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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 956 में से

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पृष्ठ 210

कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १६३
पिछले प्रकरणमें जिसे क्षेत्रज्ञ या आत्मा कहा है, वही यह देखनेवाला, ज्ञाता या
उपभोग करनेवाला है; और इसे ही सांख्यशास्त्रमें 'पुरुष' या 'ज्ञ' (ज्ञाता) कहा गया
हैं। यह ज्ञाता प्रकृतिसे भिन्न है। इस कारण निसर्गसेही प्रकृतिके तीनों ( सत्त्व,
रज और तम ) गुणोंके परे रहता है। अर्थात् यह निर्विकार और निर्गुण है; और
जानने या देखनेके सिवा कुछभी नहीं करता। इससे यहभी मालूम हो जाता है,
कि जगत्में जो घटनाएँ होती रहती हैं, वे सब प्रकृतिकेही खेल हैं। सारांश यह
है, कि प्रकृति अचेतन या जड़ है; तो पुरुष सचेतन है। प्रकृति सब काम किया
करती है; तो पुरुष उदासीन और अकर्ता है। प्रकृति त्रिगुणात्मक है; तो पुरुष
निर्गुण है। प्रकृति अंधी है; तो पुरुष साक्षी है। इस प्रकार इस सृष्टिमें ये दो भिन्न
भिन्न तत्त्व अनादिसिद्ध, स्वतंत्र और स्वयंभू हैं - यही सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त है।
इस बातको ध्यानमें रक्खेही भगवद्गीतामें पहले कहा गया है, कि “प्रकृतिं पुरुषं
चैव विद्ध्यनादि उभावपि” – प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं (गीता १३. १९)।
इसके बाद उनका वर्णन इस प्रकार किया है। “कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ”
अर्थात् देह और इंद्रियोंका व्यापार प्रकृति करती है; और “पुरुषः सुखदुःखानां
भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते” – अर्थात् पुरुष सुखदुःखोंका उपभोग करनेके लिये, कारण
है। यद्यपि गीतामेंभी प्रकृति और पुरुष अनादि माने गये हैं, तथापि यह बात
ध्यानमें रखनी चाहिये, कि सांख्यवादियोंके समान, गीतामें ये दोनों तत्त्व स्वतंत्र या
स्वयंभू नहीं माने गये हैं। कारण यह है, कि गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने प्रकृतिको
अपनी 'माया' कहा है (गीता ७. १४; १४. ३), और पुरुषके विषयमेंभी यही
कहा है, कि “ममैवांशो जीवलोके” (गीता १५. ७) अर्थात् वह मेराही अंश है।
इससे मालूम हो जाता है, कि गीता सांख्यशास्त्रसेभी बढ़ गई है। परंतु अभी इस
बातकी ओर ध्यान न दे कर हम देखेंगे कि सांख्यशास्त्र आगे क्या कहता है।
सांख्यशास्त्रके अनुसार सृष्टिके सब पदार्थोंके तीन वर्ग होते हैं। पहला
अव्यक्त (मूल प्रकृति), दूसरा व्यक्त (प्रकृतिके विकार) और तीसरा पुरुष अर्थात्
(ज्ञ)। परंतु इनमेंसे प्रलयकालके समय व्यक्त पदार्थोंका स्वरूप नष्ट हो जाता
है, इसलिये अब मूलमें केवल प्रकृति और पुरुष ये दोही तत्त्व शेष रह जाते हैं।
ये दोनों मूलतत्त्व, सांख्यवादियोंके मतानुसार अनादि और स्वयंभू हैं। वे लोग
इसलिये सांख्योंको द्वैतवादी (दो मूल तत्त्व माननेवाले) कहते हैं। वे लोग प्रकृति
और पुरुषके परे ईश्वर, काल, स्वभाव या अन्य किसीभी मूल तत्त्वको नहीं मानते।*
इसका कारण यह है कि सगुण ईश्वर, काल या स्वभाव, ये सब व्यक्त
होनेके कारण अव्यक्त प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले व्यक्त पदार्थोंमेंही शामिल हैं।

  • ईश्वरकृष्ण कट्टर निरीश्वरवादी था। उसने अपनी सांख्यकारिका की
    अंतिम उपसंहारात्मक तीन आर्याओंमें कहा है, कि मूल विषयपर ७० आर्याएँ थीं।