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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 956 में से

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पृष्ठ 368

संन्यास और कर्मयोग ३२३
या सांख्योंके कथनानुसार कर्मसंन्यासरूप वैराग्यकी जरूरत नहीं, इतनाही नहीं तो
क्योंकि इस कर्मभूमिमें कर्मका पूर्णतया त्याग कर डालना शक्यही नहीं है।
इसपरभी कुछ लोग कहते हैं- हाँ; माना कि कर्मबंध तोडनेके लिये कर्म
छोड़नेकी जरूरत नहीं है; सिर्फ कर्म-फलाशा छोड़नेसेही सब निर्वाह हो जाता
है; परंतु जब ज्ञानप्राप्तिसे हमारी बुद्धि निष्काम हो जाती है, तब सब वासना-
ओंका क्षय हो जाता है; और कर्म करनेकी प्रवृत्ति होनेके लिये कोईभी कारण
शेष नहीं रह जाता। तब ऐसी अवस्थामे अर्थात् वासनाके क्षयमे - कायाक्लेश-
भयसे नहीं - सब कर्म आप-ही आप छूट जाते हैं। इस संमार्गमें मनुष्यका परम
पुरुषार्थ मोक्षही तो है और जिसे ज्ञानसे वह मोक्ष प्राप्त हो जाता है, उसे प्रजा,
संपत्ति अथवा स्वर्गादि लोकोंके सुखोमेंसे किसीकीभी 'तृषणा' (इच्छा) नहीं
रहती (बृ. ३. ५. १; ४. ४. २२)। इसलिये कर्मोंको न छोड़नेपरभी अंतमें उस
ज्ञानका स्वाभाविक परिणाम यही हुआ करता है, कि कर्म आप-ही-आप, छूट
जाते हैं। इसी अभिप्रायसे उत्तरगीतामें कहा है -
ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः ।
न चास्ति किंचित्कर्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित् ॥
“ज्ञानामृत पी कर कृतकृत्य हो जानेवाले पुरुषका फिर आगे कोई कर्तव्य शेष नहीं
रहता; और यदि रह जाय, तो वह तत्त्ववित् अर्थात् ज्ञानी नहीं है” * (१. २३)।
यदि किसीको शंका हो, कि यह ज्ञानी पुरुषका दोष है; तो वह ठीक नहीं; क्योंकि
श्रीशंकराचार्यने कहा है कि, “अलंकारो ह्ययमस्माकं यद्ब्रह्मात्मावगतौ सत्यां सर्व-
कर्तव्यताहानिः” (वे. सू. शां. भा. १. १. ४) - अर्थात् यह तो ब्रह्मज्ञानी पुरुषका
एक अलंकारही है। इसी प्रकार गीतामें भी ऐसे वचन हैं जैसे - “तस्य कार्यं न
विद्यते” (गीता ३. १७) - ज्ञानीको आगे करनेके लिये कुछ नहीं रहता; अथवा
उसे समस्त वैदिक कर्मोंका कोई प्रयोजन नहीं रहता (गीता २. ४६)। अथवा
“योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते” (गीता ६. ३) - जो योगारूढ हो
गया, उसे शमही कारण है। इन वचनोंके अतिरिक्त 'सर्वारंभपरित्यागी' (गीता
१२. १६)। अर्थात् समस्त उद्योग छोड़नेवाला, और 'अनिकेतः' (गीता १२.
१९) - अर्थात् बिना घरद्वारका, इत्यादि विशेषणभी ज्ञानी पुरुषके लिये गीतामें
प्रयुक्त हुए हैं। इन सब बातोंसे कुछ लोगोंकी यह राय है, कि भगवद्गीताको यह

  • यह समझ वास्तवमे ठीक नहीं, कि यह श्लोक श्रुतिका है। वेदान्तसूत्रके
    शांकरभाष्यमें यह श्लोक नहीं है। परंतु सनत्सुजातीयके भाष्यमें आचार्यने इसे लिया
    है; और वहाँ कहा है कि यह लिङ्गपुराणका श्लोक है। इसमें संदेह नहीं, कि यह
    श्लोक संन्यासमार्गवालोंका है; कर्मयोगियोंका नहीं। बौद्ध धर्मग्रंथोंमेभी ऐसेही
    वचन हैं। (देखो परिशिष्ट प्रकरण)।