श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
महाकर्णः प्रभातश्च महाभूतप्रमर्दनः। प्रभात, महाभूतप्रमर्दन, श्येनजित्, शिवदूत-ये प्रीति-
श्येनजिच्छिवदूतश्च प्रमथाः प्रीतिवर्धनाः ॥ ८२ वर्धक प्रमथगण और करोड़ों-करोड़ों भूतोंसहित माताएँ
महादेवकी कृपासे [मेरे] भय तथा पापको सर्वदा दूर
कोटिकोटिशतैश्चैव भूतानां मातरः सदा।
करें ॥ ८१-८३ ॥
व्यपोहन्तु भयं पापं महादेवप्रसादतः ॥ ८३
जो एकमात्र शिवके ध्यानमें तल्लीन, हिमालयसे
शिवध्यानैकसम्पन्नो हिमराडम्बुसन्निभः। प्रादुर्भूत गंगाके जलके समान पापनाशक, कुन्द [पुष्प]
कुन्देन्दुसदृशाकारः कुम्भकुन्देन्दुभूषणः ॥ ८४ तथा चन्द्रमाके समान आकारवाले, कुम्भ-कुन्दपुष्पों
तथा इन्दुको भूषणके रूपमें धारण करनेवाले, बड़वानलके
वडवानलशत्रुर्यो वडवामुखभेदनः।
शत्रु, बड़वाके मुखका भेदन करनेवाले हैं, चार पैरोंवाले,
चतुष्पादसमायुक्तः क्षीरोद इव पाण्डुरः ॥ ८५
क्षीरसागरके समान पाण्डुर वर्णवाले, रुद्रों तथा
रुद्रलोके स्थितो नित्यं रुद्रैः सार्धं गणेश्वरैः। गणेश्वरोंके साथ सदा रुद्रलोकमें रहनेवाले, विश्वको
वृषेन्द्रो विश्वधृग्देवो विश्वस्य जगतः पिता ॥ ८६ धारण करनेवाले, सम्पूर्ण जगत्के पिता, नन्दा आदि
माताओंसे सदा घिरे हुए, यज्ञका नाश करनेवाले तथा
वृतो नन्दादिभिर्नित्यं मातृभिर्मखमर्दनः।
शिवार्चनपरायण हैं-वे वृषेन्द्र मेरे पापको सदा दूर
शिवार्चनरतो नित्यं स मे पापं व्यपोहतु ॥ ८७
करें ॥ ८४-८७ ॥
गङ्गा माता जगन्माता रुद्रलोके व्यवस्थिता। रुद्रलोकमें स्थित जगज्जननी गंगामाता मेरे पापको
शिवभक्ता तु या नन्दा सा मे पापं व्यपोहतु ॥ ८८ दूर करें। जो शिवभक्त नन्दा नामक गौ हैं, वे मेरे
पापको दूर करें। भद्रपदवाली, शिवलोकमें स्थित,
भद्रा भद्रपदा देवी शिवलोके व्यवस्थिता।
गायोंकी माता महाभाग्यशालिनी जो देवी भद्रा नामक
माता गवां महाभागा सा मे पापं व्यपोहतु ॥ ८९ गौ हैं, वे मेरे पापको दूर करें। सब प्रकारसे कल्याण
सुरभिः सर्वतोभद्रा सर्वपापप्रणाशनी। करनेवाली, सभी पापोंका नाश करनेवाली तथा सदा
रुद्रपूजारता नित्यं सा मे पापं व्यपोहतु ॥ ९० रुद्रपूजामें लीन रहनेवाली वे सुरभि नामक गौ मेरे
पापको दूर करें। शीलसे सम्पन्न, ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली,
सुशीला शीलसम्पन्ना श्रीप्रदा शिवभाविता। शिवभक्त तथा नित्य शिवलोकमें रहनेवाली वे सुशीला
शिवलोके स्थिता नित्यं सा मे पापं व्यपोहतु ॥ ९१ नामक गौ मेरे पापको दूर करें ॥ ८८-९१ ॥
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः सर्वकार्याभिचिन्तकः। वेदों तथा शास्त्रोंके अर्थ तथा तत्त्वके ज्ञाता,
समस्तगुणसम्पन्नः सर्वदेवेश्वरात्मजः ॥ ९२ समस्त कार्योंका चिन्तन करनेवाले, सभी गुणोंसे सम्पन्न,
सर्वदेवेश्वर [शिव]-के पुत्र, श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, सौम्य,
ज्येष्ठः सर्वेश्वरः सौम्यो महाविष्णुप्रतनुः स्वयम्। साक्षात् महाविष्णुके विग्रहस्वरूप, देवताओंके सेनापति,
आर्यः सेनापतिः साक्षाद् गहनो मखमर्दनः ॥ ९३ गम्भीरतासे युक्त, यज्ञको विनष्ट करनेवाले, ऐरावत
हाथीपर सवार, काले तथा घुँघराले केशवाले, कृष्णवर्णके
ऐरावतगजारूढः कृष्णकुञ्चितमूर्धजः।
अंगवाले, लाल नेत्रोंवाले, चन्द्रमा तथा सर्पके
कृष्णाङ्गो रक्तनयनः शशिपन्नगभूषणः ॥ ९४
आभूषणवाले, भूतों-प्रेतों-पिशाचों तथा कूष्माण्डोंसे
भूतैः प्रेतैः पिशाचैश्च कूष्माण्डैश्च समावृतः। घिरे हुए और शिवार्चनमें तल्लीन वे आर्य कालभैरव
शिवार्चनरतः साक्षात् स मे पापं व्यपोहतु ॥ ९५ मेरे पापको दूर करें ॥ ९२-९५॥