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सर्वकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

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पृष्ठ 25

२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ फरवरी, १८८२

कि सन्ध्यादि कर्मों की आवश्यकता नहीं रह जाती। तब कर्मत्याग का अधिकार पैदा हो जाता है – कर्म आप ही आप छूट जाते हैं। उस अवस्था में केवल रामनाम, हरिनाम, या केवल ओंकार का जप करना ही पर्याप्त है।” आपने फिर कहा – “सन्ध्यावन्दन का लय गायत्री में होता है और गायत्री का ओंकार में।”

मास्टर सिधू* के साथ वराहनगर से निकलकर एक बाग से दूसरे बाग में घूमते हुए यहाँ आ पहुँचे थे। रविवार का दिन था – छुट्टी थी, इसलिए घूमने निकले थे। थोड़ी देर पहले श्री प्रसन्न बनर्जी के बाग में घूम रहे थे। उस समय सिधू ने कहा, “गंगाजी के किनारे एक सुन्दर बगीचा है, देखने चलिएगा? वहाँ एक परमहंस रहा करते हैं।”

बगीचे के सामनेवाले फाटक से प्रवेश कर मास्टर और सिधू सीधे श्रीरामकृष्णदेव के कमरे में आए। मास्टर विस्मित होकर देखते हुए सोचने लगे – 'वाह, कैसा सुन्दर स्थान है! कितने अच्छे महात्मा हैं! कैसी सुन्दर वाणी है! यहाँ से हिलने तक की इच्छा नहीं होती।' थोड़ी देर बाद उन्होंने मन में विचार किया, 'एक बार देख आऊँ, कहाँ आया हूँ। फिर यहाँ आकर बैठूँगा।'

मास्टर सिधू के साथ कमरे के बाहर निकले। ठीक उसी समय आरती की मधुर ध्वनि आरम्भ हुई। एक साथ घण्टे, घड़ियाल, झाँझ, मृदंग आदि बज उठे। उद्यान की दक्षिण सीमा से नौबत की मधुर ध्वनि गूँज उठी। वह ध्वनि मानो भागीरथी के वक्ष पर से संचार करती हुई कहीं दूर जाकर विलीन होने लगी। वसन्तसमीर पुष्पों की सुगन्ध लिए मन्द मन्द बह रहा था। चारों ओर ज्योत्स्ना छा गयी। प्रकृति में सर्वत्र मानो देवताओं की आरती का आयोजन हो रहा था। बारह शिवमन्दिर, श्रीराधाकान्त-मन्दिर और श्रीभवतारिणी के मन्दिर में आरती देखकर मास्टर को अत्यन्त प्रसन्नता हुई। सिधू ने बताया, “यह रासमणि का देवस्थान है। यहाँ देवताओं की नित्य सेवापूजा होती है। रोज कई लोग आते हैं, कई साधु-सन्त, ब्राह्मण, भिखारी यहाँ प्रसाद पाते हैं।”

भवतारिणी के मन्दिर से निकलकर दोनों बातचीत करते करते पक्के विस्तीर्ण आँगन पर से चलते हुए पुनः श्रीरामकृष्ण के कमरे के सामने आ पहुँचे। उन्होंने देखा, कमरे का दरवाजा अब भिड़ा लिया गया है।

कमरे के भीतर अभी धूप दिखाया गया है। मास्टर अंग्रेजी पढ़े-लिखे आदमी हैं। सहसा घर में घुस न सकते थे। द्वार पर वृन्दा (कहारिन) खड़ी थी। मास्टर ने पूछा, “साधु महाराज क्या इस समय कमरे के भीतर हैं?” उसने कहा, “हाँ, वे भीतर हैं।”

मास्टर – ये यहाँ कब से हैं?

वृन्दा – ये? बहुत दिनों से हैं।


* श्री सिद्धेश्वर मजुमदार – ये उत्तर वराहनगर में रहते थे।