श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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श्रीलिङ्गमहापुराण
[ पूर्वभाग
खट्वाङ्गधारिणी दिव्या कराग्रतरुपल्लवा।
खट्वांग धारण करनेवाली, दिव्य, हाथके अग्रभागमें
नैगमेयादिभिर्दिव्यैश्चतुर्भिः पुत्रकैर्वृता ॥ १६
वृक्षका पल्लव धारण करनेवाली, नैगमेय* आदि चारों
मेनाया नन्दिनी देवी वारिजा वारिजेक्षणा।
दिव्य पुत्रोंसे घिरी हुई, मेनाकी पुत्री, जलसे उत्पन्न,
अम्बा या वीतशोकस्य नन्दिनश्च महात्मनः ॥ १७
कमलके समान नेत्रोंवाली, शोकरहित महात्मा नन्दीकी
अम्बा (माता), शुभावतीकी सखी, शान्त स्वभाववाली,
शुभावत्याः सखी शान्ता पञ्चचूडा वरप्रदा।
पंचचूड़ा, वर प्रदान करनेवाली, सभी प्राणियोंकी
सृष्ट्यर्थं सर्वभूतानां प्रकृतित्वं गताव्यया ॥ १८
सृष्टिके लिये प्रकृतिके स्वरूपको प्राप्त, अव्यय
त्रयोविंशतिभिस्तत्त्वैर्महदाद्यैर्विजृम्भिता ।
(शाश्वत), महत् आदि तेईस तत्त्वोंसे सम्पन्न, लक्ष्मी
लक्ष्मादिशक्तिभिर्नित्यं नमिता नन्दनन्दिनी ॥ १९
आदि शक्तियोंसे सदा नमस्कृत, नन्दनन्दिनी, महादेवी
मनोन्मनी महादेवी मायावी मण्डनप्रिया।
मनोन्मनी, मायामयी, अलंकरणसे प्रीति करनेवाली,
मायया या जगत्सर्वं ब्रह्माद्यं सचराचरम् ॥ २०
[अपनी] मायासे ब्रह्मा आदि तथा चराचरसहित सम्पूर्ण
क्षोभिणी मोहिनी नित्यं योगिनां हृदि संस्थिता।
जगत्को क्षुब्ध एवं मोहित करनेवाली, योगियोंके
एकानेकस्थिता लोके इन्दीवरनिभेक्षणा ॥ २१
हृदयमें सर्वदा विराजमान, संसारमें एक तथा अनेक
रूपोंमें स्थित, नीलकमलके समान नेत्रोंवाली, गणेश्वरों-
भक्त्या परमया नित्यं सर्वदेवैरभिष्टुता।
ब्रह्मा-इन्द्र-यम-कुबेर आदि सभी देवताओंके द्वारा परम
गणेश्राम्भोजगर्भेन्द्रयमवित्तेशपूर्वकैः ॥ २२
भक्तिसे नित्य स्तुत होनेवाली, [उनके द्वारा] स्तुत होकर
संस्तुता जननी तेषां सर्वोपद्रवनाशिनी।
उनकी माताके रूपमें सभी विपत्तियोंका नाश करनेवाली,
भक्तानामार्तिहा भव्या भवभावविनाशिनी ॥ २३
भक्तोंके कष्टोंका हरण करनेवाली, भव्य, सांसारिक
भावोंको नष्ट करनेवाली, दिव्य और बिना प्रयासके
भुक्तिमुक्तिप्रदा दिव्या भक्तानामप्रयत्नतः।
सा मे साक्षान्महादेवी पापमाशु व्यपोहतु ॥ २४
भक्तोंको भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं—वे साक्षात्
महादेवी मेरे पापको शीघ्र दूर करें ॥ १३–२४॥
चण्डः सर्वगणेशानो मुखाच्छम्भोर्विनिर्गतः।
जो सभी गणोंके ईश, शम्भुके मुखसे निकले हुए,
शिवार्चनरतः श्रीमान् स मे पापं व्यपोहतु ॥ २५
शिवार्चनमें लीन तथा श्रीयुक्त चण्ड हैं; वे मेरे पापको
शालङ्कायनपुत्रस्तु हलमार्गोत्थितः प्रभुः।
दूर करें। शालंकायनके पुत्र, हलमार्गसे उत्पन्न, ऐश्वर्यशाली,
जामाता मरुतां देवः सर्वभूतमहेश्वरः ॥ २६
मरुतोंके जामाता, देवता, सभी भूतोंके महेश्वर, सर्वव्यापी,
सर्वगः सर्वदृक् शर्वः सर्वेशसदृशः प्रभुः।
सर्वद्रष्टा, शर्व, सर्वेश्वरके समान प्रभुत्वसम्पन्न, नारायण-
सनारायणकैर्देवैः सेन्द्रचन्द्रदिवाकरैः ॥ २७
इन्द्र-चन्द्र-सूर्य आदि देवताओं-सिद्धों-यक्षों-गन्धर्वों-
सिद्धैश्च यक्षगन्धर्वैर्भूतैर्भूतविधायकैः।
भूतों, भूतोंका सृजन करनेवालों-उरगों-ऋषियों-महात्मा
उरगैर्ऋषिभिश्चैव ब्रह्मणा च महात्मना ॥ २८
ब्रह्माके द्वारा स्तुत, तीनों लोकोंके स्वामी, मुनियोंके
स्तुतस्त्रैलोक्यनाथस्तु मुनिरन्तःपुरं स्थितः।
हृदयमें विराजमान और सबके द्वारा सर्वदा पूजित नन्दी
सर्वदा पूजितः सर्वैर्नन्दी पापं व्यपोहतु ॥ २९
[मेरे] पापको दूर करें ॥ २५–२९ ॥
- सुश्रुतसंहिताके उत्तरतन्त्र अध्याय २७-३७ तकमें छोटे शिशुओंमें जो रोग होते हैं, उन्हें ग्रहोंसे उत्पन्न बताया गया है। स्कन्दग्रह, स्कन्दापस्मार, शकुनी, रेवती, पूतना, अन्धपूतना, शीतपूतना, मुखमण्डिका और नैगमेय (पितृग्रह)—ये नौ ग्रह बताये गये हैं। इन नौ ग्रहोंसे पीड़ित बालकके लक्षण अलग-अलग होते हैं। लक्षणोंके आधारपर यह ज्ञान होता है कि बालक अमुक ग्रहसे पीड़ित है। नैगम ग्रहसे पीड़ित बालकके मुखसे झाग गिरता है, वह हर समय बेचैन रहता है तथा ऊपरकी ओर देखता हुआ बराबर रोता है,