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सर्वकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 595

| अध्याय ५ ] | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान | ५९३ |
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| सभा च सा भूपपतेः समृद्धा<br>मणिप्रवेकोत्तररत्नचित्रा ।<br>न्यस्तासना माल्यवती सुबद्धा<br>तामाययुस्ते नरराजवर्गाः ॥ ८६ | राजा अम्बरीषकी वह सभा वैभवमयी, अनेकविध श्रेष्ठ मणियों तथा रत्नोंसे चित्रित, उत्तम आसनोंसे सुशोभित, पुष्पमालाओंसे मण्डित और सुव्यवस्थित थी, उस सभामें वे राजागण आये ॥ ८६ ॥ |
| अथापरो ब्रह्मवरात्मजो हि<br>त्रैविद्यविद्यो भगवान् महात्मा।<br>सपर्वतो ब्रह्मविदां वरिष्ठो<br>महामुनिर्नारद आजगाम ॥ ८७ | तत्पश्चात् ब्रह्माके ज्येष्ठ पुत्र, वेदत्रयी विद्याके ज्ञाता, ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, ऐश्वर्यसम्पन्न तथा महान् आत्मावाले महामुनि नारद पर्वतमुनिसहित वहाँ आ गये ॥ ८७ ॥ |
| तावागतौ समीक्ष्याथ राजा सम्भ्रान्तमानसः।<br>दिव्यमासनमादाय पूजयामास तावुभौ ॥ ८८<br>उभौ देवर्षिसिद्धौ तावुभौ ज्ञानविदां वरौ।<br>समासीनौ महात्मानौ कन्यार्थं मुनिसत्तमौ ॥ ८९ | उन दोनोंको आया हुआ देखकर व्याकुल-चित्तवाले राजाने दिव्य आसन प्रदानकर उनकी पूजा की। देवर्षियोंमें विख्यात, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा महान् आत्मावाले वे दोनों मुनिवर कन्याप्राप्तिके लिये सम्यक् रूपसे आसनपर विराजमान हो गये ॥ ८८-८९ ॥ |
| तावुभौ प्रणिपत्याग्रे कन्यां तां श्रीमतीं शुभाम्।<br>सुतां कमलपत्राक्षीं प्राह राजा यशस्विनीम् ॥ ९०<br>अनयोर्यं वरं भद्रे मनसा त्वमिहेच्छसि।<br>तस्मै मालामिमां देहि प्रणिपत्य यथाविधि ॥ ९१ | उन दोनोंके सम्मुख दण्डवत् प्रणाम करके राजाने मनोहर, कमलके समान नेत्रोंवाली तथा यशस्विनी उस पुत्री श्रीमतीसे कहा—हे भद्रे ! इन दोनोंमेंसे जिस वरको तुम मनसे चाहती हो, उसे प्रणाम करके यह माला विधिपूर्वक उसे पहना दो ॥ ९०-९१ ॥ |
| एवमुक्ता तु सा कन्यास्त्रीभिः परिवृता तदा।<br>मालां हिरण्मयीं दिव्यमादाय शुभलोचना ॥ ९२<br>यत्रासीनौ महात्मानौ तत्रागम्य स्थिता तदा।<br>वीक्ष्यमाणा मुनिश्रेष्ठौ नारदं पर्वतं तथा ॥ ९३ | राजाके ऐसा कहनेपर स्त्रियोंसे घिरी हुई सुन्दर नेत्रोंवाली वह कन्या सुवर्णमयी दिव्य माला लेकर, जहाँ वे दोनों महात्मा बैठे थे, वहीं आकर उन मुनिश्रेष्ठों नारद तथा पर्वतको देखती हुई वहीं स्थित हो गयी ॥ ९२-९३ ॥ |
| शाखामृगाननं दृष्ट्वा नारदं पर्वतं तथा।<br>गोलाङ्गूलमुखं कन्या किञ्चित् त्राससमन्विता ॥ ९४<br>सम्भ्रान्तमानसा तत्र प्रवातकदली यथा।<br>तस्थौ तामाह राजासौ वत्से किं त्वं करिष्यसि ॥ ९५<br>अनयोरेकमुद्दिश्य देहि मालामिमां शुभे।<br>सा प्राह पितरं त्रस्ता इमौ तौ नरवानरौ ॥ ९६ | नारदको लंगूरके समान मुखवाला तथा पर्वतको वानरके समान मुखवाला देखकर वह कन्या कुछ डर-सी गयी। व्याकुल चित्तवाली वह कन्या वायु-प्रकम्पित कदलीकी भाँति [काँपती हुई] वहाँ स्थित रही। तब उस राजाने उससे कहा—हे वत्से ! तुम अब क्या करोगी ? हे शुभे ! इन दोनोंमेंसे किसी एकको चुनकर उसे माला पहना दो ॥ ९४-९५ १/२ ॥ |
| मुनिश्रेष्ठं न पश्यामि नारदं पर्वतं तथा।<br>अनयोर्मध्यतस्त्वेकमुनषोडशवार्षिकम् ॥ ९७<br>सर्वाभरणसम्पन्नमतसीपुष्पसन्निभम् ।<br>दीर्घबाहुं विशालाक्षं तुङ्गोरस्थलमुत्तमम् ॥ ९८ | डरी हुई उस कन्याने पितासे कहा—ये दोनों तो नरवानरकी आकृतिवाले हैं; मुनिश्रेष्ठ नारद तथा पर्वत तो मुझे दिखायी ही नहीं पड़ रहे हैं। [अपितु] इन दोनोंके मध्यमें सोलह वर्षसे थोड़ी कम आयुवाले, समस्त आभरणोंसे सम्पन्न, अतसी-पुष्पके समान [नील] |