श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९९
स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार किया है, कि "मैं तुझे वह काल बतलाता हू कि जिस
कालमें मरनेपर कर्मयोगी लौटकर आता है, या नहीं आता है" (गीता ८, २३) ।
और महाभारतमेंभी यह वर्णन पाया जाता है, कि जब भीष्म पितामह शरशय्यामें
पड़े थे, तब वे शरीरत्याग करनेके लिये उत्तरायणकी - अर्थात् सूर्यके उत्तरकी ओर
मुड़नेकी - प्रतीक्षा कर रहे थे (महा. भी. १२०; अनु. १६७) । इससे विदित
होता है, कि दिवस, शुक्लपक्ष और उत्तरायण, ये कालही मृत्यु होनेके लिये कभी-न-
कभी प्रशस्त माने जाते थे । ऋग्वेद (ऋ. १०. ८८. १५ और बृ. ६. २. १५) मेंभी
देवयान और पितृयाण मार्गोंका जहाँपर वर्णन है, वहाँ कालवाचक अर्थही विवक्षित
है। इससे तथा अन्य अनेक प्रमाणोंसे हमने यह निश्चय किया है कि, उत्तर गोलार्धके
जिस स्थानमें सूर्य क्षितिजपर छः महीनेतक हमेशा दीख पड़ता है, उस स्थानमें
अर्थात् उत्तर ध्रुवके पास या मेरुस्थानमें जब पहले वैदिक ऋषियोंकी बस्तीथी
तभीसे छ. महीनेका उत्तरायणरूपी प्रकाशकाल मृत्यु होनेके लिये प्रशस्त माना गया
होगा। इस विषयका विस्तृत विवेचन हमने अपने दूसरे ग्रंथमें किया है। कारण चाहे
कुछभी हो, इसमें संदेह नहीं कि यह समझ बहुत प्राचीन कालसे चली आयी है;
और यही समझ देवयान तथा पितृयाण मार्गोंमें प्रकटरूप, न हो, तोभी पर्यायसे -
अंतर्भूत हो गई है। अधिक क्या कहें, हमें तो ऐसा मालूम होता है कि इन दोनों
मार्गोंका मूल इस प्राचीन समझमेंही है। यदि ऐसा न माने, तो गीतामें देवयान और
पितृयाणको लक्ष्य करके जो एक बार 'काल' (गीता ८. २३) और दूसरी बार
'गति' या 'सृति' अर्थात् मार्ग (गीता ८. २६, २७) कहा है, यानी इन दो भिन्न
भिन्न अर्थोंके शब्दोंका जो प्रयोग किया गया है, उसकी कुछ उपपत्ति नहीं लगाई
जा सकती । वेदान्तसूत्रके शांकरभाष्यमें देवयान और पितृयाणका कालवाचक अर्थ
स्मार्त है, जो कर्मयोगके लियेही उपयुक्त होता है, और यह भेद करके, कि सच्चा
ब्रह्मज्ञानी उपनिषदोंमें वर्णित श्रौत मार्गसे, अर्थात् देवताप्रयुक्त प्रकाशमय मार्गसेही,
ब्रह्मलोकको जाता है; 'कालवाचक' तथा 'देवतावाचक' अर्थोंकी व्यवस्था की गई
है (वे. सू. शां. भा. ४. २. १८-२१) । परंतु मूल सूत्रोंको देखनेसे ज्ञात होता है,
कि कालकी अपेक्षा न रख उत्तरायणादि शब्दोंसे देवताओंको कल्पितकर देवयानका
जो देवतावाचक अर्थ बादरायणाचार्यने निश्चित किया है, वही उनके मतानुसार
सर्वत्र अभिप्रेत होगा; और यह माननाभी उचित नहीं है, कि गीतामें वर्णित मार्ग
उपनिषदोंकी इस देवयान गतिको छोड़कर स्वतंत्र हो सकता है। परंतु यहाँ इतने गहरे
पानीमें पैठनेकी कोई आवश्यकता नहीं है; क्योंकि यद्यपि इस विषयमें मतभेद हो,
कि देवयान और पितृयाणके दिवस, रात्रि, उत्तरायण आदि शब्द ऐतिहासिक दृष्टिसे
मूलारंभमें कालवाचकही थे या नहीं; तथापि यह बात निर्विवाद है, कि आगे यह
कालवाचक अर्थ छोड़ दिया गया और अंतमें देवयान और पितृयाण, इन दोनों पदोंका
यही अर्थ निश्चित तथा रूढ़ हो गया है, कि - कालकी अपेक्षा न रख चाहे कोई किसी