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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 956 में से

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पृष्ठ 366

संन्यास और कर्मयोग ३२१
कभी श्रेयस्कर नहीं होता । यदि कहें, कि मन निर्विषय है और मनुष्यके अधीन
है; तो फिर उसे कर्मका डरही किसलिये है ? अथवा कर्मोंके न करनेका व्यर्थ
आग्रहही वह क्यों करे ? बरसाती छतेकी परीक्षा जिस प्रकार वर्षामेंही होती है,
उसी प्रकार या -
विकारहेतौ सति विक्रियन्ते, येषां न चेतांसि त एव धीराः ।
"जिन कारणोंसे विकार उत्पन्न होता है, वे कारण अथवा विषय दृष्टिके आगे
रहनेपरभी जिनका अंतःकरण मोहके पंजेमें नहीं फँसता, वेही पुरुष धैर्यशाली कहे
जाते हैं" ( कुमार १. ५९) - कालिदासके इस व्यापक न्यायसे कर्मोंके द्वाराही
मनोनिग्रहकी जाँच हुआ करती है; और स्वयं कर्ताको तथा और लोगोंकोभी ज्ञात
हो जाता है, कि मनोनिग्रह पूर्ण हुआ या नहीं। इस दृष्टिसेभी यही सिद्ध होता
है, कि शास्त्रसे प्राप्त (अर्थात् प्रवाहपतित) कर्म करनेही चाहिये (गीता १८. ६)।
अच्छा; यदि कहें कि "मन वशमें है; और यह डरभी नहीं, कि जो चित्तशुद्धि
प्राप्त हो चुकी है, वह कर्म करनेसे बिगड़ जावेगी; परंतु ऐसे व्यर्थ कर्म करके
शरीरको कष्ट देना नहीं चाहते, कि जो मोक्षप्राप्तिके लिये अनावश्यक है" तो
यह कर्मत्याग 'राजस' कहलावेगा, क्योंकि यह काय-क्लेशका भय करके केवल इस
क्षुद्र बुद्धिसे किया गया है, कि देहको कष्ट होगा और इसलिये त्यागसे जो फल मिलना
चाहिये, वह ऐसे 'राजस' कर्मत्यागीको नहीं मिलता ( गीता १८. ८)। फिर यही
प्रश्न है, कि कर्म छोड़ेंही क्यों ? यदि कोई कहे, कि "सब कर्म मायासृष्टिके हैं; अत-
एव अनित्य हैं, इससे ब्रह्मसृष्टिके नित्य आत्माको इन कर्मोंकी झंझटमें पड़ जाना उचित
नहीं; " तो यहभी ठीक नहीं है। क्योंकि जब स्वयं परब्रह्मही मायासे आच्छादित
है, तब यदि मनुष्यभी उसीके अनुसार मायामें व्यवहार करे, तो क्या हानि है ?
मायासृष्टि और ब्रह्मसृष्टिके भेदसे जिस प्रकार इस जगत्केभी दोन भाग किये गये
हैं, उसी प्रकार आत्मा और देहेंद्रियोंके भेदसे मनुष्यकेभी दो भाग होते हैं। इनमेंसे
आत्मा और ब्रह्मका संयोग करके ब्रह्ममें आत्माका लयकर दो और इस ब्रह्मात्मैक्य-
ज्ञानसे बुद्धिको निःसंग रखकर केवल मायिक देहेंद्रियोंद्वारा मायासृष्टिके व्यवहार
किया करो । बस; इस प्रकार बर्ताव करनेसे मोक्षमें कोई प्रतिबंध न आवेगा । और
उक्त दोनों भागोंका जोड़ा आपसमें मिल जानेसे सृष्टिके किसीभी भागकी उपेक्षा
या विच्छेद करनेका दोषभी न लगेगा; तथा ब्रह्मसृष्टि एवं मायासृष्टि - परलोक
और इहलोक - दोनोंके कर्तव्यपालनका श्रेयभी मिल जायगा । ईशोपनिषद्में इसी
तत्त्वका प्रतिपादन है ( ईश. ११) इन श्रुतिवचनोंका आगे विस्तारसहित विचार
किया जावेगा । यहाँ इतनाही कह देते हैं, कि गीतामें जो कहा है, कि "ब्रह्मात्मैक्यके
अनुभवी ज्ञानी पुरुष मायासृष्टिके व्यवहार केवल शरीर अथवा केवल इंद्रियोंसेही
करते हैं" ( गीता ४ २१; ५. १२ ), उसका तात्पर्यभी यही है; और इसी उद्देश्यसे
गी. र. २१