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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 956 में से

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पृष्ठ 140

आधिभौतिक सुखवाद ९३
इस बातको आधिभौतिक सुखवादीभी मानते हैं, कि शारीरिक सुखसे मानसिक
सुखकी योग्यता अधिक है। पशुको जितने सुख मिल सकते हैं, वे सब किसी मनुष्यको
देकर उससे पूछो कि “क्या, तुम पशु होना चाहते हो ?” तो वह कभी इस बातके
लिये राजी न होगा। इसी तरह, ज्ञानी पुरुषोंको यह बतलानेकी आवश्यकता
नहीं, कि तत्त्वज्ञानके गहन विचारोंसे बुद्धिमें जो एक प्रकारकी शांति उत्पन्न होती
है, उसकी योग्यता सांसारिक संपत्ति अथवा बाह्योपभोगसे हज़ार गुना बढ़ कर है।
अच्छा, यदि लोकमतको देखें, तोभी यही ज्ञात होगा, की नीतिका निर्णय करना
केवल संख्यापर अवलंबित नहीं है। लोग जो कुछ किया करते हैं, वह सब केवल
आधिभौतिक सुखकेही लिये नहीं किया करते - वे आधिभौतिक सुखहीको अपना
परम उद्देश्य नहीं मानते । बल्कि हम लोग यही कहा करते हैं, कि बाह्य सुखोंकी कौन
कहे, विशेष प्रसंग आनेपर अपनी जानकीभी परवाह नहीं करनी चाहिये । क्योंकि
ऐसे समयमें आध्यात्मिक दृष्टिके अनुसार जिन सत्य आदि नीति-धर्मोंकी योग्यता
अपनी जानसेभी अधिक है, उनका पालन करनेके लिये मनोनिग्रह करनेमेंही
मनुष्यका मनुष्यत्व है। यही हाल अर्जुनका था। उसकाभी प्रश्न यह नहीं था, कि
लड़ाई करनेपर किसको कितना सुख होगा। उसका श्रीकृष्णसे यही प्रश्न था, कि
“मेरा, अर्थात् मेरे आत्माका श्रेय किसमें है सो मुझे बतलाइये” (गीता. २.७; ३.२)
आत्माका यह नित्यका श्रेय और सुख आत्माकी शांतिमें है। इसी लिये बृहदारण्य-
कोपनिषद् (बृ. २. ४. २) में कहा गया है, कि “अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन”
अर्थात् सांसारिक सुखसंपत्तिके यथेष्ट मिल जानेपरभी आत्मसुख और शांति नहीं
मिल सकती । इसी तरह कठोपनिषद्‌में लिखा है, कि जब मृत्यु नचिकेताको पुत्र,
पौत्र, पशु, धान्य, द्रव्य इत्यादि अनेक प्रकारकी सांसारिक संपत्ति देने सिद्ध हुआ तो
उसने साफ़ जवाब दिया, कि “मुझे आत्मविद्या चाहिये, संपत्ति नहीं।” और 'प्रेय'
अर्थात् इंद्रियोंको प्रिय लगनेवाले सांसारिक सुखमें तथा 'श्रेय' अर्थात् आत्माके सच्चे
कल्याणमें भेद दिखलाते हुए (कठ. १. २. २ में) कहा है, कि :-
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ संपरीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मंदो योगक्षेमाद् वृणीते ॥
“जब प्रेय (तात्कालिक बाह्य इंद्रियसुख) और श्रेय (सच्चा और चिर-
कालिक कल्याण) ये दोनों मनुष्यके सामने उपस्थित होते हैं, तब बुद्धिमान् मनुष्य
उन दोनों में किसी एकको चुन लेता है। जो मनुष्य यथार्थमें बुद्धिमान् होता है, वह
प्रेयकी अपेक्षा श्रेयको अधिक पसंद करता है; परंतु जिसकी बुद्धि मंद होती है,
उसको आत्मकल्याणकी अपेक्षा प्रेय अर्थात् बाह्य सुखही अधिक अच्छा लगता है।”
इस लिये यह मान लेना उचित नहीं, कि संसारमें इंद्रियजन्य विषय-सुखही मनुष्यका
ऐहिक परम उद्देश्य है; तथा मनुष्य जो कुछ करता है वह सब केवल बाह्य अर्थात्
आधिभौतिक सुखहीके लिये अथवा अपने दुःखोंको दूर करनेके लियेही करता है।