श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुखदुःखविवेक १०७
न कहापणवस्सेन तित्ति कामेसु विज्जति ।
अपि दिब्बेसु कामेसु रतिं सो नाधिगच्छति ॥
“कार्षापण नामक महामूल्यवान् सिक्के की यदि वर्षा होने लगे, तोभी काम-
वासना की तित्ति अर्थात् तृप्ति नहीं होती; और स्वर्गका सुख मिलनेपरभी कामी
पुरुषकी कामेच्छा पूरी नहीं होती ।” यह वर्णन धम्मपद (१८६, १८७) नामक
बौद्ध-ग्रंथमें है। इससे कहा जा सकता है कि विषयोपभोगरूपी सुखकी पूर्ति कभी
हो नहीं सकती; और इसीलिये हरएक मनुष्यको हमेशा ऐसा मालूम होता है, कि
“मैं दुःखी हूँ !” मनुष्योंकी इस स्थितिको विचारनेसे वही सिद्धान्त स्थिर करना
पड़ता है, जो महाभारत (महा. शां. २०५. ६; ३३०. १६) में कहा गया है :-
सुखाद्बहुतरं दुःखं जीविते नास्ति संशयः ।
अर्थात् “इस जीवनमें यानी संसारमें सुखकी अपेक्षा दुःखही अधिक है ।” यही
सिद्धान्त साधु तुकारामने इस प्रकार दिया है :- “सुख देखो तो राईबराबर
और दुःख पर्वतके समान है ।” उपनिषत्कारोँकाभी सिद्धान्त ऐसाही है (मैत्र्यु.
१. २-४) । गीता (गीता ८. १५ और ९. ३३) मेंभी कहा गया है, कि मनुष्यका
जन्म अशाश्वत और ‘दुःखोंका घर’ है, तथा यह संसार अनित्य और ‘सुखरहित’
है। जर्मन पंडित शोपेनहरका ऐसाही मत है, जिसे सिद्ध करनेके लिये उसने एक
विचित्र दृष्टान्त दिया है। वह कहता है, कि मनुष्यकी समस्त सुखेच्छाओँमेंसे जितनी
सुखेच्छाएँ सफल होती हैं, उसी परिमाणसे हम उसे सुखी समझते हैं, और जब सुखे-
च्छाओँकी अपेक्षा सुखोपभोग कम हो जाता है, तब कहा जाता है, कि वह मनुष्य
उस परिमाणसे दुःखी है। इस परिमाणको गणित-रीतिसे समझाना हो तो सुखोप-
भोगको सुखेच्छासे भाग देना चाहिये और अपूर्णांकके रूपमें सुखेच्छा ऐसा लिखना
चाहिये। परंतु यह अपूर्णांक हैभी विलक्षण; क्योंकि इसका हर (अर्थात् सुखेच्छा),
अंश (अर्थात् सुखोपभोग) की अपेक्षा, हमेशा अधिकाधिक बढ़ताही रहता है।
यदि यह अपूर्णांक पहले १/२ हो, और यदि आगे – उसका अंश १ से ३ हो जाय,
तो उसका हर २ से १० हो जायगा – अर्थात् वही अपूर्णांक ३/१० हो जाता है।
तात्पर्य यह है, यदि अंश तिगुना बढ़ता है, तो हर पचगुना बढ़ जाता है, जिसका
फल यह होता है, कि वह अपूर्णांक पूर्णताकी ओर न जा कर अधिकाधिक अपूर्णताकी
ओर चला जाता है। इसका मतलब यही है, कि कोई मनुष्य कितनाही सुखोप-
भोग करे, उसकी सुखेच्छा दिनोंदिन बढ़ती ही जाती है; जिससे यह आशा करना
व्यर्थ है, कि मनुष्य पूर्ण सुखी हो सकता है। प्राचीन कालमें कितना सुख था, इसका
विचार करते समय हम लोग इस अपूर्णांकके अंशका तो पूर्ण ध्यान रखते हैं, परंतु
इस बातको भूल जाते हैं, कि अंशकी अपेक्षा हर कितना बढ़ गया है। किंतु जब
हमें सुख-दुःखकी मात्राकाही निर्णय करना है, तो हमें किसी ‘काल’का विचार न