सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/42-51 ]
स्रोत हैं, तथापि प्राकृत सहजिया आदि लोग उन्हें अपने
जैसे एक 'कुणपात्मवादी' (कफ-वात-पित्त-इन तीन
धातुओंसे बने इस शरीरको आत्मा माननेवाले) और
यमदण्डके भागी जड़ेन्द्रिय-भोगोंमें लिप्त जन्म-मरणके
चक्रमें बँधे जीवमात्र मानते हैं। इस अपराधके कारण
वे लोग नरक-पथके ही पथिक बनते हैं। ऐसे लोग
कनक-कामिनी-प्रतिष्ठाके लोभी, व्यापारी-स्वभाववाले
और स्वार्थपरायण होते हैं। वे अज्ञानी लोगोंको ठगनेके
अपने व्यवसायका, दुर्भावनाके कारण 'सर्वत्र निन्दित
स्त्रीसङ्ग'की लालसाका और गृहव्रत अथवा गृहेमेध-
धर्मका अन्याय और अशास्त्रीय विचारसे समर्थन
करनेका सुयोग ढूँढ़ते हैं। इसलिये वे अपने उपजाऊ
मस्तिष्कमें ऐसे शास्त्रविरुद्ध मतको उत्पन्न करके
श्रीनित्यानन्द प्रभुका उदाहरण देकर उनकी ईश्वर-चेष्टाओं
अर्थात् लीलाओंकी नकल करते हैं। वास्तवमें,
महावदान्य श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीकृष्णप्रेमदाता महाप्रभुके
अभिन्न प्रकाश-विग्रह हैं। ब्रह्माजीने वंशवृद्धिके द्वारा
सृष्टिकी रक्षाके लिये रजोगुणाश्रित प्रजापतियोंको आदेश
दिया था। परन्तु श्रीनित्यानन्द प्रभुको वैसे इन्द्रिय-तृप्तिरूपी
कार्यके सहायकके रूपमें किसी आदेशकी बात किसी
प्रामाणिक ग्रन्थमें नहीं लिखी है, और हो भी नहीं
सकती, क्योंकि वह किसी प्रकारसे श्रवणके योग्य नहीं
है। ऐसी बातोंका प्रचार करके प्राकृत-स्त्रीसङ्गी-सहजिया
लोग स्वयं तो परमार्थसे वञ्चित होते ही हैं, और साथ
ही सद्-असद्के विवेकसे हीन जगत्की भी वञ्चना
करके जगत्में अमङ्गल ही उत्पन्न करते हैं॥42॥
श्रीवासाङ्गनमें नित्य नृत्य करनेको अङ्गीकार करना :-
श्रीवास-पण्डिते प्रभु करि' आलिङ्गन।
कण्ठे धरि' कहे तारे मधुर वचन॥45॥
“तोमार घरे कीर्त्तने आमि नित्य नाचिब।
तुमि देखा पाबे, आर केह ना देखिब॥46॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीवास पण्डितको आलिङ्गन
करके उनके गलेमें अपनी भुजा डालकर उन्हें मधुर
वचन कहे, - “तुम्हारे घरमें होनेवाले कीर्तनमें मैं नित्य
नृत्य करूँगा, तुम मुझे नृत्य करते हुए देख पाओगे,
अन्य कोई भी नहीं देख पायेगा॥"45-46॥
मातृवत्सल महाप्रभुका माताको सान्त्वना देनेके लिये
श्रीवासके हाथमें वस्त्रके टुकड़ेको देना और माताके त्याग
हेतु अपराधके लिये क्षमा-प्रार्थना :-
एइ वस्त्र माताके दिह', एइ सब प्रसाद।
दण्डवत् करि' आमार क्षमाइह अपराध॥47॥
अनुवाद-(वस्त्रके एक खण्ड और प्रसादको उनके
हाथोंमें देते हुए महाप्रभुने आगे कहा-) यह सब
माताको दे देना। मेरी ओरसे उन्हें दण्डवत् करके मेरे
द्वारा किये गये अपराधके लिये उनसे क्षमा माँगना॥47॥
वात्सल्यरस-विरोधी संन्यास-वेष-ग्रहण-हेतु
स्वयंको धिक्कार देना :-
ताँर सेवा छाड़ि' आमि करियाछि संन्यास।
धर्म नहे, करि आमि निज-धर्मनाश॥48॥
ताँर प्रेम-वश आमि, ताँर सेवा-धर्म।
ताहा छाड़ि' करियाछि वातुलरे कर्म॥49॥
वातुल बालकेर माता नाहि लय दोष।
एइ जानि' माता मोरे ना करय रोष॥50॥
कि काय संन्यासे मोर, प्रेम निज-धन।
ये-काले संन्यास कैलूँ, छत्र हैल मन॥51॥
अनुवाद-उनकी सेवाको छोड़कर मैंने संन्यास
ग्रहण किया है, यह कोई धर्मका कार्य नहीं है। ऐसा
करके मैंने अपने धर्मका नाश किया है। मैं उनके
प्रेमके वशीभूत हूँ और उनकी सेवा करना ही मेरा धर्म
है। उस धर्मको छोड़कर मैंने पागल व्यक्ति जैसा कार्य
किया है। माता अपने पागल बालकका कोई दोष नहीं
लेती। ऐसा जानकर ही माता मेरे प्रति क्रोध नहीं
करती। माताका प्रेम जो मेरा वास्तविक धन है, उसका
। 7

[ 15/48-51 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
त्याग करके मुझे संन्यास नहीं लेना चाहिये था। मैंने
जिस समय संन्यास ग्रहण किया था, उस समय मेरा
मन विक्षिप्त (पागल) हो गया था॥48-51॥
अनुभाष्य—मैं संन्यास लेकर माताके सेवारूपी
धर्मका पालन नहीं करके धर्मसे भ्रष्ट हुआ हूँ॥48॥
अमृताणुकणा—श्रीमद्भगवद्गीतामें (18/66) भगवान्
श्रीकृष्णने स्वयं घोषणा की है-
“सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”
इसलिये उसके अनुसार सब प्रकारके नश्वर
धर्मोंका परित्याग करनेवाले श्रीकृष्णके एकान्त शरणागत
किसी संन्यासीके लिये पुनः किसी नश्वर धर्मका पालन
न करनेसे जनित पापकी आशङ्का नहीं रह सकती है।
धर्मकी संस्थापनाके लिये अवतीर्ण स्वयं भगवान्
श्रीगौरसुन्दरने गीतामें अपने कहे गये उक्त वाक्यकी ही
परम-सार्थकता सम्पादन करनेके लिये स्वयं ही सभी
धर्मोंको त्यागकर और संन्यास ग्रहण करके श्रीकृष्णकी
शरण ग्रहण करनेका उज्ज्वलतम दृष्टान्त स्थापित किया
था। इसलिये “ताँहार सेवा छाड़ि' आमि करियाछि
संन्यास। धर्म নহে, करि आमि निज धर्म नाश॥” आदि
वचनके द्वारा उनकी कोई जड़ासक्तिका आश्रय सूचित
नहीं होता है, बल्कि शचीमाताके साथ उनका नित्य
सम्बन्ध ही इसके द्वारा ज्ञापित हुआ है।
शचीमाता श्रीगौरसुन्दरकी नित्यसिद्ध पार्षद हैं। वे
वात्सल्य-रसकी मूल आश्रय-विग्रह हैं। विषय-विग्रह
और आश्रय-विग्रह दोनोंके मध्य परस्पर जो नित्य
सेव्य-सेवकका सम्बन्ध है, वह कोई जड़ीय या नश्वर
सम्बन्ध नहीं है—उसे ही श्रीगौरसुन्दरने श्रीवास पण्डितको
बतलाया है। भक्तके प्रति भगवान्का जो 'निजधर्म' है,
उसको उन्होंने स्वयं ही व्यक्त किया है—“ये यथा मां
प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्” (गीता 4/11)।
शचीमाता वात्सल्य-रसमें श्रीगौरहरिकी नित्य उपासिका
हैं, इसलिये उनसे उक्त रसमें सेवा ग्रहण करना ही
श्रीगौरसुन्दरका 'निजधर्म' है। “ताँर प्रेम वश आमि, ताँर
सेवा-धर्म।” वहाँपर संन्यास-ग्रहण वात्सल्य-रसका विरोधी
होनेपर उनका उक्त 'निजधर्म' बाहरी रूपसे नाश हुआ।
किन्तु परोक्षरूपसे उन्होंने अपनी अचिन्त्यशक्तिके बलसे
शचीमाताके निकट जाकर उनकी प्रेमसेवा ग्रहण करके
उस 'निजधर्म'का ही पालन किया। “नित्य याइ देखि
मुञि ताँहार चरणे। स्फूर्त्तिज्ञाने तेंहो सत्य नाहि माने॥”
(मध्यलीला 15/53)
श्रीगौरसुन्दर यहाँपर अपने विषयविग्रहोचित-भावको
व्यक्त करते हुये कह रहे हैं,—“कि काय संन्यासे मोर,
प्रेम निज धन।” श्रीकृष्ण सेवामें नियोजित होना ही
त्रिदण्डी भिक्षुका एकमात्र व्रत है और श्रीकृष्णप्रेमधन ही
उसके उस निवॄत्तिमार्गका 'महाफल' है। किन्तु वह
प्रेमधन श्रीगौरसुन्दरका एकान्त अपना—“प्रेम निजधन”
है। अद्वयज्ञान-परतत्त्व श्रीगौरसुन्दर अपने नित्य प्रेममय
परिकरों और धामके साथ स्वयं पूर्ण तत्त्व हैं। इसलिये
उक्त प्रेमधनके लिये उनको संन्यास ग्रहण करनेकी कोई
अपेक्षा नहीं है। “न मे पार्थास्ति कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु
किञ्चन।” (गीता 3/22)
ऐसा होनेपर तब उनके संन्यास ग्रहण करनेका
क्या कारण है? इसके उत्तरमें कहते हैं—“ये काले
संन्यास कैलु, छत्र हैल मन।” श्रीकृष्ण सम्भोग-विग्रह
हैं, श्रीराधा विप्रलम्भ-मूर्ति हैं और श्रीगौररूपी कृष्ण
श्रीराधाभावोंके आस्वादनकारी हैं। उन श्रीराधाभावोंका
आस्वादन करनेके लिये विप्रलम्भ-महाभावमें जो प्रबल
श्रीकृष्ण-अन्वेषणकी चेष्टा और श्रीकृष्णसे इतर विषयोंसे
जो तीव्र वैराग्य है, उससे प्रेरित होकर ही श्रीगौरकृष्णने
मुख्यतः संन्यास ग्रहण किया। “प्रभु बोले,—शुन सार्वभौम
महाशय। 'संन्यासी' आमारे नाहि जानिह निश्चय॥
कृष्णेर विरहे मुञि विक्षिप्त हइया। बाहिरे हइलुँ
शिखा-सूत्र मुड़ाइया॥” (चैः भाः अः 3/66-67)।
अर्थात् यहाँपर उनका वह सुतीव्र विप्रलम्भजनित
दिव्योन्माद ही उक्त 'छन्न हैल मन' वाक्यका मुख्य
तात्पर्य है और दूसरे प्रकारसे उक्त वाक्यसे पाखण्डी
मायावादी, कर्मनिष्ठ, निन्दक आदि जीवोंके उद्धार
8 |

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/48-62 ]

करनेकी वासनाके द्वारा उनके आवृत्त-चित्तको ही
समझना चाहिये॥ 48-51॥

मायापुरमें बीच-बीचमें शचीमाताके
दर्शनके लिये आगमन स्वीकार करना :-
नीलाचले आछि मुञि ताँहार आज्ञाते।
मध्ये मध्ये आसिमु, ताँर चरण देखिते॥ 52 ॥

अनुवाद—मैं नीलाचलमें उन्हींकी आज्ञासे ही वास
कर रहा हूँ। मैं बीच-बीचमें उनके चरणोंके दर्शन
करनेके लिये आऊँगा॥ 52 ॥

पहलेसे ही नित्य शचीमाताके साथ साक्षात्कार, किन्तु
महाप्रभुकी मायाके प्रभावसे शचीमाताका संशय :-
नित्य याइ' देखि मुञि ताँहार चरणे।
स्फूर्त्ति-ज्ञाने तैं हो ताहा सत्य नाहि माने॥ 53 ॥

अनुवाद—वास्तवमें तो मैं प्रतिदिन जाकर उनके
चरणोंका दर्शन करता हूँ, किन्तु वे इसे स्फूर्ति
समझनेके कारण उसे सत्य नहीं मानती॥ 53 ॥

शचीमाताके विश्वासको उत्पन्न करनेके लिये
एक दिनकी घटनाका वर्णन :-
एकदिन शाल्यन्न, व्यञ्जन पाँच-सात।
शाक, मोचा-घण्ट, भृष्ट-पटोल-निम्बपात॥ 54 ॥
लेम्बु-आदाखण्ड, दधि, दुग्ध, खण्डसार।
शालग्रामे समर्पिलैन बहु उपहार॥ 55 ॥

अनुवाद—एक दिन माताने शाल्यन्न (विशेष प्रकारके
चावल), पाँच-सात प्रकारके व्यञ्जन, साग, केलेके
फूलोंकी बनी सब्जी, नीमकी पत्तियोंके साथ बने
परमल, नीबूँ और अदरकके टुकड़े, दही, दूध तथा
खण्डसार आदि बहुतसे नैवेद्य शालग्रामको समर्पित
किये॥ 54-55 ॥

अनुभाष्य—'शाल्यन्न'—शालि-धानके चावलका अन्न;
'भृष्ट-पटोल-निम्बपात'—नीमके पत्तोंके साथ परमलको
मिलाकर बनायी गयी सूखी भाजी॥ 54 ॥


प्रसाद लञा कोले करेन क्रन्दन।
'निमाइर प्रिय मोर—एसब व्यञ्जन॥ 56 ॥
निमाइ नाहिक एथा, के करे भोजन।'
मोर ध्याने अश्रुजले भरिल नयन॥ 57 ॥
शीघ्र याइ' मुञि सब करिनु भक्षण।
शून्यपात्र देखि' अश्रु करिया मार्जन॥ 58 ॥

अनुवाद—प्रसादको अपनी गोदमें लेकर माता रोते
हुए सोचने लगीं,—'ये सब व्यञ्जन मेरे निमाइको बहुत
प्रिय हैं, किन्तु निमाइ यहाँपर नहीं है, तो कौन इन्हें
खायेगा?' इस प्रकार मेरा ध्यान करते हुए उनके नेत्र
आँसुओंसे भर गये। मैंने शीघ्रतासे वहाँ जाकर वे सब
व्यञ्जन खा लिये। माताने पात्रको खाली देखकर अपने
आँसुओंको पोंछा॥ 56-58 ॥

'के अन्न-व्यञ्जन खाइल, शून्य केने पात?
बालगोपाल किंवा खाइल सब भात?॥ 59 ॥
किंवा मोर कथाय मने भ्रम हञा गेल!
किंवा कोन जन्तु आसिं सकल खाइल?॥ 60 ॥
किंवा आमि अन्न पात्रे भ्रमे ना बाड़िल।'
एत चिन्ति' पाक-पात्र याञा देखिल॥ 61 ॥

अनुवाद—'अरे! किसने चावल और ये सब
व्यञ्जन खाये, पात्र खाली क्यों है? क्या बालगोपालने
सब चावल खा लिये? या फिर मेरी बातोंसे मेरे ही
मनमें भ्रम उत्पन्न हो गया है। या फिर किसी जन्तुने
आकर यह सब खा लिया? या फिर मैंने इस पात्रमें
भ्रमवशतः कुछ रखा ही नहीं था।' यह सोचकर माता
रसोईमें भोजन बनानेवाले बर्तनोंको जाकर देखने
लगीं॥ 59-61 ॥

अन्नव्यञ्जनपूर्ण देखि' सकल भाजने।
देखिया संशय हैल किछु चमत्कार मने॥ 62 ॥

अनुवाद—चावल और अन्यान्य सभी व्यञ्जनोंसे

| 9

[ 15/62-72 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भरे बर्तनोंको देखकर माताके मनमें कुछ संशय हुआ
तथा साथ ही मनमें कुछ आश्चर्य भी हुआ ॥ 62 ॥
अनुभाष्य- 'भाजन'-आधार, पात्र ॥ 62 ॥
ईशाने बोलाञा पुनः स्थान लेपाइल।
पुनरपि गोपालके अन्न समर्पिल ॥ 63 ॥
अनुवाद-माताने ईशानको बुलाकर पुनः उस
स्थानको साफ करवाया और उन्होंने पुनः गोपालको
नैवेद्य समर्पित किया ॥ 63 ॥
अनुभाष्य- 'ईशान'-आदिलीला 10/110 संख्या
देखें ॥ 63 ॥
एइमत यबे करेन उत्तम रन्धन।
मोरे खाओयाइते करे उत्कण्ठाय रोदन ॥ 64 ॥
अनुवाद-इस प्रकार माता जब भी उत्तम-उत्तम
व्यञ्जन बनाती हैं, तभी मुझे खिलानेकी उत्कण्ठामें
रोती हैं ॥ 64 ॥
ताँर प्रेमे आनि' आमाय कराय भोजने।
अन्तरे सुख माने तैँहो, बाह्ये नाहि माने ॥ 65 ॥
अनुवाद-उनका प्रेम मुझे वहाँ ले जाकर मुझे
भोजन कराता है। माता अपने मनमें तो सुखी होती
हैं, किन्तु बाहरसे मेरे आनेको नहीं मानतीं ॥ 65 ॥
पिछली विजया-दशमीमें भी इसी प्रकार माताके द्वारा
बनाये गये अन्नका भोजन :-
एइ विजया-दशमीते हैल एइ रीति।
ताँहाके पुछिया ताँर कराइह प्रीति ॥” 66 ॥
अनुवाद-पिछली विजया-दशमीके दिन भी ऐसा
ही हुआ था। मातासे इस विषयमें पूछकर उन्हें इसका
विश्वास दिलाना॥” 66 ॥
भक्तोंके विच्छेदसे महाप्रभुकी विह्वलता :-
एतेक कहिते प्रभु विह्वल हइला।
लोक विदाय करिते प्रभु धैर्य धरिला ॥ 67 ॥
अनुवाद-इतना कहते-कहते महाप्रभु विह्वल हो
गये, किन्तु भक्तोंको विदायी देनेके लिये महाप्रभुने धैर्य
धारण कर लिया ॥ 67 ॥
प्रेमवशतः महाप्रभुके द्वारा श्रीराघव-पण्डितकी
शुद्धकृष्णसेवा-प्रचेष्टाका वर्णन :-
राघव-पण्डिते कहेन वचन सरस।
“तोमार निष्ठा-प्रेमे आमि हइँ तोमार वश ॥ 68 ॥
इँहार कृष्णसेवार कथा शुन, सर्वजन।
परम पवित्र सेवा अति सर्वोत्तम ॥ 69 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीराघव-पण्डितसे ये मधुर वचन
कहे,-“तुम्हारी निष्ठा और तुम्हारे प्रेमके कारण मैं
तुम्हारे वशमें हूँ। (तब महाप्रभु उपस्थित भक्तोंसे कहने
लगे-) सभी लोग इनके द्वारा की जानेवाली श्रीकृष्ण-
सेवाके विषयमें सुनो। इनके द्वारा की जानेवाली सेवा
परम पवित्र और अति सर्वोत्तम है ॥ 68-69 ॥
श्रीराघवके द्वारा महाप्रभुको अपूर्व नारियलका
भोग प्रदान करनेका वैशिष्ट्य :-
आर द्रव्य रहु-शुन नारिकेलेर कथा।
पाँच गण्डा करि' नारिकेल बिकाय तथा ॥ 70 ॥
अनुवाद-अन्य द्रव्योंकी बात तो छोड़ दो, नारियल
भेंट करनेकी ही बात सुनो। इनके गाँव पाणिहाटीमें
नारियल 'पाँच गण्डे' (एक पैसे)का मिलता है ॥ 70 ॥
वाटिते कत शत वृक्षे लक्ष लक्ष फल।
तथापि शुनेन, यथा मिष्ट नारिकेल ॥ 71 ॥
एक एक फलेर मूल्य दिया चारिचारि पण।
दशक्रोश हैते आनाय करिया यतन ॥ 72 ॥
अनुवाद-यद्यपि इनके अपने घरमें नारियलके
सैकड़ों वृक्ष हैं जिनपर लाखों फल लगे रहते हैं, तथापि
ये जाननेके लिये उत्कण्ठित रहते हैं कि मीठे नारियल
कहाँ मिलेंगे? तब ये एक-एक फलका चार-चार पण
(अर्थात् सोलह पैसे) मूल्य देकर दस कोसकी (तीस
10 ।

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/71-83 ]
किलोमीटरकी) दूरीसे भी उन फलोंको बहुत ही
यत्नपूर्वक मँगवाते हैं॥ 71-72॥
प्रतिदिन पाँच-सात फल छोलाञा।
सुशीतल करिया राखे जले डुबाइञा ॥ 73 ॥
भोगेरे समय पुनः छुलि' संस्करि' ।
कृष्णे समर्पण करे, मुख छिद्र करि' ॥ 74 ॥
कृष्ण सेइ नारिकेल-जल पान करि' ।
कभु शून्य फल राखेन, कभु जल भरि' ॥ 75 ॥
जलशून्य फल देखि' पण्डित - हरषित ।
फल भाङ्गि' शस्ये करे शतपात्र पूरित ॥ 76 ॥
शस्य समर्पण करि' बाहिरे धेयान ।
शस्य खाञा कृष्ण करे शून्य भाजन ॥ 77 ॥
कभु शस्य खाञा कृष्ण पुनः पात्र भरे शाँसे।
श्रद्धा बाड़े पण्डितेर, प्रेमसिन्धु भासे ॥ 78 ॥
अनुवाद - ये प्रतिदिन पाँच-सात नारियल छीलकर
उन्हें सुशीतल करनेके लिये जलमें डुबो करके रखते
हैं। भोग लगानेके समय ये पुनः नारियलको छीलकर
और साफ करके उसके मुखमें छेद करके उसे
श्रीकृष्णको समर्पित करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण उस
नारियलके जलका पान करके कभी तो फलको खाली
कर देते हैं और कभी उसे पुनः जलसे भर देते हैं।
खाली नारियल देख ये बहुत प्रसन्न होते हैं कि
श्रीकृष्णने नारियलके जलको ग्रहण कर लिया है। तब
ये नारियलको तोड़कर उसकी मलाईको अनेक पात्रोंमें
भरकर उसे श्रीकृष्णको समर्पित करके बाहर बैठकर
ध्यान करते हैं। इस बीच श्रीकृष्ण मलाईको खाकर उस
पात्रको खाली कर देते हैं। कभी-कभी श्रीकृष्ण मलाई
खाकर पुनः उस पात्रको मलाईसे भर देते हैं। यह सब
देखकर इनकी श्रद्धा बढ़ जाती है और ये प्रेम-सिन्धुमें
निमग्न हो जाते हैं ॥ 73-78 ॥
एक दिनकी घटनाका वर्णन :-
एक दिन फलदश संस्कार करिया ।
भोग लागाइते सेवक आइल लञा ॥ 79 ॥
अवसर नाहि हय, विलम्ब हइल।
फल-पात्र-हाते सेवक द्वारे त' रहिल ॥ 80 ॥
द्वारेर उपर भिते तैं हो हात दिल।
सेइ हाते फल छुँइल, पण्डित देखिल ॥ 81 ॥
अनुवाद - एक दिन इनका सेवक दस नारियलोंको
छीलकर भोग लगानेके लिये लेकर आया। उस दिन
भोग लगानेके लिये बहुत कम समय बचा था, क्योंकि
किसी कारणसे इन्हें आनेमें विलम्ब हो गया था। और
इनकी प्रतीक्षामें सेवक अपने हाथमें नारियलके पात्रको
लेकर द्वारपर ही खड़ा रहा। तभी इन्होंने देखा कि
सेवकने द्वारके ऊपरकी दीवारको अपने हाथोंसे छुआ
और उसी हाथसे फिर नारियलको छू लिया ॥ 79-81 ॥
अनुभाष्य - 'उपर-भिते'- ऊपरकी दीवारपर; 'तैंहों'-
श्रीराघव पण्डितका सेवक ॥ 81 ॥
पण्डित कहे, - 'द्वारे लोक करे गतायाते।
तार पदधूलि उड़ि' लागे उपर-भिते ॥ 82 ॥
सेइ भिते हात दिया फल परशिला।
कृष्ण-योग्य नहे, फल अपवित्र हैला ॥ '83 ॥
अनुवाद - इन राघव पण्डितने उस सेवकसे
कहा, - 'द्वारसे लोग आवागमन करते हैं। उनके पैरोंकी
धूलि उड़कर ऊपरवाली दीवारपर भी लग जाती है।
उसी दीवारपर हाथ लगाकर तुमने नारियलको स्पर्श
किया है। इसी कारण ये फल श्रीकृष्णको समर्पित
करनेके योग्य नहीं हैं, ये अपवित्र हो गये हैं ॥ '82-83 ॥
अनुभाष्य - श्रीराघव पण्डित साधारण 'शुचि-
वायुरोग'-ग्रस्त अर्थात् सफाईके लिये पागल मायाबद्ध
व्यक्ति नहीं थे। अथवा प्राकृत कनिष्ठ भक्तकी भाँति
द्वैतबुद्धिवाले होकर 'भौमे इज्यधी' अर्थात् जड़में चिद्
। 11

[ 15/81–91 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला


[बायाँ स्तम्भ]

वस्तुका आरोप करनेवाले मनोधर्मी नहीं थे। वे
नित्यसिद्ध श्रीकृष्ण सेवक थे। उनमें जड़ीय कामकी
गन्ध भी नहीं थी। वे अप्राकृत-सेवाके भावमें निमग्न
रहकर सब समय अपनी आराध्य वस्तुकी सेवा करते
थे। पक्षान्तरमें, अपनी कामनाओंकी पूर्तिके लिये
कर्ममिश्रा-बिद्धा भक्तिका आश्रय करनेवाले कनिष्ठ
भक्तोंमें अप्राकृत-सेवा-बुद्धि नहीं होती। इसलिये केवल
श्रीराघव पण्डितके बाह्य आचरणका अनुकरण करके
लौकिक कृत्रिम पवित्रता-अपवित्रताका विचार करनेसे
ही वे शुद्धकृष्णभक्त नहीं हो सकते। उनका ऐसा
आचरण उनकी श्रीकृष्णप्रीतिवाञ्छाका परिचय नहीं
देता। (अन्त्यलीला 4/174, 176 संख्या)में—
“भद्राभद्र-वस्तुज्ञान नाहि 'अप्राकृते' ॥ 174ख ॥
'द्वैते' भद्राभद्र-ज्ञान, सब—'मनोधर्म'।
'एइ भाल, एइ मन्द',—एइ सब 'भ्रम' ॥” 176 ॥
[अर्थात् “‘अप्राकृत' वस्तुमें भद्र और अभद्र
अर्थात् अच्छे और बुरेका कोई विचार होना उचित
नहीं है। 'द्वैत' अर्थात् प्राकृत वस्तुमें भद्र और अभद्रका
ज्ञान करना तो 'मनका धर्म' है। 'यह अच्छा है, यह
बुरा है'—यह सब तो भ्रम है।”]
भागवत 11/28/4 श्लोक देखें ॥ 81–83 ॥

जगत्में श्रीराघवकी अपूर्व पवित्र श्रीकृष्णसेवा :—
एत बलि' फल फेले प्राचीर लङ्गिया।
ऐछे पवित्र प्रेम-सेवा जगत् जिनिया ॥ 84 ॥
तबे आर नारिकेल संस्कार कराइल।
परम पवित्र करि' भोग लागाइल ॥ 85 ॥
एइमत कला, आम्र, नारिकेल, काँठाल।
याहा याहा दूर-ग्रामे शुनियाछे भाल ॥ 86 ॥
बहुमूल्य दिया आनि' करिया यतन।
पवित्र संस्कार करि' करे निवेदन ॥ 87 ॥
एइमत व्यञ्जनेर शाक, मूल, फल।
एइमत चिड़ा, हुडुम, सन्देश सकल ॥ 88 ॥


[दायाँ स्तम्भ]

एइमत पिठा-पाना, क्षीर-ओदन।
परम पवित्र, आर करे सर्वोत्तम ॥ 89 ॥
काश्मन्दि, आचार आदि अनेक प्रकार।
गन्ध, वस्त्र, अलङ्कार, सर्वद्रव्य-सार ॥ 90 ॥
एइमत प्रेमेर सेवा करे अनुपम।
याहा देखि' सर्वलोकेर जुड़ाय नयन ॥” 91 ॥

अनुवाद—यह कहकर इन्होंने उन नारियलोंको
दीवारके दूसरी ओर फेंक दिया। इनकी ऐसी पवित्र
प्रेम-सेवा जगत्को जीतनेवाली है। तब इन्होंने पुनः
अन्य नारियलोंको सावधानी और पवित्रतासे छिलवाया
और उनका भोग लगाया। इसी प्रकार केले, आम,
सन्तरे, कटहल और अन्यान्य जिन-जिन पदार्थोंके
विषयमें सुनते हैं कि कहीं दूर ग्राममें भी बहुत अच्छे
मिल रहे हैं, तो ये यत्न करके बहुत अधिक मूल्य
देकर भी उन्हें मँगवाते हैं और अच्छेसे पवित्र करके
छीलकर उन्हें भगवान्को निवेदन करते हैं। इसी प्रकार
शाक, मूल, फल आदि, चिड़वा, सख्त मूड़ि, अनेक
प्रकारके सन्देश, पीठा-पाना और गाढ़ी खीर आदि
व्यञ्जनोंको परम-पवित्रतासे अति उत्तम और स्वादिष्ट
बनाते हैं। इसी प्रकार ही कासुन्दी (सरसोंसे बनी
चटनी) और अनेक प्रकारके आचार आदि भी
श्रीकृष्णको निवेदित करते हैं। ये सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ताके
इत्यादि सुगन्धित द्रव्य, वस्त्र और अलङ्कारादि भी
निवेदन करते हैं। इस प्रकार राघव पण्डित प्रेमपूर्वक
अनुपम सेवा करते हैं, जिसे देखकर सभी लोगोंको
बहुत आनन्द होता है ॥” 84–91 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'हुडुम'—एक प्रकारका धान,
इसकी खील उड़ीसामें विशेषरूपसे प्रचलित है (पूर्वी-
बङ्गालमें 'मुड़ि'को 'हुडुम' कहते हैं)। 'काश्मन्दि'—कासुन्दि
(सरसोंके दानोंसे बनी तीखी चटनी) ॥ 88–90 ॥

अनुभाष्य—'क्षीर-ओदन'—दूधमें पकाये चावलकी
खीर ॥ 89 ॥


12 |

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/92-99 ]
महाप्रभुके द्वारा सभी भक्तोंका यथायोग्य अभिनन्दन :-
एत बलि' राघवेरे कैल आलिङ्गने।
एइमत सम्मानिल सर्व भक्तगणे ॥ 92 ॥
अनुवाद-इतना कहकर महाप्रभुने श्रीराघव पण्डितका
आलिङ्गन किया। इसी प्रकार उन्होंने सभी भक्तोंको
सम्मानित किया ॥ 92 ॥
श्रीशिवानन्दको खर्चीले श्रीवासुदेव-दत्तके
धनका रक्षक बननेका आदेश :-
शिवानन्दसेने कहे करिया सम्मान।
“वासुदेव-दत्तेर तुमि करिह समाधान ॥ 93 ॥
परम उदार इँहो, ये दिन ये आइसे।
सेइ दिने व्यय करे, नाहि राखे शेषे ॥ 94 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीशिवानन्द सेनको सम्मान
देते हुए कहा,-“आप वासुदेव-दत्तका ध्यान रखना। ये
परम उदार हैं। जिस दिन इनके पास जितना भी धन
आता है, ये उसे उसी दिन ही खर्च कर देते हैं, अपने
पास कुछ भी बचाकर नहीं रखते ॥ 93-94 ॥
अनुभाष्य-श्रीशिवानन्द सेन और श्रीवासुदेव दत्त
ठाकुर-दोनों ही उस समय कुमारहट्ट अथवा हालिसहर
और काँचड़ापाड़ामें वास करते थे ॥ 93 ॥
गृहस्थ वैष्णवोंके लिये लौकिक-कर्त्तव्यका उपदेश :-
'गृहस्थ' हयेन इँहो, चाहिये सञ्चय।
सञ्चय ना कैले कुटुम्ब-भरण नाहि हय ॥ 95 ॥
इहार घरेर आय-व्यय, सब-तोमार स्थाने।
'सरखेल' हञा तुमि करिह समाधाने ॥ 96 ॥
अनुवाद-वासुदेव दत्त 'गृहस्थ' हैं, इसलिये उन्हें
कुछ-न-कुछ सञ्चय करनेकी आवश्यकता है। सञ्चय
किये बिना कुटुम्बका भरण-पोषण नहीं होता। इनके
घरके आय-व्यय आदिका सब कुछ आप इनके
'सरखेल'के रूपमें ध्यान रखना ॥ 95-96 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'सरखेल'-तत्त्वावधायक (हिसाब-
किताब रखनेवाले) ॥ 96 ॥
प्रत्येक वर्ष मार्गमें कर-संग्रहकर्त्ताका समाधान
करके सभी भक्तोंको पुरीमें लानेकी आज्ञा :-
प्रतिवर्षे आमार सब भक्तगण लञा।
गुण्डिचाय आसिबे सबाय पालन करिया ॥ "97 ॥
अनुवाद-आप प्रत्येक वर्ष मेरे सब भक्तोंको
अपने साथ लेकर उनका पालन-पोषण करते हुए
रथयात्राके समय नीलाचलमें आना ॥ "97 ॥
श्रीसत्यराज और श्रीरामानन्दको प्रतिवर्ष
रेशमी डोरी लानेका आदेश :-
कुलीनग्रामीरे कहे सम्मान करिया।
“प्रत्यब्द आसिबे यात्राय पट्टडोरी लञा ॥ 98 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कुलीनग्रामवासियोंको सम्मान
देते हुए कहा,-“आप लोग प्रत्येक वर्ष रथयात्रामें
मजबूत रेशमी-डोरियाँ (जिनसे बाँधकर श्रीजगन्नाथ,
श्रीबलदेव और श्रीसुभद्राको उठाकर लाया जाता है)
लेकर आना ॥ 98 ॥
श्रीमुखसे मालाधर-वसु-कृत 'श्रीकृष्णविजय'
की महिमाका वर्णन :-
गुणराज-खाँन कैल श्रीकृष्णविजय।
ताँहा एकवाक्य ताँर आछे प्रेममय ॥ 99 ॥
अनुवाद-इन गुणराज खाँनने श्रीकृष्णविजय नामक
ग्रन्थकी रचना की है। उस ग्रन्थमें श्रीकृष्णके प्रति
उनके हृदयके प्रेमको प्रकाशित करनेवाला एक वाक्य
है॥99 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'श्रीकृष्णविजय'-एक विशेष ग्रन्थ।
बहुतसे लोगोंने विवेचना की है कि यह ग्रन्थ ही
बङ्गला-भाषाका सर्वप्रथम पद्य-काव्य-ग्रन्थ है ॥ 99 ॥
अनुभाष्य-“आदिकवि गुणराज खाँन महाशय तेरह
सौ पिचानवें (1395) शकाब्दमें इस ग्रन्थकी रचना
। 13

[ 15/99 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
करनेमें नियुक्त हुए और चौदह सौ दो (1402)
शकाब्दमें ग्रन्थको समाप्त किया।”
“श्रीकृष्णविजय-ग्रन्थकी रचना अति सरल है, यहाँ
तक कि, बङ्गालकी अर्द्धशिक्षित महिलाएँ और साधारण
वर्णज्ञान जाननेवाले निम्नश्रेणीके व्यक्ति भी इस ग्रन्थको
अनायास ही पढ़ और समझ सकते हैं। इस ग्रन्थकी
भाषा अलंकृत नहीं है, इसके पद्य अनेक स्थानोंपर
अधिक मधुर भी नहीं हैं। चौदह अक्षरोंवाले पयारमें
अनेक स्थानोंपर सोलह-सत्रह अक्षर अथवा बारह-तेरह
अक्षर दिखलायी देते हैं। इसके अनेक शब्द ही उस
कालमें व्यवहारमें आनेवाले शब्द हैं। उन सब शब्दोंके
अर्थ केवल राढ़देशवासी लोग ही समझ सकते हैं। इस
पुस्तकका अभाव रहनेपर किसी बङ्गाली पुस्तकालयको
'सम्पूर्ण' नहीं कहा जा सकता।”
“यह ग्रन्थ पारमार्थिक-लोगोंके लिये परम आदरणीय
है। वैष्णवोंमें अग्रणी पूज्यपाद श्रीगुणराज-खाँन महाशयने
सर्वशास्त्र-शिरोमणि श्रीमद्भागवत-ग्रन्थके दसवें और ग्यारहवें
स्कन्धका साधारण व्यक्तियोंके द्वारा ग्रहण करने योग्य
अनुवाद करके इस ग्रन्थकी रचना की है। इस कारण
वैष्णव-जगत्में यह ग्रन्थ सर्वत्र पूजनीय है। जिस
ग्रन्थको पढ़कर महाप्रभुने इतनी प्रशंसा की है, वह ग्रन्थ
गौड़ीय-वैष्णव-समाजमें कितना आदर प्राप्त करेगा, यह
कहनेकी आवश्यकता नहीं है। इसलिये यह काव्य
बङ्गालवासियोंके लिये बहुत ही आदरणीय धन है;
विशेषतः कोई-कोई कहते हैं, - यह ग्रन्थ ही बङ्गलाभाषाका
सर्वप्रथम काव्य है।”
“श्रीश्रीमहाप्रभुके आविर्भावसे दो वर्ष पूर्व 1405
शकाब्दमें श्रीदेवानन्द वसुके हाथसे यह ग्रन्थ लिखा गया
है।” (श्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुर-लिखित 'श्रीकृष्ण-विजय'-
ग्रन्थकी 'प्रस्तावना'से उद्धृत)।
“बङ्गालके सम्राट आदिशूर कान्यकुब्जसे पाँच
सु-ब्राह्मणोंके साथ जिन पाँच सु-कायस्थोंको लाये थे,
उनमेंसे दशरथ वसु एक थे; उन्हींके ही वंशमें तेरहवीं
पीढ़ीमें श्रीगुणराज-खाँन उत्पन्न हुए। इनका वास्तविक
नाम-श्रीमालाधर वसु है, 'गुणराज खाँन' इन्हें गौड़ीय
सम्राटके द्वारा प्रदान की गयी उपाधि है। दशरथ वसुकी
वंश परम्परा इस प्रकार है:-

  1. दशरथ वसु, 2) कुशल, 3) शुभशङ्कर, 4)
    हंस, 5) शक्तिराम (बागाण्डा), मुक्तिराम (माइनगर) और
    अलङ्कार (बङ्गज);
  2. मुक्तिराम, 6) दामोदर, 7) अनन्तराम, 8)
    गुणीनायक और वीणानायक;
  3. गुणीनायक, 9) माधव, 10) लक्ष्मीनाथ, चक्रपाणि,
    उदयचाँद, लौह, तौहु, श्रीपति और अच्युतानन्द;
  4. श्रीपति, 11) यज्ञेश्वर, त्रिलोचन, वटेश्वर,
    प्रजापति, ईशान, सागर और कृपाराम;
  5. यज्ञेश्वर, 12) भगीरथ, कामेश्वर, सदानन्द
    और वशिष्ठ;
  6. भगीरथ, 13) मालाधर वसु-(उपाधि-गुणराज
    खाँन)।
    गुणराज खाँनके चौदह पुत्र थे, उनमेंसे दूसरे
    लक्ष्मीनाथवसुकी उपाधि-श्रीसत्यराज खाँन है; उन्हींके
    पुत्र-श्रीरामानन्द वसु हैं, इसलिये श्रीरामानन्द वसु-पन्द्रहवीं
    पीढ़ीके हैं।
    श्रीमालाधर वसु महाशय अतिप्रसिद्ध धनशाली
    व्यक्ति थे। उनके गढ़ और देवालय (मन्दिर) आदिका
    दर्शन करनेसे लगता है, उनकी राजश्री (अर्थात्
    राज्यकी धन-सम्पत्ति) अत्यन्त समृद्धिशाली थी। गुणराज
    खाँन महाशयके एक सामाजिक साहसका परिचय इस
    कार्यसे मिलता है। उन्होंने बलाल सेनसे कुल परम्पराके
    माध्यमसे चली आ रही प्रथाको सारहीन जानकर अपने
    पुत्र पुरन्दर खाँनके भी अनुरोधको अस्वीकार करके
    कान्यकुब्जसे आये श्रीपुरुषोत्तम दत्त-वंशीय तेरहवीं
    पीढ़ीके श्रीपति दत्त महाशयकी कन्याके साथ अपने
    ज्येष्ठ पुत्रके विवाहका कार्य सम्पन्न किया था।” (1292
    बङ्ग-वर्षके (1886 ई.) शीतकालमें श्रीमद्भक्तिविनोद
    ठाकुरके द्वारा श्रीकुलीनग्राम-पाटसे संगृहीत) ॥99॥
    14 |

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/100-106 ]
ग्रन्थके एक वाक्यसे महाप्रभुका उनके
वंशके हाथों स्वयंको बेचना :-
'नन्दनन्दन कृष्ण-मोर प्राणनाथ।'
एइ वाक्ये बिकाइनु ताँर वंशेर हात ॥ 100 ॥
अनुवाद- 'नन्दनन्दन कृष्ण मेरे प्राणनाथ हैं' - गुणराज
खाँनके इस वाक्यके कारण मैं उनके वंशके हाथोंमें
बिक गया हूँ ॥ 100 ॥
अनुभाष्य- मूलपद्य यह है- "एकभावे वन्द हरि
जोड़ करि' हात। नन्दनन्दन कृष्ण-मोर प्राणनाथ ॥" 100 ॥
श्रीमुखसे कुलीन-ग्रामके माहात्म्यका वर्णन :-
तोमार कि कथा, तोमार ग्रामेर कुक्कुर।
सेह मोर प्रिय, अन्यजन रहु दूर ॥ 101 ॥
अनुवाद- आप लोगोंकी तो बात ही क्या, आपके
ग्रामका कुत्ता भी मेरा प्रिय है। तब अन्य लोगोंके बारेमें
क्या कहना है ॥ 101 ॥
दोनोंकी गृहस्थ-वैष्णवके कर्त्तव्य
और साध्यकी जिज्ञासा :-
तबे रामानन्द, आर सत्यराज खाँन।
प्रभुर चरणे किछु कैल निवेदन ॥ 102 ॥
“गृहस्थ विषयी आमि, कि मोर साधने।
श्रीमुखे करेन आज्ञा, निवेदि चरणे ॥” 103 ॥
अनुवाद- तब श्रीरामानन्द और श्रीसत्यराज खाँनने
महाप्रभुके चरणोंमें कुछ निवेदन किया, - “हम गृहस्थ हैं
और विषयोंमें लिप्त हैं, इसलिये हम नहीं जानते कि
परमार्थके लिये हमें क्या साधन करना चाहिये। हम
आपके श्रीचरणोंमें निवेदन करते हैं कि इस विषयमें
आप हमें श्रीमुखसे निर्देश प्रदान कीजिये ॥” 102-103 ॥
महाप्रभुका उत्तर :-
प्रभु कहेन, - ‘'कृष्णसेवा', 'वैष्णव-सेवन'।
निरन्तर कर कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन ॥' 104 ॥
अनुवाद- महाप्रभुने कहा, - 'निरन्तर श्रीकृष्णनामका
सङ्कीर्त्तन करो और जब भी सम्भव हो 'श्रीकृष्णसेवा',
और 'वैष्णव-सेवा' करो ॥' 104 ॥
श्रीसत्यराजकी वैष्णवको पहचाननेके उपायकी जिज्ञासा :-
सत्यराज बले, - “वैष्णव चिनिब केमने?
के वैष्णव, कह ताँर सामान्य लक्षणे ॥” 105 ॥
अनुवाद- श्रीसत्यराज खाँनने कहा, - “हम वैष्णवको
कैसे पहचानेंगे? कौन वैष्णव है, कृपया उसके सामान्य
लक्षण बतलाइये ॥” 105 ॥
महाप्रभुके द्वारा 'कनिष्ठ-वैष्णव'के लक्षणका निर्देश :-
प्रभु कहे, - “याँर मुखे शुनि एकबार।
कृष्णनाम, सेइ पूज्य, -श्रेष्ठ सबाकार ॥ 106 ॥
अनुवाद- महाप्रभुने कहा, - “जिसके मुखसे एकबार
भी श्रीकृष्णनाम सुनायी दे, वही पूज्य है और सबसे
श्रेष्ठ व्यक्ति है ॥ 106 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीरामानन्द वसु और उनके
पिता श्रीसत्यराज खाँन, - ये बङ्गदेशके उज्ज्वल
कायस्थ-वसुवंशमें उत्पन्न गृहस्थ-वैष्णव थे। इन्होंने
महाप्रभुसे जिज्ञासा की, - 'गृहस्थ वैष्णवोंके लिये साधनका
कर्त्तव्य क्या है?' महाप्रभुने उत्तर दिया, - 'कृष्णसेवा,
वैष्णवसेवा एवं निरन्तर कृष्णनाम कीर्त्तन ही गृहस्थ
वैष्णवोंका एकमात्र कार्य है।' इसपर श्रीसत्यराजने प्रश्न
किया, - 'श्रीकृष्णसेवा और श्रीकृष्णनाम-कीर्त्तनको तो
सहजमें ही समझा जा सकता है, किन्तु वैष्णवको
पहचान नहीं पानेसे वैष्णव-सेवनरूपी कार्य बहुत ही
कठिन होता है। इसलिये हे प्रभो, वैष्णव कौन है और
उसके सामान्य (साधारण) लक्षण क्या हैं?' महाप्रभुने
उत्तर दिया, - 'जिसके मुखसे एकबार कृष्णनाम सुना
जाता है, वही सबसे श्रेष्ठ और पूज्य-वैष्णव है ॥' 102-106 ॥
अनुभाष्य- एकमात्र श्रीकृष्णनामसे सर्वसिद्धि होती
है, - ऐसे श्रद्धावान् व्यक्तिको 'वैष्णव' कहकर जानना;
क्योंकि ऐसी श्रद्धा ही वैष्णव होनेकी प्रारम्भिक योग्यता
। 15

[ 15/106-107 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्रदान करती है। किन्तु ऐसा होनेपर भी श्रीकृष्णनाममें
उसकी कोमल श्रद्धाके प्रकट होनेके कारण वह
निरन्तर नाम ग्रहण नहीं करता। श्रीरूपगोस्वामिप्रभुने
स्व-लिखित 'उपदेशामृत'में कहा है,—“कृष्णेति यस्य
गिरि तं मनसाद्रियेत दीक्षास्ति चेत्”—जो श्रीनामको
अप्राकृत चिन्तामणि, कृष्णचैतन्य-रसविग्रह, पूर्ण, शुद्ध,
नित्यमुक्त और नाम-नामीको अभेद जानकर परम
श्रद्धाके साथ अर्चन करते हैं, परन्तु अपनी बद्धावस्थाके
कारण भक्तिसिद्धान्तविचार-रहित होकर भक्तिके उपादान
(अङ्गों)को और शुद्धभक्तको सम्पूर्ण 'अप्राकृत'के रूपमें
समझ नहीं पाते, वे भी शुद्धभक्त और श्रीगुरुकी सेवासे
एवं उनके मुखसे शुद्धभक्तिसिद्धान्तके श्रवणके फलसे
क्रमशः सब प्रकारके पापोंके नष्ट होनेपर अप्राकृत
अनुभूति अथवा दिव्य-सम्बन्धज्ञान प्राप्त करते हैं।
(भागवत 11/2/47)—
“अर्चायामेव हरये यः पूजां श्रद्धयेहते।
न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ”
[अर्थात् “जो लौकिक और पारिवारिक प्रथाके
अनुसार परम्परागत श्रद्धाके साथ अर्चा-मूर्तिमें श्रीहरिकी
पूजा करते हैं, परन्तु शास्त्र-अनुशीलनके द्वारा
शुद्धभक्तितत्त्वको नहीं जाननेके कारण हरिभक्तोंकी पूजा
नहीं करते, वे—'प्राकृत भक्त' हैं अर्थात् उन्होंने अभी
भक्तिपर्व आरम्भ मात्र ही किया है। उन्हें 'भक्तप्राय'
अथवा 'वैष्णवाभास' शब्दोंके द्वारा सम्बोधित किया
जाता है।”] श्रीसनातन-शिक्षामें (मध्यलीला 22/64, 67,
68 संख्यामें)—
“श्रद्धावान् जन हय भक्ति-अधिकारी।
उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ, श्रद्धा-अनुसारि ॥ 64 ॥
याहार कोमल श्रद्धा, से 'कनिष्ठ' जन।
क्रमे-क्रमे तेंह भक्त हइबे उत्तम ॥ 67 ॥
रतिप्रेम-तारतम्ये भक्ति-तरतम।” 68क।
[अर्थात् “श्रद्धावान् व्यक्ति ही भक्तिके अधिकारी
हैं। श्रद्धाके अनुसार ही वे 'उत्तम', 'मध्यम' और
'कनिष्ठ' अधिकारके भक्त होते हैं। जिसकी श्रद्धा
कोमल और आसानीसे बदलनेवाली है, वह
कनिष्ठ-अधिकारी है। परन्तु भक्तिकी प्रक्रियाका पालन
करनेपर क्रमशः वह भी 'उत्तम' भक्तके स्तरपर पहुँच
जाता है। रति और प्रेमके तारतम्यसे भक्तोंमें भी
तारतम्य होता है।”]
'सबाकार श्रेष्ठ'—अर्थात् देवीधाममें सर्वश्रेष्ठ। पुण्यकर्मियों
और ज्ञानियोंकी अपेक्षा भी श्रीविष्णुनामसे युक्त मन्त्रका
अर्चनकारी कनिष्ठ भक्त श्रेष्ठ है; क्योंकि कर्मी अथवा
ज्ञानी—वे जितने भी श्रेष्ठ क्यों न हो—उनका वास्तव-वस्तु
श्रीविष्णुकी नित्यसेवा करनेमें विश्वास नहीं होता।
इसलिये मुखसे वेदोंको माननेपर भी वे वास्तवमें
नास्तिक हैं। और श्रीविष्णुके अर्चक, अप्राकृत-भजनराज्यमें
उनकी थोड़ीसी भी महिमा क्यों न हो, अन्ततः वे
श्रीविष्णुके अर्चाके वास्तव-सत्यविग्रह होनेको श्रीगुरुके
मुखसे सुनकर उसके प्रति श्रद्धावान् तो हैं ॥ 106 ॥
एक श्रीकृष्णनामके फलकी महिमाका वर्णन :—
एक कृष्णनामे करे सर्वपाप क्षय।
नवविधा भक्ति पूर्ण नाम हैते हय ॥ 107 ॥
अनुवाद—एक श्रीकृष्णनामके उच्चारणसे व्यक्तिके
सभी पापोंका नाश हो जाता है। श्रीकृष्णनामके कीर्तनसे
ही नवधा-भक्तिके सभी अङ्गोंका पालन हो जाता
है ॥ 107 ॥
अनुभाष्य— 'नवविधा भक्ति'—(भाः 7/5/23)—
“श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेत्रवलक्षणा।”
[अर्थात् “श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन,
वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—ऐसी नौ
लक्षणोंवाली भक्तिको जो विष्णुमें साक्षात् अर्पण करते
हैं, वे ही शास्त्रोंके उत्तम पण्डित हैं।”]
नामापराधका त्यागकर एकमात्र श्रीकृष्णनामके आश्रयसे
16 |

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/107-108 ]
ही सब प्रकारके पापोंके नष्ट होनेपर जीवकी
पुण्य-पापमूलक प्राकृत भोगवासना सम्पूर्ण रूपसे नष्ट
हो जाती है। श्रीनाम ग्रहण करनेवाला ही सबसे श्रेष्ठ
और पूजनीय है। श्रीनाम-भजनसे ही नवधा भक्ति
पूर्णताको प्राप्त करती है (“यद्यप्यन्या भक्तिः कलौ
कर्त्तव्या, तदा कीर्त्तनाख्यभक्ति-संयोगेनैव” [अर्थात् “यद्यपि
कलियुगमें भक्तिके अन्य अङ्गोंका पालन कर्त्तव्य है,
तथापि कीर्त्तनके संयोगसे उनका पालन करना
चाहिये।”]—भक्तिसन्दर्भ 173 संख्या) ॥ 107 ॥
श्रीनाम 'स्वयं ही प्रभु-श्रीकृष्ण' होनेके कारण
अन्य कार्योंसे निरपेक्ष :—
दीक्षा-पुरश्चर्या-विधि अपेक्षा ना करे।
जिह्वा-स्पर्शे आचण्डाले सबारे उद्धारे ॥ 108 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णनाम दीक्षा और पुरश्चर्या-विधिकी
अपेक्षा नहीं रखते, जिह्वासे स्पर्श होने मात्रसे ही
चण्डाल तक सभीका उद्धार कर देते हैं॥ 108 ॥
अनुभाष्य—'दीक्षा'—श्रीजीवप्रभुके भक्तिसन्दर्भमें 283
संख्यामें उद्धृत आगमवाक्य—
“दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात् कुर्यात् पापस्य संक्षयम्।
तस्मात् दीक्षेति सा प्रोक्ता देशिकैस्तत्त्वकोविदैः॥”
अर्थात् “जिससे अप्राकृत दिव्यज्ञानका उदय और
पापोंका सम्पूर्ण रूपसे नाश होता है, तत्त्वशास्त्रविद्
पण्डितोंने उसे ही 'दीक्षा' कहकर वास्तविक रूपमें संज्ञा
प्रदान की है।”
'दीक्षा-विधि'—(हःभःविः दूसरा विः और भक्तिसन्दर्भमें
283 संख्यामें उद्धृत आगम-वचन)—
“द्विजानामनुपेतानां स्वकर्माध्ययनादिषु।
यथाधिकारो नास्तीह स्याच्चोपनयनादनु।
तथात्रादीक्षितानां तु मन्त्रदेवाच्चर्चनादिषु।
नाधिकारोऽस्त्यतः कुर्यादात्मानं शिवसंस्तुतम्॥”
अर्थात् “उपवीत (जनेऊ) रहित ब्राह्मणका जिस
प्रकार स्वकर्म अध्ययन आदिमें अधिकार नहीं होता,
उपवीत-ग्रहण करनेके बाद ही अधिकार होता है, उसी
प्रकार अदीक्षित व्यक्तिका भी मन्त्रदेवताकी पूजादिमें
अधिकार नहीं होता। इसलिये आत्माको मङ्गलमय
करनेके उद्देश्यसे अपना कल्याण चाहनेवाले 'दीक्षा'
ग्रहण करेंगे।” कारण, (हःभःविः, दूसरे विःमें उद्धृत
विष्णु-यामल-वचन)—
“अदीक्षितस्य वामोरु कृतं सर्वं निरर्थकम्।
पशुयोनिमवाप्नोति दीक्षाविरहितो जनः॥”
[अर्थात् “हे वामोरु! दीक्षा-रहित व्यक्तिके द्वारा
किये गये सभी अनुष्ठान ही निरर्थक होते हैं।
दीक्षारहित व्यक्ति पशु-योनि प्राप्त करता है।”]
(हःभःविः और भक्तिसन्दर्भकी 283 संख्यामें उद्धृत
यामल अथवा आगम-वचन)—
“अतो गुरुं प्रणम्यैवं सर्वस्वं विनिवेद्य च।
गृह्णीयाद्वैष्णवं मन्त्रं दीक्षा-पूर्वं विधानतः॥”
[अर्थात् “इसलिये श्रीगुरुदेवको प्रणाम करके सर्वस्व
समर्पण करके दीक्षापूर्वक (दिव्यज्ञान प्राप्त करके)
यथाविधि वैष्णवमन्त्र ग्रहण करने चाहिये।”] (भक्तिसन्दर्भ
298 संख्यामें उद्धृत तत्त्वसागर-वचन)—
“यथा काञ्चनतां याति कांस्यं रसविधानतः।
तथा दीक्षाविधानेन द्विजत्वं जायते नृणाम्॥”
[अर्थात् “जिस प्रकार कांसा रासायनिक विधिसे
स्वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार दीक्षाके विधानके द्वारा
मानवको ब्राह्मणता प्राप्त होती है।”]
‘पुरश्चर्या’—(हःभःविः, सतरहवें विः में उद्धृत
अगस्त्य-संहिता-वचन)—
“पूजा त्रैकालिकी नित्यं जपस्तर्पणमेव च।
होमब्राह्मणभुक्तिश्च पुरश्चरणमुच्यते॥
गुरोलब्धस्य मन्त्रस्य प्रसादेन यथाविधि।
पञ्चाङ्गोपासना-सिद्धयै पुरश्चैतद्विधीयते॥”
अर्थात् “प्रातः, दोपहर और सन्ध्या,—इन तीनों
कालोंमें नित्य पूजा, नित्य जप, नित्य तर्पण, नित्य होम
और नित्य ब्राह्मण-भोजन,—इन पाँच अङ्गोंको 'पुरश्चरण'
। 17

[ 15/108 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

कहते हैं। गुरुकी कृपासे प्राप्त मन्त्रोंकी सिद्धिके लिये
सर्वप्रथम उपरोक्त पाँच अङ्गोंकी उपासनाका विधान है,
इसलिये यह क्रिया पुरश्चरण-नामसे जानी जाती है।”
'पुरश्चर्या-विधि'-(हःभःविः सतरहवें विः में उद्धृत
आगम-वचन)—
“बिना येन न सिद्धः स्यान्मन्त्रो वर्षशतैरपि।
कृतेन येन लभते साधको वाञ्छितं फलम्॥
पुरश्चरणसम्पन्नो मन्त्रो हि फलदायकः।
अतः पुरस्क्रिया कुर्यात् मन्त्रवित् सिद्धिकाङ्क्षया॥
पुरस्क्रिया हि मन्त्राणां प्रधानं वीर्यमुच्यते।
वीर्यहीनो यथा देही सर्वकर्मसु न क्षमः।
पुरश्चरणहीनो हि तथा मन्त्रः प्रकीर्त्तितः॥”
[अर्थात् “जिसके बिना सैकड़ों वर्षोंमें भी मन्त्रसिद्धि
नहीं होती और जिसका अनुष्ठान करनेसे साधक
वाञ्छित फल प्राप्त करता है, वह पुरश्चरण-सम्पन्न
मन्त्र ही फल प्रदान करनेवाला होता है—इसलिये सिद्धि
प्राप्तिके लिये मन्त्रविद् व्यक्ति पुरश्चरण करेंगे। पुरस्क्रिया
मन्त्रसमूहकी प्रधान शक्ति कहलाती है। बलहीन व्यक्ति
जिस प्रकार सभी कार्योंमें असमर्थ होता है, पुरश्चरण
रहित मन्त्र भी उसी प्रकार कहा गया है।”]
श्रीजीवप्रभु (“भक्तिसन्दर्भ”में 283 संख्या)—
“यद्यपि श्रीभागवतमते पञ्चरात्रादिवत् अर्चनमार्गस्य आवश्यकत्वं
नास्ति, तद्विनापि शरणापत्त्यादीनामेकतरेणापि पुरुषार्थसिद्धेरभिहितत्वात्,
तथापि श्रीनारदादि-वर्त्मानुसरद्भिः श्रीभगवता सह सम्बन्धविशेषं
दीक्षाविधानेन श्रीगुरुचरण-सम्पादितं चिकीर्षद्भिः कृतायां
दीक्षायामर्चनमवश्यं क्रियतेव।”
एवं (“भक्तिसन्दर्भ”में 284 संख्या)—
“(दीक्षाद्यपेक्षा) यद्यपि स्वरूपतो नास्ति, तथापि प्रायः
स्वभावतो देहादिसम्बन्धेन कदर्यशीलानां विक्षिप्तचित्तानां जनानां
तत्तत्सङ्कोचीकरणाय श्रीमदृषिप्रभृतिभिरत्रार्चनमार्गे क्वचित् क्वचित्
काचित् काचिन्मर्यादा स्थापितास्ति।”
रामार्चनचन्द्रिकामें—
“विनैव दीक्षां विप्रेन्द्र पुरश्चर्यां विनैव हि।
विनैव न्यासविधिना जपमात्रेण सिद्धिदा॥”
[अर्थात् “यद्यपि भागवतके मतानुसार पञ्चरात्रादिकी
भाँति अर्चनमार्गकी आवश्यकता नहीं है और अर्चनके
बिना भी आत्मनिवेदनादि किसी एक अङ्गके द्वारा भी
पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, ऐसा कहा जाता है, तथापि
श्रीनारदादि महाजनोंके पथके अनुसार जो लोग श्रीगुरुके
द्वारा सम्पादित दीक्षाके विधानके द्वारा भगवान्के साथ
विशेष सम्बन्ध स्थापित करनेके इच्छुक हैं, वे दीक्षाके
अनुष्ठानके बाद अवश्य ही अर्चन करेंगे। यद्यपि
स्वरूपतः दीक्षाकी अपेक्षा नहीं है, तथापि देहादिके
सम्बन्धके कारण कु-स्वभावसे युक्त विक्षिप्त चित्तवाले
व्यक्तियोंकी वैसी प्रवृत्तिको सङ्कुचित करनेके लिये
श्रीनारद ऋषि आदि महापुरुषोंने इस अर्चन मार्गमें
किसी-किसी स्थानपर कोई-कोई मर्यादा स्थापित की है।
श्रीरामार्चन-चन्द्रिकामें कहा गया है,—हे विप्रवर ! यह
मन्त्र-दीक्षा, पुरश्चरण और न्यासविधानके बिना ही
जपमात्रसे सिद्धि प्रदान किया करता है।”]
'नामकी दीक्षा-विधिकी निरपेक्षता'—पाञ्चरात्रिक मन्त्र
अप्राकृत ज्ञानको उदित कराके प्राकृत-अभिनिवेशको
ध्वंस करता है। अप्राकृत होनेसे मन्त्र और देवतामें
अभिन्न बुद्धि होती है। नाम और मन्त्रमें 'शब्द-सामान्य'
(इन्द्रियोंकी तृप्ति करनेवाले मनोकल्पित अन्य साधारण
शब्दोंके समान, ऐसी) बुद्धि करनेपर नरकमें वास होता
है। अप्राकृत बुद्धिसे ही मन्त्रदेवताके अर्चनका विधान
है। दीक्षाके समय शास्त्रोंके विधानानुसार ही मन्त्र-ग्रहणकी
विधि है; किन्तु श्रीकृष्णनाम,-बद्ध और मुक्त, दोनोंके
लिये ही आदरणीय हैं, अर्थात् बद्ध व्यक्ति श्रीकृष्णनाम-ग्रहण
करनेपर प्राकृतज्ञानसे मुक्त होते हैं, दूसरी ओर, मुक्त
होनेपर ही शुद्धकृष्णनाम ग्रहण कर सकते हैं। (आदिलीला
7/73 संख्या)—
“कृष्णमन्त्र हैते हय संसार-मोचन।
कृष्णनाम हैते पाबे कृष्णेर चरण॥”
[अर्थात् “श्रीकृष्णमन्त्रके (गुरुसे प्राप्त दीक्षामन्त्रके)
जपसे इस भौतिक संसारसे मुक्ति मिल जाती है (अर्थात्

18 |

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/108–110 ]
अपने स्वरूपका ज्ञान होता है) और श्रीकृष्णनामसे
(मुख्य फल प्रेमके द्वारा) श्रीकृष्णके चरणोंकी सेवाकी
प्राप्ति होती है।"] श्रीकृष्णसे अभिन्न श्रीकृष्णनाम
साक्षात् महामन्त्र होनेके कारण किसी पाञ्चरात्रिक
विधानके अनुगत नहीं है।
'नामकी पुरश्चर्या-विधि-निरपेक्षता'—मन्त्रसिद्धिके लिये
ही पुरश्चरणकी व्यवस्था है; श्रीनाम-महामन्त्रको वैसी
पुरश्चरण विधिकी अपेक्षा नहीं करनी पड़ती। एकबार
नामके उच्चारणके फलसे ही जब पुरश्चर्याके द्वारा
प्राप्त होनेवाले सभी फलोंकी प्राप्ति होती है, इसलिये
श्रीनामको पुरश्चरणकी अपेक्षा नहीं है।
'नामके जिह्वासे स्पर्श होनेसे ही उद्धार-साधन'—यहाँ
जिह्वा-शब्दसे 'सेवोन्मुख' जिह्वाको ही समझना चाहिये,
अन्यथा सांसारिक भोगोन्मुख जिह्वापर अपराधोंके विद्यमान
रहनेके कारण उसपर श्रीकृष्णनाम कभी भी उदित नहीं
होते—(भःरःसिः, पूःविः साधनभक्ति-लहरीमें)—
“अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः।
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः॥”
[अर्थात् “इसलिये श्रीकृष्णनामादि प्राकृत इन्द्रियोंकी
ग्राह्य वस्तु नहीं हो सकती। सेवोन्मुख अवस्थामें
श्रीकृष्ण-नाम-रूप-गुण-लीलादि भक्तकी अप्राकृत जिह्वा,
चक्षु आदि इन्द्रियोंमें स्वयं प्रकाशित होते हैं।”]
मध्यलीला 17/134 संख्या—
“अतएव कृष्णेर 'नाम', 'देह', 'विलास'।
प्राकृतेन्द्रिय-ग्राह्य नहे, हय स्वप्रकाश॥”
[अर्थात् “इसलिये श्रीकृष्णके 'नाम', उनकी 'देह'
और उनके 'विलास' प्राकृत (जड़ीय) इन्द्रियोंके द्वारा
ग्रहण करने योग्य नहीं हैं, अपितु स्वयं प्रकाशित
होनेवाले हैं।”] (भक्तिसन्दर्भ 256–276 और 283 संख्या
देखें)।
अन्त्यलीला 3/59–69, 75, 80, 176–180, 182–187;
20/11, 13 संख्या और भाः 1/1/14, 6/2/29, 39
संख्या देखें॥ 108 ॥
संसार-क्षय—गौण फल, श्रीकृष्णप्रेम ही
श्रीनामका मुख्य फल :—
अनुषङ्ग-फले करे संसाररे क्षय।
चित्त आकर्षिया कराय कृष्णे प्रेमोदय॥ 109 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णनाम जपके आनुषङ्गिक फलसे
भक्तका संसारका बन्धन कट जाता है। तब उसका
चित्त श्रीकृष्णके प्रति आकर्षित होता है और हृदयमें
सुप्त श्रीकृष्णप्रेम उदित हो जाता है॥ 109 ॥
सेवोन्मुखका श्रीकृष्णनाम :—
पद्यावली (29)में उद्धृत श्रीलक्ष्मीधरकृत
'नामकौमुदी'-श्लोक—
आकृष्टः कृतचेतसां सुमनसामुच्चाटनं चांहसा-
माचण्डालममूकलोकसुलभो वश्यश्च मुक्तिश्रियः।
नो दीक्षां न च सत्क्रियां न च पुरश्चर्यां मनागीक्षते
मन्त्रोऽयं रसनास्पृगेव फलति श्रीकृष्णनामात्मकः॥ 110 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 110 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—बहु-सुकृतिशाली साधुओंके चित्तके
आकर्षण-स्वरूप, पापनाशक, चण्डालसे आरम्भ करके
(गूँगेके अतिरिक्त) सभी लोगोंके लिये सुलभ, मुक्तिरूपी
ऐश्वर्यको वशीभूत करनेवाले,—ऐसे श्रीकृष्णनाम-स्वरूप
यह महामन्त्र जिह्वाके स्पर्शमात्रसे ही फल प्रदान करता
है, दीक्षादि सत्कार्य अथवा पुरश्चरण, इन सबकी
लेशमात्र भी अपेक्षा नहीं करता॥ 110 ॥
अनुभाष्य—
श्रीकृष्णनामात्मकः अयं मन्त्रः कृतचेतसां (मुक्तकुलानां)
सुमहतां (त्रिगुणातीतानां, 'सुमनसाम्' इति पाठे—मनस्विनाम्)
आकृष्टः (आकर्षकः, 'आकृष्टीकृतचेतसाम्' इति पाठे आकृष्टीकृतं
चेतो येषां तेषाम्), अंहसां (प्राकृताभिनिवेशज-चेष्टानां पुण्यपापानाम्)
उच्चाटनम् (उन्मूलनम्) आचण्डालं (चण्डाल-पर्यन्तम्)
अमूकलोकसुलभः (अमूकलोकानां मूकव्यतिरिक्तानां जनानां
वाक्शक्तिमताम् एव सुलभः सहजप्राप्यः इत्यर्थः), मुक्तिश्रियः
(मोक्षाश्रयचिन्तामणि-स्वरूपस्य) वश्यः (वशीकारकः) च;
(स चायं नाम-महामन्त्रः) दीक्षां (पापनाश-दिव्यज्ञान-
। 19

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:


[ पृष्ठ-शीर्षक ]

[ 15/110-116 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला


[ बायाँ स्तम्भ (Left Column) ]

विधायकसाधनमयीं) सत्क्रियां (फलसिद्धार्थां दक्षिणां पुरश्चर्यां
च पञ्चाङ्गोपासनात्मिकां क्रियां) मनाक् (ईषत्) अपि न ईक्षते
(नापेक्षते, परं तु) रसनास्पृक् (सेवोन्मुख-जिह्वा-स्पर्श-मात्रेण
एव) फलति (फलप्रदो भवति)।

श्लोक-भावानुवाद— श्रीकृष्णनामात्मक यह मन्त्र त्रिगुणातीत ('सुमनसाम्' इस पाठसे अर्थ होगा मनस्विनाम्) मुक्तकुलजनोंको आकृष्ट करनेवाला ('आकृष्टीकृतचेतसाम्' इस पाठके द्वारा अर्थ होगा जिनके चित्तको आकृष्ट किया है, उनकी) प्राकृत-अभिनिवेशके द्वारा पुण्य-पाप चेष्टाओंका उन्मूलन करनेवाला, चण्डाल तक गूँगेके अतिरिक्त सभी लोगोंके लिये सुलभ, मोक्षरूपी चिन्तामणिके ऐश्वर्यको वशीभूत करनेवाला यह नाम-महामन्त्र दीक्षा (पापनाशक दिव्यज्ञान), फलकी सिद्धिके लिये पुरश्चर्या और पञ्चाङ्गोपासनात्मक क्रियाओंकी लेशमात्र भी अपेक्षा नहीं रखता है तथा सेवोन्मुख जिह्वाके स्पर्श-मात्रसे ही फल प्रदान करता है॥110॥

'कनिष्ठ-वैष्णव'का लक्षण :—
अतएव याँर मुखे एक कृष्णनाम।
सेइ त' वैष्णव, करिह ताँहार सम्मान॥"111॥

अनुवाद— इसलिये जिसके मुखमें एक बार भी श्रीकृष्णनाम उदित हुआ है, वही वैष्णव है, उसका सम्मान करना॥"111॥

अमृतप्रवाह भाष्य— इसलिये गृहस्थ लोगोंके लिये एक श्रीकृष्णनामपरायण वैष्णवकी सेवा करनेसे ही वैष्णवसेवा-कार्यकी सिद्धि होती है; 'मन्त्र-दीक्षित वैष्णव'को यहाँपर विचारमें नहीं लाया गया है। इसका कारण यह है कि, विष्णुमन्त्रमें दीक्षित बहुतसे व्यक्तियोंको तत्त्वज्ञान नहीं होनेके कारण वे मायावाद आदि दोषोंसे दूषित हो सकते हैं, किन्तु नामापराधशून्य श्रीकृष्णनाम-उच्चारणकारी वैष्णवमें उन सब दोषोंके रहनेकी सम्भावना नहीं है। मन्त्र-दीक्षित व्यक्ति-वैष्णवप्राय हैं, किन्तु जिन्होंने निरपराध होकर एक बार श्रीकृष्णनाम किया है, वे


[ दायाँ स्तम्भ (Right Column) ]

सबसे कनिष्ठ होनेपर भी 'शुद्ध वैष्णव' हैं, —गृहस्थ-वैष्णव उस प्रकारके वैष्णवकी ही सेवा करेंगे॥111॥

अनुभाष्य— श्रील रूपप्रभुने स्व-लिखित श्रीउपदेशामृतमें कहा है—"कृष्णेति यस्य गिरि तं मनसाद्रियेत दीक्षास्ति चेत्" अर्थात् सद्गुरुसे दीक्षा-प्राप्त व्यक्ति अप्राकृत श्रद्धायुक्त होकर मुखसे श्रीकृष्णनाम उच्चारण करता है, मध्यमाधिकारी उसका मन-ही-मनमें आदर करेंगे—यही विधि है॥111॥

तीन प्रधान खण्डवासी :—
खण्डेर मुकुन्ददास, श्रीरघुनन्दन।
श्रीनरहरि,—एइ मुख्य तिन जन॥112॥

अनुवाद— खण्डवासियोंमें श्रीमुकुन्द दास, श्रीरघुनन्दन और श्रीनरहरि—ये तीन लोग मुख्य हैं॥112॥

महाप्रभुके द्वारा श्रीमुकुन्ददाससे श्रीरघुनन्दनके साथ उनके सम्बन्धकी जिज्ञासा :—
मुकुन्द दासेरे पुछे शचीर नन्दन।
“तुमि—पिता, पुत्र तोमार—श्रीरघुनन्दन?॥113॥
किवा रघुनन्दन—पिता, तुमि—तार तनय?
निश्चय करिया कह, याउक संशय॥”114॥

अनुवाद— श्रीशचीनन्दनने श्रीमुकुन्द दाससे पूछा,—"आप पिता हैं और रघुनन्दन आपके पुत्र हैं? अथवा रघुनन्दन आपके पिता हैं और आप उनके पुत्र हैं? आप निश्चय करके बतलाइये, जिससे मेरा संशय दूर हो सके॥"113-114॥

श्रीरघुनन्दनको कृष्णभक्त जानकर अमानी मानद श्रीमुकुन्दका पुत्रबुद्धिका त्याग और गुरु-बुद्धि रखना :—
मुकुन्द कहे,—“रघुनन्दन आमार 'पिता' हय।
आमि तार 'पुत्र', —एइ आमार निश्चय॥115॥
आमा सबार कृष्णभक्ति रघुनन्दन हैते।
अतएव पिता—रघुनन्दन, आमार निश्चिते॥”116॥

अनुवाद— श्रीमुकुन्दने कहा,—“रघुनन्दन मेरे 'पिता'


[ पृष्ठ-पाद ]

20 ।

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/115-124 ]
हैं और मैं उनका पुत्र हूँ-मेरा यही निश्चय है। हम
सबकी श्रीकृष्णभक्ति रघुनन्दनसे ही हुई है, इसलिये मेरे
विचारसे रघुनन्दन मेरे पिता हैं॥" 115-116॥
श्रीमुकुन्दके सद्-उत्तरको सुनकर महाप्रभुको हर्ष,
'सद्गुरु' अथवा 'वास्तविक पिता'की संज्ञा :-
शुनि' हर्षे कहे प्रभु, - "कहिले निश्चय।
याँहा हैते कृष्णभक्ति सेइ गुरु हय ॥" 117 ॥
अनुवाद-श्रीमुकुन्ददासके सद्-उत्तरको सुनकर
महाप्रभु प्रसन्न हुए और उनका समर्थन करते हुए
कहा, - "आपने ठीक ही कहा है। जिनसे श्रीकृष्णभक्तिकी
प्राप्ति होती है, वही गुरु होते हैं॥" 117॥
भक्तके जयगानमें मत्त भगवान् :-
भक्तेर महिमा कहिते प्रभु पाय सुख।
भक्तेर महिमा कहिते हय पञ्चमुख ॥ 118 ॥
अनुवाद-भक्तोंकी महिमाको कहते हुए महाप्रभुको
बहुत प्रसन्नता हो रही थी। भक्तोंकी महिमा कहते समय
मानो वे पाँच मुखवाले हो गये थे॥ 118॥
भक्तोंके समक्ष श्रीमुकुन्दके श्रीकृष्णप्रेमका वर्णन :-
भक्तगणे कहे, - "शुन मुकुन्देर प्रेम।
निर्मल, निगूढ़ प्रेम, येन शुद्ध हेम ॥ 119 ॥
अनुवाद-महाप्रभु भक्तोंसे कहने लगे, - "मुकुन्दके
श्रीकृष्णप्रेमके विषयमें सुनो। यह प्रेम अति गहरा और
निर्मल है, शुद्ध स्वर्णसे उसकी उपमा दी जा सकती
है॥ 119॥
बाहरसे लोक-व्यवहार, अन्तरमें श्रीकृष्ण-निष्ठा :-
बाह्ये राजवैद्य इँहो, करे राज-सेवा।
अन्तरे प्रेम इँहार जानिबेक केबा ॥ 120 ॥
अनुवाद-बाहरी रूपसे तो मुकुन्द एक राजवैद्य हैं
और राज-सेवा करते हैं, किन्तु इनके हृदयमें जो
श्रीकृष्णप्रेम है, उसे भला कौन जान सकता है? ॥ 120 ॥
अनुभाष्य-यद्यपि मुकुन्द साधारण लोगोंकी दृष्टिमें
राजवैद्यकी नौकरी करते थे, किन्तु वास्तवमें वे सच्चे
प्रेमिक भक्त (अर्थात् गृहस्थ वैष्णवके वेषमें महाभागवत
परमहंस) थे; साधारण लोग उसे नहीं जान सकते
थे॥ 120॥
एक दिनकी घटनाका वर्णन;
श्रीमुकुन्द और बादशाहका वृत्तान्त :-
एकदिन म्लेच्छ-राजा उच्च-टुङ्गिते।
चिकित्सार बात कहे इँहार अग्रेते ॥ 121 ॥
हेनकाले एक मयूर-पुच्छेर आड़ानी।
राज-शिरोपरि धरे एक सेवक आनि' ॥ 122 ॥
अनुवाद-एकदिन मुकुन्द म्लेच्छ-राजाके साथ
ऊँचे मञ्चपर बैठकर उनकी चिकित्साके विषयमें बतला
रहे थे, उसी समय राजाका एक सेवक मयूरके पंखोंसे
बना एक छाता लेकर आया। राजाको धूपसे बचानेके
लिये उस छातेको उनके सिरके ऊपर करके वह खड़ा
हो गया॥ 121-122 ॥
अनुभाष्य - 'उच्च-टुङ्गिते' - ऊँचे स्थानपर बने छोटेसे
कमरेमें। 'आड़ानी' - धूपसे बचानेवाला छाता, अथवा
बहुत बड़ा पंखा ॥ 121-122 ॥
शिखिपिच्छ देखि' मुकुन्द प्रेमाविष्ट हैला।
अति-उच्च टुङ्गि हैते भूमिते पड़िला ॥ 123 ॥
अनुवाद-मयूरके पंखको देखकर मुकुन्द कृष्णप्रेममें
आविष्ट हो गये और उस बहुत ऊँचे मञ्चसे भूमिपर
गिर पड़े॥ 123 ॥
राजार ज्ञान, -राजवैद्येर हइल मरण।
आपने नामिया तबे कराइल चेतन ॥ 124 ॥
अनुवाद-कहीं राजवैद्यकी मृत्यु तो नहीं हो गयी,
इस भयसे राजाने स्वयं मञ्चसे उतरकर मुकुन्दको
चेतन कराया॥ 124 ॥
। 21

[ 15/125-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
राजा बले,—'व्यथा तुमि पाइले कोन् ठाञि?'
मुकुन्द कहे,—'अतिबड़ व्यथा पाइ नाइ॥'125॥
अनुवाद—राजाने पूछा,—'तुम्हें कहाँ पीड़ा हो रही है?' मुकुन्दने कहा,—'मुझे कोई बहुत अधिक पीड़ा नहीं हुई है॥'125॥
राजा कहे,—'मुकुन्द, तुमि पड़िला कि लागि'?
मुकुन्द कहे,—'राजा, मोर व्याधि आछे मृगी॥'126॥
अनुवाद—तब राजाने पूछा,—'मुकुन्द, तुम किस कारण गिर पड़े?' मुकुन्दने कहा,—'हे राजन्, मुझे मिरगीका रोग है॥'126॥
श्रीमुकुन्दके द्वारा छल और आत्मगोपन करनेपर भी राजाके द्वारा उन्हें 'महापुरुष'के रूपमें पहचानना :-
महाविदग्ध राजा, सेइ सब जाने।
मुकुन्देरे हैल ताँर 'महासिद्ध'-ज्ञाने॥"127॥
अनुवाद—राजा बहुत बुद्धिमान थे, वे सब जान गये थे, इसलिये उन्होंने मुकुन्दको 'महासिद्ध'-पुरुषके रूपमें पहचान लिया॥"127॥
अनुभाष्य—'महाविदग्ध'—विशेष नीति-चतुर; 'महासिद्ध'—अलौकिक मुक्त पुरुष॥127॥
श्रीरघुनन्दनकी श्रीकृष्णसेवाका दृष्टान्त :-
“रघुनन्दन सेवा करे कृष्णेर मन्दिरे।
द्वारे पुष्करिणी, तार घाटेर उपरे॥128॥
कदम्बेर एक वृक्षे फुटे बारमासे।
नित्य दुइ फूल हय कृष्ण-अवतंसे॥"129॥
अनुवाद—“रघुनन्दन सदा श्रीकृष्णके मन्दिरमें सेवा करता है। मन्दिरके द्वारके बगलमें एक कुण्ड है, उसके घाटपर एक कदम्बके वृक्षपर बारहों महीने नित्य दो फूल श्रीकृष्णके शृङ्गारके लिये खिलते हैं॥"128-129॥
अनुभाष्य—'अवतंसे'—भूषण या कर्णभूषण या शिरोभूषण, उसके लिये॥129॥
महाप्रभुके द्वारा उन तीनोंकी सेवाका विभाग—

  1. श्रीमुकुन्दकी सेवा :-
    मुकुन्देरे कहे पुनः मधुर वचन।
    “तोमार कार्य—धर्म-धन-उपार्जन॥130॥
  2. श्रीरघुनन्दनकी सेवा :-
    रघुनन्दनेर कार्य—कृष्णेर सेवन।
    कृष्ण-सेवा बिना इँहार अन्य नाहि मन॥131॥
  3. श्रीनरहरिकी सेवा :-
    नरहरि रहु आमार भक्तगण-सने।
    एइ तिन कार्य सदा करह तिन जने॥"132॥
    अनुवाद—महाप्रभुने पुनः श्रीमुकुन्दसे मधुर वचन कहे,—“तुम्हारा कार्य लौकिक और पारमार्थिक धन उपार्जन करना है। रघुनन्दनका कार्य सदा श्रीकृष्णकी सेवा करना है। श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त इसका मन अन्य किसी कार्यमें नहीं है। नरहरि मेरे भक्तोंके साथमें रहे। तुम तीनों सदैव श्रीकृष्णसेवाके इन तीनों कार्योंको करो॥"130-132॥
    अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभु श्रीमुकुन्दको अत्यन्त प्रिय अन्तरङ्ग भक्तके रूपमें मानते थे; इसलिये दोनों भाइयों और पुत्रके सेवा-कार्यका विभाग करते समय श्रीमुकुन्दके धर्म और धन-उपार्जन, श्रीरघुनन्दनके श्रीमूर्तिसेवन और श्रीनरहरिके भक्तोंके साथ रहने-रूपी सेवा-भेदका निरूपण किया॥130-132॥
    श्रीसार्वभौम और श्रीवाचस्पति—इन दोनोंको श्रीकृष्णसेवाका निर्देश :-
    सार्वभौम, विद्यावाचस्पति,—दुइ भाइ।
    दुइजने कृपा करि' कहेन गोसाञि॥133॥
    “'दारु'-'जल'-रूपे कृष्ण प्रकट सम्प्रति।
    'दरशन'-'स्नाने' करे जीवेर मुक्ति॥134॥
    'दारुब्रह्म'-रूपे—साक्षात् श्रीपुरुषोत्तम।
    भागीरथी हन साक्षात् 'जलब्रह्म'-सम॥135॥
    22 |

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/133-144 ]
अनुवाद-श्रीसार्वभौम और श्रीविद्यावाचस्पति-ये दोनों
भाई हैं। इन दोनों भाइयोंपर कृपा करके श्रीचैतन्य
गोसाईंने कहा, - "इस कलियुगमें श्रीकृष्ण काष्ठ और
जलके रूपमें प्रकट हैं तथा (काष्ठके रूपमें) दर्शन
और (जलके रूपमें) स्नानसे जीवोंको मुक्त करते हैं।
वे 'दारुब्रह्म' के रूपमें साक्षात् श्रीपुरुषोत्तम (श्रीजगन्नाथदेव)
हैं और भागीरथी (गङ्गा) साक्षात् 'जलब्रह्म'के समान
हैं॥ 133-135॥
श्रीसार्वभौमको श्रीजगन्नाथ और श्रीवाचस्पतिको
गङ्गाकी सेवाकी आज्ञा :-
सार्वभौम ! कर 'दारुब्रह्म' - आराधन ।
वाचस्पति ! कर जलब्रह्मरे सेवन ॥' 136 ॥
अनुवाद-हे सार्वभौम ! आप दारुब्रह्म (श्रीजगन्नाथ)
की आराधना करें और हे वाचस्पति ! आप जलब्रह्म
(गङ्गा)की सेवा करें ॥' 136 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे सार्वभौम, आप दारुब्रह्मरूपी
श्रीजगन्नाथदेवकी आराधना करो; और हे विद्यावाचस्पति,
आप श्रीनवद्वीपधामके अन्तर्गत विद्यानगरमें रहकर
जल-ब्रह्मरूप गङ्गाकी सेवा करो ॥ 136 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिकी अपने सेव्यमें
निष्ठाकी महिमाका वर्णन :-
मुरारि-गुप्तरे प्रभु करि' आलिङ्गन ।
ताँर भक्तिनिष्ठा कहेन, - "शुन भक्तगण ॥ 137 ॥
पहले महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिको
श्रीकृष्णभजनका प्रलोभन :-
पूर्वे आमि इँहारे लोभाइल बार बार ।
'परम मधुर, गुप्त ! व्रजेन्द्रकुमार ॥ 138 ॥
स्वयं भगवान् कृष्ण - सर्वांशी, सर्वाश्रय ।
विशुद्ध-निर्मल-प्रेम, सर्वरसमय ॥ 139 ॥
सकल-सद्गुण-वृन्द-रत्न-रत्नाकर ।
विदग्ध, चतुर, धीर, रसिक-शेखर ॥ 140 ॥
मधुर-चरित्र कृष्णेर मधुर-विलास ।
चातुर्य, वैदग्ध्य करे याँर लीला-रस ॥ 141 ॥
श्रीकृष्णोपासनाकी ही सर्वश्रेष्ठताका कथन :-
सेइ कृष्ण भज तुमि, हओ कृष्णाश्रय ।
कृष्ण बिना अन्य-उपासना मने नाहि लय ॥' 142 ॥
अनुवाद-श्रीमुरारि गुप्तको आलिङ्गन करके महाप्रभु
उनकी भक्तिकी निष्ठाका वर्णन करते हुए कहने
लगे,- "हे भक्तों सुनो ! पहले मैंने इनको बार-बार
श्रीकृष्णका लोभ दिखलाया। मैंने कहा, - 'हे मुरारि
गुप्त ! व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्ण परम मधुर हैं। श्रीकृष्ण
स्वयं भगवान् हैं, वे सबके अंशी, सभीके आश्रय,
विशुद्ध निर्मल प्रेमरूप और समस्त रसोंके भण्डार हैं।
वे समस्त प्रकारके सद्गुणरूपी रत्नोंकी खान हैं, विदग्ध
अर्थात् सभी कार्योंमें प्रवीण हैं, अत्यन्त बुद्धिमान, धीर
और रसिकशेखर भी हैं। उनका चरित्र भी मधुर है
और उनका विलास भी मधुर है। वे अपने चातुर्य और
विदग्धतासे लीला-रसका आस्वादन करते हैं। इसलिये
आप उन्हीं श्रीकृष्णका भजन करो। श्रीकृष्णके आश्रित
हो जाओ। श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीकी उपासनाकी
बातको मनमें भी मत लाओ ॥' 137-142 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- "हे गुप्त, श्रीव्रजेन्द्र-कुमार-परम
मधुर" हैं आदि, बातें बोलकर (पहले) मैंने उनको
कृष्णभजनमें अधिक लोभ दिया था ॥ 138 ॥
महाप्रभुके प्रलोभनसे मुरारिका क्षणिक चित्त-परिवर्तन :-
एइमत बार बार शुनिया वचन ।
आमार गौरवे किछु फिरि' गेला मन ॥ 143 ॥
महाप्रभुके वचनोंमें दृढ़ विश्वास और दैन्य-ज्ञापन :-
आमारे कहेन, - "आमि तोमार किङ्कर ।
तोमार आज्ञाकारी आमि, नाहि स्वतन्तर ॥ "144 ॥
अनुवाद-बार-बार इस प्रकारके वचन सुनकर मेरे
प्रति गौरव बुद्धिके कारण इनका मन कुछ बदल गया
। 23

[ 15/143-154 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
था। इन्होंने मुझसे कहा,—“मैं आपका दास हूँ। आपका
आज्ञाकारी हूँ, मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ॥”143-144॥
श्रीरामकी उपासनाके त्यागकी चिन्तासे श्रीमुरारिकी
अनिद्रा, रोना और मृत्युकी इच्छा :—
एत बलि' घरे गेल, चिन्ति' रात्रिकाले।
रघुनाथ-त्याग-चिन्ताय हइल विकले ॥ 145 ॥
केमने छाड़िब रघुनाथेर चरण।
आजि रात्र्ये प्रभु मोर कराह मरण ॥ 146 ॥
एइमत सर्व-रात्रि करेन क्रन्दन।
मने सोयास्ति नाहि, रात्रि करेन जागरण ॥ 147 ॥
अनुवाद—यह कहकर ये अपने घर चले गये।
सारी रात श्रीरघुनाथकी उपासनाके त्यागके विषयमें
चिन्ता करते-करते व्याकुल हो गये। मैं किस प्रकार
श्रीरघुनाथके चरणोंको छोड़ूँगा ! हे प्रभो ! आप आज
रात ही मेरी मृत्यु करा दो ! इस प्रकार ये सारी रात
रोते रहे। इनका मन अशान्त था, इसलिये सारी रात
सोये ही नहीं ॥ 145-147 ॥
प्रातःकाल आकर श्रीराम-भजनके त्यागने और
महाप्रभुकी आज्ञा-पालनमें असमर्थता बतलाकर
दो सङ्कटोंमें पड़कर मृत्युकी इच्छा :—
प्रातःकाले आसि' मोर धरिल चरण।
कान्दिते कान्दिते किछु करे निवेदन ॥ 148 ॥
'रघुनाथेर पाय मुञि बेचियाछोँ माथा।
काढ़िते ना पारि माथा, मने पाइ व्यथा ॥ 149 ॥
श्रीरघुनाथ-चरण छाड़ान ना याय।
तव आज्ञा-भङ्ग हय, कि करि उपाय ॥ 150 ॥
ताते मोरे एइ कृपा कर, दयामय।
तोमार आगे मृत्यु हउक, याउक संशय ॥' 151 ॥
अनुवाद—प्रातःकालमें आकर इन्होंने मेरे चरण
पकड़ लिये। ये रोते-रोते कुछ निवेदन करने लगे,—'मैंने
श्रीरघुनाथके चरणकमलोंमें अपने सिरको बेच दिया है।
मैं अपने सिरको उनके चरणोंसे नहीं उठा सकता,
क्योंकि वह मेरे लिये बहुत पीड़ादायक होगा। मेरे लिये
श्रीरघुनाथके चरणकमलोंको छोड़ना सम्भव नहीं है।
परन्तु यदि मैं ऐसा नहीं करूँ, तो आपकी आज्ञाका
उल्लङ्घन होता है। मैं क्या कर सकता हूँ? इसलिये
हे दयामय ! आप मुझपर यह कृपा कीजिये कि, आपके
सामने ही मेरी मृत्यु हो जाय जिससे मेरी यह दुविधा
दूर हो जायेगी ॥' 148-151 ॥
अनुभाष्य—
“श्रीनाथे जानकीनाथे अभेदः परमात्मनि।
तथापि मम सर्वस्वः रामः कमलोचनः ॥ ”
[अर्थात् “भगवान् श्रीनाथ और श्रीजानकीनाथ अभिन्न
हैं, तो भी कमलनयन श्रीराम ही मेरे सर्वस्व हैं।”] ॥ 149 ॥
श्रीमुरारिके वचनोंसे महाप्रभुका हर्ष और प्रशंसा :—
एत शुनि' आमि बड़ मने सुख पाइलुँ।
इँहारे उठाञा तबे आलिङ्गन कैलुँ ॥ 152 ॥
साधु, साधु, गुप्त ! तोमार सुदृढ़ भजन।
आमार वचनेह तोमार ना टलिल मन ॥ 153 ॥
अनुवाद—यह सुनकर मेरा मन बहुत प्रसन्न हुआ।
तब मैंने इन्हें उठाकर इनका आलिङ्गन किया। अति
सुन्दर, अति सुन्दर गुप्त ! तुम्हारा भजन बहुत ही सुदृढ़
है जो मेरे वचन सुनकर भी तुम्हारा मन परिवर्तित नहीं
हुआ ॥ 152-153 ॥
सेवक और सेव्यका परस्परके प्रति आदर्श व्यवहार :—
एइमत सेवकेर प्रीति चाहि प्रभु-पाय।
प्रभु छाड़ाइलेह, पद छाड़ान ना याय ॥ 154 ॥
अनुवाद—प्रभुके प्रति सेवककी ऐसी ही प्रीति होनी
चाहिये। प्रभुके द्वारा छुड़ानेपर भी, सेवक उनके
चरणकमलोंको नहीं छोड़ सकता ॥ 154 ॥
अनुभाष्य— 'प्रभु'-जीवके नित्यसेव्य, आराध्य अथवा
उपास्यतत्त्व श्रीकृष्ण; मध्यलीला 4/186, 7/8, तेरहवें
24 ।

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/154-163 ]
अध्यायका (पूर्वार्द्ध) देखें; अन्त्यलीला 4/46-47 संख्या-
“सेइ भक्त-धन्य, ये ना छाड़े प्रभुर चरण।
सेइ प्रभु-धन्य, ये ना छाड़े निजजन॥
दुर्द्दैवे सेवक यदि याय अन्यस्थाने।
सेइ ठाकुर धन्य-ये तारे चुले धरि' आने॥"
[अर्थात् “वही भक्त धन्य है जो अपने प्रभुके
चरणोंको कभी भी नहीं छोड़ता और वे प्रभु धन्य हैं
जो अपने निजजनोंको कभी नहीं त्यागते। दुर्भाग्यवश
यदि सेवक अन्य किसी स्थानपर चला जाता है, तो
वे प्रभु धन्य हैं, जो अपने उस सेवकको उसके केशोंसे
पकड़कर खींचकर ले आते हैं।”] ॥ 154 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिकी उपास्यके प्रति निष्ठाकी परीक्षा,
श्रीमुरारिका परीक्षामें उत्तीर्ण होना :-
एइमत तोमार निष्ठा जानिवार तरे।
तोमारे आग्रह आमि कैलुँ बारे बारे ॥ 155 ॥
अनुवाद-इस प्रकार आपकी निष्ठाकी परीक्षा
लेनेके लिये ही मैंने आपसे बार-बार आग्रह किया
था ॥ 155 ॥
अनुभाष्य - 'जानिवार' - परीक्षा करनेके लिये;
'आग्रह'- कृष्णभजन करवानेके लिये आज्ञा देना ॥ 155 ॥
दैन्यके अवतार श्रीमुरारि- साक्षात् हनुमत्-विग्रह :-
साक्षात् हनुमान् तुमि श्रीराम-किङ्कर।
तुमि केने छाड़िबे ताँर चरण-कमल ॥ 156 ॥
सेइ मुरारि-गुप्त एइ-मोर प्राण सम।
इँहार दैन्य शुनि' मोर फाटये जीवन॥” 157 ॥
अनुवाद - आप तो श्रीरामके दास साक्षात् हनुमान्
हो। आप उनके चरण-कमलोंको क्यों छोड़ोगे? ये वही
मुरारि गुप्त मेरे प्राणोंके समान हैं। इनका दैन्य सुनकर
मेरा हृदय फटता है॥” 156-157 ॥
अनुभाष्य - इस प्रसङ्गमें अन्त्यलीला 4/30-45
संख्यामें श्रीजीवके पिता श्रीअनुपम अथवा श्रीवल्लभकी
श्रीराम-निष्ठा विचारणीय है ॥ 137-157 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीवासुदेव दत्तकी प्रशंसा :-
तबे वासुदेवे प्रभु करि' आलिङ्गन।
ताँर गुण कहे हञा सहस्र-वदन ॥ 158 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीवासुदेव दत्तका आलिङ्गन
किया और उनके गुणोंका ऐसे बखान करने लगे, मानो
उनके सैकड़ों मुख हों ॥ 158 ॥
महाप्रभुके चरणोंमें श्रीवासुदेवका कातर-हृदयसे निवेदन :-
निज-गुण शुनि' दत्त मने लज्जा पाञा।
निवेदन करे प्रभुर चरणे धरिया ॥ 159 ॥
“जगत् तारिते प्रभु तोमार अवतार।
मोर निवेदन एक करह अङ्गीकार ॥ 160 ॥
करिते समर्थ तुमि, हओ दयामय।
तुमि मन कर, तबे अनायासे हय ॥ 161 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके मुखसे अपने गुणोंको सुनकर
श्रीवासुदेव दत्त मन-ही-मन बहुत लज्जित हुए और
महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर निवेदन करने लगे, - “हे
प्रभो! जगत्का उद्धार करनेके लिये ही आपका
अवतार हुआ है, आप कृपया मेरा एक निवेदन
स्वीकार कीजिये। हे दयामय! उसे पूर्ण करनेमें आप
समर्थ हैं। यदि आप इच्छा करें, तो वह अनायास ही
पूर्ण हो सकता है ॥ 159-161 ॥
अलौकिक परदुःखदुःखी गौरदास श्रीवासुदेव-दत्त-ठाकुर :-
जीवेर दुःख देखि' मोर हृदय विदरे।
सर्वजीवेर पाप प्रभु देह' मोर शिरे ॥ 162 ॥
जीवेर पाप लञा मुञि करि नरक भोग।
सकल जीवेर, प्रभु, घुचाह भवरोग ॥” 163 ॥
अनुवाद-संसारमें जीवोंके दुःख देखकर मेरा हृदय
फटता है। हे प्रभो! सब जीवोंके पापोंको मेरे सिरपर
मढ़ दीजिये। जीवोंके पापोंको लेकर मैं नरक भोग
करूँ। और आप सभी जीवोंके भवरोगको दूर कर
दीजिये ॥” 162-163 ॥
। 25

[ 15/162-169 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य—पश्चिमी-देशोंके ईसाईभक्तोंमें यह विश्वास
है कि, उनके गुरु एकमात्र महामति यीशुमसीह ही
जीवोंके सभी पापोंके भारको ग्रहण करनेके लिये तत्पर
होकर ही जगत्में अवतीर्ण हुए थे। किन्तु श्रीगौरपार्षदोंमें
श्रीवासुदेव दत्त ठाकुरने श्रीहरिदास ठाकुरकी भाँति
यीशुमसीहकी अपेक्षा अनन्त कोटिगुणा अधिकतर उन्नत
और उदार सार्वजनिक विश्ववैष्णव-प्रेमभावकी जगत्के
जीवोंको शिक्षा दी है। श्रीवासुदेव दत्त ठाकुरमें जड़ीय
स्वार्थका त्यागरूप 'निःस्वार्थ', विष्णु-सेवारूप चिन्मय
'परार्थ' और 'स्वार्थ' अपूर्वरूपसे एकत्र सम्मिलित हैं। वे
श्रीगौरसुन्दरको वास्तव-वस्तु, माया और मायाकी कपटतासे
सर्वदा मुक्त स्वयं-भगवान् जानकर ऐसी प्रार्थना कर रहे
हैं। उन्होंने समस्त जीवोंके कृष्ण-विमुखतारूप भवरोग
(केवल पाप नहीं, सब प्रकारके पापोंकी अपेक्षा भी
भीषणतम 'अपराध'-राशि)को अपने कन्धोंपर ग्रहण
करके उनके भवरोगको दूर करनेके लिये
काय-मनो-वाक्यसे सम्पूर्ण निष्कपट़रूपसे प्रार्थना करके
जिस दयाका आदर्श प्रदर्शित किया है, वह सम्पूर्ण
जगत्में, केवल जगत्में ही क्यों, सम्पूर्ण चौदह भुवनोंमें
सर्वश्रेष्ठ कर्मियों और ज्ञानियोंकी भी कल्पनासे अतीत
है। मायाके वशीभूत, देहको ही मैं माननेवाले जीवोंकी
अपने-परायेकी भेद-बुद्धिके कारण हिंसा-वृत्ति प्रधान
होती है। वे (जन्म-मृत्यु, सुख-दुःखादि रूप) द्वैत-जगत्में
कर्म और ज्ञानके आदर्शका ही बहुत आदर करते हैं,
इसलिये उनमेंसे अधिकांश व्यक्ति ही कुकर्मी और
कुज्ञानी हैं। उनमें स्वाभाविक ईर्ष्या और द्वन्द्वभाव
होनेके कारण वे वैकुण्ठसेवक श्रीवासुदेव दत्तठाकुरकी
नरक-भोगकी प्रार्थनाको सुनकर उल्लसित होकर उन्हें
एक 'पुण्यवान् सत्कर्मी' अथवा 'ब्रह्मज्ञानी'के स्तरका
मानकर प्रचुर सम्मान अथवा प्रतिष्ठा प्रदान कर सकते
हैं। परन्तु दत्तठाकुर उसकी अपेक्षा भी अनन्त कोटि
गुणा अधिक जीवोंके प्रति 'दया'-प्रवृत्तिसे युक्त हैं, यह
बिल्कुल भी अतिरञ्जित प्रशंसा-वाक्य (अतिशयोक्ति)
अथवा अर्थवाद नहीं है, बल्कि अति निरपेक्ष सत्य
बात है। वास्तवमें उनके समान “परदुःखदुःखी”
श्रीगौरदासगणोंके आगमनसे पृथ्वी धन्य हुई है, केवल
प्रपञ्च ही नहीं, बल्कि समस्त जीवकुल भी धन्य हो
गया है। ऐसे श्रीगौरभक्तोंके गुणगानमें ही जिह्वाकी
सार्थकता है। और कवियों और ऐतिहासिक व्यक्तियोंकी
लेखनी जब लौकिक भावोंको छोड़कर उनके समान
अकिञ्चना भगवद्भक्तियुक्त महाभागवतोंके गुण-वर्णनके
कार्यमें नियुक्त होगी, तभी उसकी सर्वश्रेष्ठ-सार्थकता
होगी। महावदान्य श्रीकृष्णचैतन्यके दास इतने “महतोऽपि
महीयान्” (महान्‌से भी महान्) और “गरीयसोऽपि
गरीयान्” (श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ) हैं॥162-163॥
प्रियतम सेवककी प्रार्थनासे महाप्रभुका चित्त द्रवित :—
एत शुनि' महाप्रभुर चित्त द्रविला।
अश्रु-कम्प-स्वरभङ्गे कहिते लागिला॥164॥
श्रीवासुदेव-दत्तठाकुर—साक्षात् प्रह्लाद :—
“तोमार विचित्र नहे, तुमि—साक्षात् प्रह्लाद।
तोमार उपरे कृष्णेर सम्पूर्ण प्रसाद॥165॥
श्रीकृष्ण और भक्तका परस्परमें व्यवहार :—
कृष्ण सेइ सत्य करे, येइ मागे भृत्य।
भृत्य-वाञ्छा-पूरण बिना नाहि अन्य कृत्य॥166॥
सभी ब्रह्माण्डवासियोंके उद्धारके
विषयमें सत्य आश्वासन-दान :—
ब्रह्माण्ड जीवेर तुमि वाञ्छिले निस्तार।
बिना पाप-भोगे हवे सबार उद्धार॥167॥
स्वयं भगवान् श्रीकृष्णकी सर्वशक्तिमत्ताका वर्णन :—
असमर्थ नहे, कृष्ण धरे सर्वबल।
तोमाके वा केने भुञ्जाइबे पाप-फल?॥168॥
तुमि याँर हित वाञ्छ', से हइल 'वैष्णव'।
वैष्णवेर पाप कृष्ण दूर करे सब॥169॥
अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुका हृदय द्रवित हो
गया। उनके नेत्रोंसे आँसू बहने लगे, उनका शरीर
काँपने लगा और वे गद्गद स्वरसे कहने लगे,—“हे
26