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सर्वकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 834 में से

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पृष्ठ 459

अध्याय ८९ ] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४५७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथैनमवमन्यन्ते परे परिभवन्ति च।<br>तथा युक्तं चरेद्भैक्ष्यं सतां धर्ममदूषयन् ॥ १३अंगाररहित हो जानेपर अर्थात् अग्निके शीतल हो जानेपर और सभीलोगोंके भोजन कर चुकनेपर [उस घरमें] भिक्षा प्राप्त करे एवं उन घरोंमें प्रतिदिन भिक्षा ग्रहण न करे, अन्यथा दूसरे लोग अपमान करेंगे तथा निन्दा करेंगे। अतः सज्जनोंके धर्मको दूषित न करते हुए उचित भिक्षा प्राप्त करनी चाहिये॥ ११-१३॥
भैक्ष्यं चरेद्वनस्थेषु यायावरगृहेषु च।<br>श्रेष्ठा तु प्रथमा हीयं वृत्तिरस्योपजायते ॥ १४<br><br>अत ऊर्ध्वं गृहस्थेषु शीलीनेषु चरेद् द्विजाः।<br>श्रद्दधानेषु दान्तेषु श्रोत्रियेषु महात्मसु ॥ १५<br><br>अत ऊर्ध्वं पुनश्चापि अदुष्टापतितेषु च।<br>भैक्ष्यचर्या हि वर्णेषु जघन्या वृत्तिरुच्यते ॥ १६वनमें रहनेवालोंके यहाँ तथा यायावरोंके घरोंमें भिक्षा माँगनी चाहिये। यह योगीकी सर्वश्रेष्ठ वृत्ति होती है। हे ब्राह्मणो! इसके बाद श्रेष्ठ आचारवाले, दानशील, श्रद्धालु, श्रोत्रिय तथा महात्मा गृहस्थोंके यहाँ भिक्षा प्राप्त करनी चाहिये। इसके बाद दुष्टतारहित तथा अपतित लोगोंके यहाँ भी भिक्षा ग्रहण करे, किंतु सभी वर्णोंके यहाँ भिक्षा माँगना जघन्य वृत्ति कही जाती है॥ १४-१६॥
भैक्ष्यं यवागूस्तक्रं वा पयो यावकमेव च।<br>फलमूलादि पक्वं वा कणपिण्याकसक्तवः ॥ १७<br><br>इत्येते वै मया प्रोक्ता योगिनां सिद्धिवर्धनाः।<br>आहारास्तेषु सिद्धेषु श्रेष्ठं भैक्ष्यमिति स्मृतम् ॥ १८यवागू, मट्ठा, दूध, यावक (जौसे बना भोजन), पके हुए फल-मूल, टूटे हुए अनाज, तिल और सत्तू भिक्षामें ग्रहण करना चाहिये। [हे ऋषियो!] मैंने योगियोंकी सिद्धिकी वृद्धि करनेवाले उन आहारोंको बता दिया; उनके प्राप्त हो जानेपर इसे श्रेष्ठ भिक्षा कहा गया है॥ १७-१८॥
अब्बिन्दुं यः कुशाग्रेण मासि मासि समश्नुते।<br>न्यायतो यश्चरेद्भैक्ष्यं पूर्वोक्तात्स विशिष्यते ॥ १९<br><br>जरामरणगर्भेभ्यो भीतस्य नरकादिषु।<br>एवं दाययते तस्मात्तद्भैक्ष्यमिति संस्मृतम् ॥ २०जो [व्यक्ति] प्रत्येक महीनेमें कुशाके अग्र भागसे जलबिन्दु ग्रहण करता है और न्यायपूर्वक भिक्षाटन करता है; वह पूर्वमें कहे गये [भिक्षार्थी]-से श्रेष्ठ होता है। वृद्धावस्था, मृत्यु, गर्भवास तथा नरक आदिसे भयभीत संन्यासीकी भिक्षा दायभागके समान है, इसीलिये इसे भैक्ष्य कहा जाता है॥ १९-२०॥
दधिभक्षाः पयोभक्षा ये चान्ये जीवक्षीणाकाः।<br>सर्वे ते भैक्ष्यभक्षस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २१<br><br>भस्मशायी भवेन्नित्यं भिक्षाचारी जितेन्द्रियः।<br>य इच्छेत्परमं स्थानं व्रतं पाशुपतं चरेत् ॥ २२जो दही तथा दूधका सेवन करनेवाले हैं और जो अन्य लोग [कृच्छ्र आदि व्रतोंके द्वारा] शरीरको क्षीण करनेवाले हैं; वे सब भिक्षावृत्तिवालेकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जो परम पद चाहता है, उसे नित्य भस्ममें शयन करना चाहिये, भिक्षाटन करना चाहिये, इन्द्रियोंको वशमें रखना चाहिये और पाशुपतव्रत करना चाहिये॥ २१-२२॥
योगिनां चैव सर्वेषां श्रेष्ठं चान्द्रायणं भवेत्।<br>एकं द्वे त्रीणि चत्वारि शक्तितो वा समाचरेत् ॥ २३चान्द्रायणव्रत सभी योगियोंके लिये उत्तम होता है। [अपनी] शक्तिके अनुसार इसे एक, दो, तीन