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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 956 में से

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पृष्ठ 342

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९७
मनुस्मृति ( मनु. २. ८७ ) मेंभी कहा गया है, कि ब्राह्मण और कुछ करे, या न
करे, परंतु वह केवल जपसेही सिद्धि पा सकता है। अग्निमें आहुति डालते समय
'न मम' - यह वस्तु मेरी नहीं है - कहकर उस वस्तुसे अपनी ममत्व-बुद्धिका
त्याग दिखलाया जाता है - यही यज्ञका मुख्य तत्त्व है ; और दान आदिक कर्मोंकाभी
यही बीज है । इसलिये यज्ञ-याग या दानादि कर्मोंकी योग्यताभी यज्ञके बराबर है ।
अधिक क्या कहा जाय, जिनमें अपना तनिकभी स्वार्थ नही है, ऐसे कर्मोंको शुद्ध
बुद्धिसे करनेपर वे यज्ञही कहे जा सकते हैं। यज्ञकी इस व्याख्याका स्वीकार करने-
पर निर्मम या निष्काम बुद्धिसे किये गये सब कर्म, व्यापक अर्थमें, एक महायज्ञही होंगे ।
और द्रव्यमय यज्ञको लागू होनेवाला मीमांसकोंका यह न्याय, कि 'यथार्थ किये गये
कोईभी कर्म बंधक नहीं होते, ' उन सब निष्काम कर्मोंके लियेभी उपयोगी हो जाता
है। इन कर्मोंकी करते समय फलाशाभी छोड़ दी जाती है, जिसके कारण स्वर्गका
आना-जानाभी छूट जाता है; और इन कर्मोंको करने परभी अंतमें मोक्ष-स्वरूपी
सद्गति मिल जाती है ( गीता ३. ९ ) । सारांश यह है, कि संसार यज्ञमय या कर्म-
मय है सही; परंतु कर्म करनेवालोंके दो वर्ग होते हैं। पहले वे जो शास्त्रोक्त रीतिसे,
पर फलाशा रखकर कर्म किया करते हैं ( कर्मकांडी लोग ) ; और दूसरे वे जो
ज्ञानमे या निष्काम बुद्धिमे केवल कर्तव्य समझकर कर्म किया करते हैं ( ज्ञानी
लोग ) । इस संबंधमें गीताका यह सिद्धान्त है, कि कर्मकांडियोंको स्वर्गप्राप्तिरूप
अनित्य फल मिलता है; और ज्ञानसे अर्थात् निष्काम बुद्धिसे कर्म करनेवाले ज्ञानी
पुरुषोंको मोक्षरूपी नित्य फल मिलता है। मोक्षके लिये कर्मोंके छोड़ने गीतामें
कहींभी नहीं बतलाया गया है। इसके विपरीत अठारहवें अध्यायके आरंभमें स्पष्ट-
तया बतला पुरुषोंको मोक्षरूपि नित्य फल मिलता है। मोक्षके लिये कर्मोंके छोड़ने
गीतामें कहींभी नहीं बतलाया गया है। इसके विपरीत अठरावें अध्यायके आरंभमें
स्पष्टतया बतला दिया है, कि 'त्याग = छोड़ना' शब्दसे गीतामें कर्मत्याग कभीभी
नही समझना चाहिये; किंतु उसका अर्थ 'फलत्याग' ही सर्वत्र विवक्षित है।
इस प्रकार कर्मकांडियों और कर्मज्ञानियोंको भिन्न भिन्न फल मिलते हैं और
उन्हें पाके, प्रत्येकको मृत्युके वाद भिन्न भिन्न लोकोंमें भिन्न भिन्न मार्गोंसे जाना
पड़ता है। उन्हीं मार्गोंको क्रमसे 'पितृयान' और 'देवयान' कहते हैं। ( शां. १७.
१७. १६ ) ; और उपनिषदोंके आधारसे गीताके आठवें अध्यायमें इन्हीं दोनों
मार्गोंका वर्णन किया गया है। वह मनुष्य, जिसको ज्ञान हो गया है - और यह ज्ञान
कम-से-कम अंतकालमें तो अवश्यही हो गया हो ( गीता २. ७२ ) - देहपात होनेके
अनंतर और चितामें उसके शरीरके जल जानेपर, उस अग्निमे ज्योति ( ज्वाला ),
दिवस, शुक्लपक्ष और उत्तरायणके छः महीने, इनमेंसे प्रयाण करता हुआ ब्रह्मपदको
जा पहुँचता है; और वहाँ उसे मोक्ष प्राप्त होता है; जिसके कारण वह पुनः जन्म ले
कर मृत्युलोकमें फिर नही लौटता। परंतु जो केवल कर्मकांडी है, अर्थात् जिसे ज्ञान