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सर्वकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 772, कुल 834 में से

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पृष्ठ 772

७७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट ]


दूसरा अध्याय

मातृमण्डल और आकाशलिङ्गका वर्णन

संस्कृत मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
देव्युवाच<br>कथं वीरेश्वरो देव एतदिच्छामि वेदितुम्।<br>कथयस्व प्रसादेन देवदेव महेश्वर॥ १देवी बोलीं—हे देव! वीरेश्वर कैसे उत्पन्न हुए, मैं यह जानना चाहती हूँ; हे देवदेव! हे महेश्वर! आप कृपापूर्वक यह बतायें॥ १॥
ईश्वर उवाच<br>इह आसीत्पुरा राजा नियुक्तिर्नाम विश्रुतः।<br>तस्य भार्या महादेवि अरजा नाम विश्रुता॥ २ईश्वर बोले—हे महादेवि! इस लोकमें पूर्वकालमें नियुक्ति नामसे प्रसिद्ध [एक] राजा था, उसकी भार्या अरजा नामसे विख्यात थी॥ २॥
एकः पुत्रस्तया जातः कालेन बहुना तदा।<br>पादे द्वितीये सम्भूते मूलनक्षत्रसंज्ञके॥ ३<br>मन्त्रिभिश्च तदा देवि उक्ता तत्रेशभामिनी।<br>जातोऽयं दारको देवि पापनक्षत्रसम्भवः॥ ४<br>तस्मात्त्याज्यस्तु बालोऽयं राज्ञा चैव हितार्थिना।बहुत समयके बाद उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। मूल नक्षत्रके दूसरे चरणमें उसके उत्पन्न होनेपर मन्त्रियोंने राजाकी पत्नीसे कहा—हे देवि! यह बालक पापनक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है, अतः [अपने] कल्याणकी इच्छावाले राजाको इस बालकका त्याग कर देना चाहिये॥ ३-४१/२॥
एवमुक्ता तु सा देवि मन्त्रिभिर्हितकाम्यया॥ ५<br>ध्यात्वा चाधोमुखी दीना प्रतिपेदे महेश्वरीम्।हे देवि! हितकी कामनासे मन्त्रियोंके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर दुःखी होकर नीचेकी ओर मुख की हुई उस रानीने ध्यान करके महेश्वरीकी शरण ली॥ ५१/२॥
प्रोवाचेदं तदा धात्रीं बालं गृहीष्व मा चिरम्॥ ६<br>स्वर्लीनस्योत्तरे पार्श्वे मातृभ्यश्च समर्पितम्।<br>रक्षतामिति बालोऽयं मम पुत्र इत्यब्रवीत्॥ ७तब उसने धात्रीसे यह कहा—तुम बालकको शीघ्र ग्रहण करो और स्वर्लीनके उत्तरभागमें इसे मातृकाओंको समर्पित कर दो तथा [उनसे] कहो कि मेरे इस पुत्रकी रक्षा कीजिये॥ ६-७॥
राज्ञ्यास्तु वचनं सर्वं कृतं धातुकया तदा।<br>मातृणां हि तदा बालं निक्षेप्तुमुपचक्रमे॥ ८तदनन्तर धात्रीने रानीके समस्त वचनका पालन किया और उस बालकको मातृकाओंके पास रखनेका उपक्रम किया॥ ८॥
कदाचित्कालपर्याये मातृभिः परिचिन्तितम्।<br>अस्माकं पुत्रतां प्राप्त एष बालो न संशयः॥ ९तब किसी समय कालपर्यायसे मातृकाओंने सोचा कि यह बालक हमलोगोंके पुत्रत्वको प्राप्त हो चुका है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ९॥
अस्माभिर्गन्तुमारब्धं खेचरीचक्रमुत्तमम्।<br>ब्रह्माणी चाब्रवीद्देवि योगपीठं तु नीयताम्॥ १०<br>योगपीठेन दृष्टेन बालो राज्यक्षमो भवेत्।<br>सर्वाभिर्मातृभिश्चाथ तद्वाक्यमभिनन्दितम्॥ ११अब हमलोग उत्तम खेचरीचक्रको जाना आरम्भ करें। इसके बाद हे देवि! ब्रह्माणीने कहा कि इसे योगपीठ ले जाओ, योगपीठके दर्शनसे [यह] बालक राज्य प्राप्त करनेमें समर्थ होगा। तत्पश्चात् सभी मातृकाओंने उस बातका समर्थन किया॥ १०-११॥
नीतो विद्याधरं लोकं योगपीठं च दर्शितम्।<br>आश्वासितो मातृगणैः स्पृष्टः तत्र स बालकः॥ १२<br>कथ्यतां पूर्ववृत्तान्तः पुत्र बालकुमारक।वे उसे विद्याधरलोक ले गयीं और उसे योगपीठका दर्शन कराया। इसके बाद मातृगणोंने उसे आश्वस्त किया और उस बालकसे पूछा—हे पुत्र! हे बालकुमार! अपना पूर्ववृत्तान्त बताओ॥ १२१/२॥
कस्य त्वं पूर्णचन्द्राभ कथं प्राप्तोऽसि नो गृहम्।<br>एवमुक्तस्तदा बालो न किञ्चित्प्रत्यभाषत॥ १३हे पूर्णचन्द्रके समान आभावाले! तुम किसके पुत्र हो और हमलोगोंके घर कैसे आये? तब उनके ऐसा कहनेपर उस बालकने कुछ नहीं कहा॥ १३॥