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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 956 में से

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पृष्ठ 225

१७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
उसके छोटा, बड़ा, कर्कश, भद्दा, फटा हुआ, कोमल अथवा गायनशास्त्रके अनुसार
निषाद, गांधार, षड्ज आदि; और व्याकरणशास्त्रके अनुसार कण्ठ्य, तालव्य, और
औष्ठ्य आदि अनेक भेद हुआ करते हैं। इसी तरह यद्यपि 'रूप' एकही गुण है, तथापि
उसकेभी अनेक भेद हुआ करते हैं; जैसे सफ़ेद, काला, नीला, पीला, हरा, लाल, आदि।
इसी तरह यद्यपि 'रस' या 'रुचि' एकही गुण है, तथापि उसके खट्टा, मीठा, तीखा,
कडुवा, खारा आदि अनेक भेद हो जाते हैं। और, 'मिठास' यद्यपि एक विशिष्ट रुचि
है, तथापि हम देखते हैं, कि गन्नेकी मिठास, दूधकी मिठास, गुड़ की मिठास और
शक्करकी मिठास भिन्न भिन्न होती है; तथा इस प्रकार उस एकही 'मिठास'के अनेक
भेद हो जाते हैं। यदि भिन्न भिन्न गुणोंके भिन्न भिन्न मिश्रणोंपर विचार किया जाय,
तो यह गुणवैचित्र्य अनंत प्रकारसे अनंत हो सकता है। परंतु चाहे जो हो; पदार्थोंके
मूल गुण पाँचसे कभी अधिक हो नहीं सकते। क्योंकि इंद्रियां केवल पाँच हैं, और प्रत्ये-
कको एकही एक गुणका बोध हुआ करता है। इसलिये सांख्योने यह निश्चित किया
है, कि यद्यपि केवल शब्दगुणके अथवा केवल स्पर्शगुणके पृथक् पृथक् यानी दूसरे
गुणोंके मिश्रणरहित पदार्थ हमें दीख न पड़ते हों, तथापि इसमें संदेह नहीं, कि मूल
प्रकृतिमें निरा शब्द, निरा स्पर्श, निरा रूप, निरा रस और निरा गंध है - उस प्रकार
शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र और गंधतन्मात्र ही हैं - अर्थात्
मूल प्रकृतिके यही पाँच भिन्न भिन्न सूक्ष्म तन्मात्रविकार अथवा द्रव्य निःसंदेह हैं।
आगे इस बातका विचार किया गया है, कि पंचतन्मात्राओं अथवा उनसे उत्पन्न
होनेवाले पंचमहाभूतोंके संबंधमें उपनिषत्कारोंका कथन क्या है।
निरिंद्रिय सृष्टिका इस प्रकार विचार करके यह निश्चित किया गया है, कि
उसमें पाँचही मूलतत्त्व हैं। और जब हम सेंद्रिय सृष्टिपर दृष्टि डालते हैं, तबभी
यही प्रतीत होता है, कि पाँच, ज्ञानेंद्रियाँ, पांच कर्मेंद्रियाँ और मन, इन ग्यारह इंद्रि-
योंकी अपेक्षा अधिक इंद्रियाँ किसीकेभी नहीं हैं। स्थूल देहमें हाथ और पैर आदि
इंद्रियाँ यद्यपि स्थूल प्रतीत होती हैं, तथापि इनमेंसे प्रत्येककी जड़में किसी मूल सूक्ष्म
तत्त्वका अस्तित्व माने बिना इंद्रियोंकी भिन्नताका यथोचित कारण मालूम नहीं होता।
पाश्चिमात्य आधिभौतिक उत्क्रांतिवादियोंमें इसपर बहुत विवाद हुआ है। अर्वाचीन
सृष्टि-शास्त्रज्ञ कहते हैं, कि मूलके अत्यंत छोटे और गोलाकार जंतुओंमें सिर्फ़
'त्वचा' ही एक इंद्रिय होती है; और इस त्वचासे अन्य इंद्रियाँ क्रमशः उत्पन्न हुई है।
उदाहरणार्थ, मूल जंतुकी त्वचासे प्रकाशका संयोग होनेपर आँख उत्पन्न हुई, इत्यादि।
आधिभौतिक-वादियोंका यह तत्त्व - कि प्रकाश आदिके संयोगसे स्थूल-इंद्रियोंका
प्रादुर्भाव होता है - सांख्योंकोभी ग्राह्य है। महाभारत (महा. शां. २१३. १६) में,
सांख्यप्रक्रियाके अनुसार इंद्रियोंके प्रादुर्भावका वर्णन इस प्रकार पाया जाता है :-
शब्दरागात् श्रोत्रमस्य जायते भावितात्मनः ।
रूपरागात् तथा चक्षुः घ्राणं गंधजिघृक्षया ॥