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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 956 में से

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पृष्ठ 422

सिद्धावस्था और व्यवहार ३७७
वस्थामें कितनीही क्यो न पहुँच गई हो, तोभी उसे ऐसे लोगोंके साथ बर्ताव करना
है, जो काम-क्रोध आदिके चक्करमें पड़े हुए हैं; और जिनकी बुद्धि अशुद्ध है। अतएव
इन लोगोंके साथ व्यवहार करते समय यदि वह अहिंसा, दया, शांति और क्षमा
आदि नित्य एवं परमावधिके सद्गुणोंकोही सब प्रकारसे सर्वदा स्वीकार करें, तो
उसका निर्वाह न होगा !* अर्थात् जहाँ सभी स्थितप्रज्ञ हैं, उस समाजकी उन्नत नीति
या धर्म-अधर्मसे, उस समाजके धर्म-अधर्म कुछ कुछ भिन्न तो रहेंगेही - कि जिसमें
लोभी पुरुषोंकीही भरमार अधिक होगी - वरना साधु पुरुषोंको यह जगत् छोड़
देना पड़ेगा; और सर्वत्र दुष्टोंकाही बोलबाला हो जावेगा। इसका अर्थ यह नहीं है,
कि साधु पुरुषको अपनी समता-बुद्धि छोड़ देनी चाहिये। फिरभी समता-समतामेंभी
भेद है। गीतामें कहा है, कि "ब्राह्मणे गवि हस्तिनि" (गीता ५. १८) - ब्राह्मण,
गाय और हाथीमें पंडितोंकी सम-बुद्धि होती है, इसलिये यदि कोई गायके लिये
लाया हुआ चारा ब्राह्मणको और ब्राह्मणके लिये बनाई गई रसोई गायको खिलाने
लगे, तो क्या उसे पंडित कहेंगे? संन्यास-मार्गवाले इस प्रश्नका महत्त्व भले न
मानें; पर कर्मयोगशास्त्रकी बात ऐसी नहीं है। दूसरे प्रकरणके विवेचनसे पाठक यह
जान गयेही होगें, कि कृतयुगी समाजके पूर्णावस्थावाले धर्म-अधर्मके स्वरूपपर ध्यान
रखकर स्वार्थपरायण लोगोंके समाजमें स्थितप्रज्ञ यह निश्चय करके बर्ताव है, कि
देशकालके अनुसार उसमें कौन कौन फ़र्क़ कर देने चाहिये। और कर्मयोगशास्त्रका
यही तो विकट प्रश्न है। साधु पुरुष स्वार्थपरायण लोगोंपर नाराज नहीं होते
अथवा उनकी लोभ-बुद्धि देखकर वे अपने मनकी समता डिगने नहीं देते; उलटे
इन्हीं लोगोंके कल्याणके लियेही अपने उद्योग केवल कर्तव्य समझ कर वैराग्यसे
जारी रखते हैं। इसी तत्त्वको मनमें रखकर श्रीसमर्थ रामदासस्वामीने दासबोधके
पूर्वार्धमें पहले ब्रह्मज्ञान बतलाया है; और फिर ग्यारहवें दशकमें (दास. ११. १०;
१२. ८-१०; १५. २) इसका वर्णन आरंभ किया है, कि स्थितप्रज्ञ या उत्तम

  • "In the second place, ideal conduct such as ethical theory
    is concerned with, is not possible for the ideal man in the midst
    of men otherwise constituted. An absolutely just or perfectly
    sympathetic person, could not live and act according to his nature
    in a tribe of cannibals. Among people who are treacherous and
    utterly without scruple, entire truthfulness and openness must
    bring ruin." 'Spencer's Data of Ethics, Chap XV, p. 280 स्पेन्सरने
    इसे Relative Ethics कहा है; और वह कहता है, कि On the evolution-
    hypothesis, the two ( Abosolute and Relative Ethics ) presuppose
    one another and only when they co-exist, can there exist that ideal
    conduct which Absolute Ethics has to formulate, and which
    Relative Ethics has to take as the standard by which to estimate
    divergencies from right, or degrees of wrong."