श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 302, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्यात्म २५७
'आनीत्' पदके साथही - 'अवातं' = विना वायुके, और 'स्वधया' = स्वयं अपनीही,
महिमासे - इन दोनों पदोंको जोड़कर "सृष्टिका मूल तत्त्व जड़ नहीं था" यह अद्वैता-
वस्थाका अर्थ द्वैतकी भाषा में बड़ी युक्तिसे इस प्रकार बतलाया है, कि "वह अकेला
बिना वायुके केवल अपनी ही शक्तिसे श्वासोच्छ्वास लेता या स्फूर्तिमान् होता
था!" इसमें बाह्य दृष्टिसे जो विरोध दिखाई देता है, वह द्वैती भाषाकी अपूर्णतासे
उत्पन्न हुआ है। 'नेति नेति' 'एकमेवाद्वितीयम्' या "स्वे महिम्नि प्रतिष्ठितः"
(छां. ७. २४. १)। - अपनीही महिमासे अर्थात् अन्य किसीकी अपेक्षा न
रखते हुए अकेलाही रहनेवाला - इत्यादि परब्रह्मके जो वर्णन उपनिषदोंमें पाये
जाते हैं, वेभी उपरोक्त अर्थकेही द्योतक हैं। सारी सृष्टिके मूलारंभमें चारों ओर
जिस एक अनिर्वाच्य तत्त्वके स्फुरण होनेकी बात इस सूक्तमें कही गई है, वही
तत्त्व सभी दृश्य सृष्टिका प्रलय होनेपरभी निःसंदेह शेष रहेगा। अतएव गीतामें
इसी परब्रह्मका कुछ पर्यायसे इस प्रकार वर्णन किया है, कि "सब पदार्थोंका नाश
होनेपरभी जिसका नाश नहीं होता" (गीता ८. २०) और आगे इसी सूक्तके
अनुसार स्पष्ट कहा है, कि "वह सत्भी नहीं है; और असत्भी नहीं है" (गीता
१३. १२)। परंतु प्रश्न यह है, कि जब सृष्टिके मूलारंभमें निर्गुण ब्रह्मके सिवा
और कुछभी न था; तो फिर वेदोंमें जो ऐसे वर्णन पाये जाते हैं, कि "आरंभमें
पानी, अंधकार, या आभु और तुच्छकी जोड़ी थी" उनकी क्या व्यवस्था होगी?
अतएव तीसरी ऋचामें कविने कहा है, कि - सृष्टिके आरंभमें अंधकार था या
अंधकारसे आच्छादित पानी था, या आभु (ब्रह्म) और उसको आच्छादित
करनेवाली माया (तुच्छ), ये दोनों पहलेसेही थे - इत्यादि) जितने वर्णन
हैं वे सब उस समयके हैं, जब कि अकेले मूल परब्रह्मके तपमहात्म्यसे उसका
विविध रूपोंसे फैलाव हो गया था। ये वर्णन मूलारंभकी स्थितिके नहीं हैं।
इस ऋचाके शब्दसे तप मूल ब्रह्मकी ज्ञानमय विलक्षण शक्ति विवक्षित है;
और उसीका वर्णन चौथी ऋचामें किया गया है (मुं. १. १. ९)। "एतावान्
अस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पूरुषः" (ऋ. १०. ९०. ३)। इस न्यायसे, सारी
सृष्टिही जिसकी महिमा कहलाई, उस मूल द्रव्यके विषयमें यह कहना आवश्यक
नहीं है, कि वह इन सबके परे, सबसे श्रेष्ठ और भिन्न है। परंतु दृश्य वस्तु और
द्रष्टा, भोक्ता और भोग्य, आच्छादन करनेवाला और आच्छाद्य, अंधकार और
प्रकाश, मर्त्य और अमर इत्यादि सारे द्वैतोंको इस प्रकार अलग कर यद्यपि यह
निश्चय किया गया, कि केवल एक निर्मल चिद्रूपी विलक्षण परब्रह्मही मूलारंभमें
था; तथापि जब यह बतलानेका समय आया, कि इस अनिर्वाच्य, निर्गुण, अकेले एक
तत्त्वसे आकाश, जल इत्यादि द्वंद्वात्मक विनाशी सगुण नामरूपात्मक विविध सृष्टि या
इस सृष्टिकी मूलभूत त्रिगुणात्मक प्रकृति कैसे उत्पन्न हुई, तब तो प्रस्तुत ऋषिनेभी
मन, काम, असत् और सत् जैसी द्वैती भाषाकाही उपयोग किया है और अंतमें
गी. र. १७