होता है ! इसीमें कर्म-
योगभी आ मिला है ! मानों दूधमें शक्कर मिल गई हो ! फिर इसमें कोई आश्चर्य
नहीं, जो हमारे पंडितजनोंने यह सिद्धान्त किया, कि गीता-प्रतिपादित ज्ञान,
ईशावास्योपनिषदके कथनानुसार, मृत्यु और अमृत अर्थात् इहलोक और परलोक
दोनों जगह श्रेयस्कर है।
ऊपर किये गये विवेचनसे पाठकोंके ध्यानमें यह बात आ जायगी, कि भक्ति-
मार्ग किसे कहते हैं; ज्ञानमार्ग और भक्ति-मार्गमें समानता तथा विषमता क्या है;
भक्ति-मार्गको राजमार्ग (राजविद्या) या सहज उपाय क्यों कहा है; और गीतामें