श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
नौवाँ अध्याय 9/11-12 ]
कोई 'श्रीवैष्णव' थे। महाप्रभुके दर्शनोंसे वे सब विभिन्न
वैष्णव श्रीकृष्णके उपासक बन गये और श्रीकृष्णनामका
कीर्त्तन करने लग गये ॥ 11-12 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'राम उपासक'—रामात् वैष्णव।
'तत्त्ववादी'—मध्वाचार्य-मतके तत्त्वको स्वीकारकर जो
शुद्धद्वैतवाद स्थापित करते हैं। 'श्रीवैष्णव'—रामानुज-
सम्प्रदायी वैष्णव ॥ 11 ॥
अनुभाष्य—'तत्त्ववादी'—श्रीमाध्व-वैष्णवोंको श्रीशाङ्कर-
मायावादियोंसे पृथक् करनेके लिये माध्व-वैष्णवोंको
'तत्त्ववादी' कहा है। तत्त्ववादी-आचार्यगण केवलाद्वैतवादके
काल्पनिक विचारोंसे पुष्ट निर्विशेष-'ब्रह्मवाद'का खण्डन
करके 'भगवद्-तत्त्व' स्थापित करते हैं।
'माध्व वैष्णवगण'—ब्रह्मवैष्णव (ब्रह्म सम्प्रदायके
अन्तर्भुक्त) हैं, इसलिये वे आदिगुरु ब्रह्माजीकी (दशम
स्कन्धमें वर्णित) मोहित अवस्थाको स्वीकार नहीं करते,
क्योंकि श्रीमन्मध्वाचार्यने स्वरचित 'भागवत-तात्पर्य' टीकामॆं
इस 'ब्रह्ममोहन-लीला'का वर्णन नहीं किया है।
श्रीमाध्व-वैष्णवोंमें एक प्रमुख वैष्णव श्रीमाधवेन्द्रपुरीने
तत्त्ववादके चरम उद्देश्य प्रेमभक्तिका प्रचार किया।
गौड़ीय-वैष्णव माध्व होनेपर भी 'तत्त्ववादी' नहीं कहलाते।
'श्रीवैष्णव'—श्रीरामानुजीय सम्प्रदायकी मूलगुरु 'लक्ष्मी'
होनेके कारण उस सम्प्रदायके वैष्णव 'श्रीवैष्णव'के
नामसे जाने जाते हैं।
'तत्त्ववादिगण' श्रीकृष्णके उपासक होनेपर भी और
'श्रीवैष्णवगण' श्रीलक्ष्मी-नारायणके उपासक होनेपर भी,
दोनोंमें ही श्रीरामचन्द्रकी उपासनाकी प्रबलता देखी जाती
है।
तत्त्ववादि-सम्प्रदायके वर्तमानकालके लेखक
श्रीपद्मनाभाचार्य कहते हैं,—हमारे प्रधान-प्रधान श्रीमाध्वमठोंमें
श्रीराम-सीता विग्रहोंकी ही विशेष रूपसे पूजा होती है।
'अध्यात्म-रामायण'—नामक ग्रन्थके बारहसे पन्द्रह अध्यायों
तकमें मूल श्रीराम-सीताकी मूर्त्तिकी कहानी इस प्रकार
लिखी है—'किसी ब्राह्मणने प्रतिज्ञा की थी कि श्रीरामचन्द्रके
प्रतिदिन दर्शन किये बिना वे कुछ भी नहीं खायेंगे।
एक बार श्रीरामचन्द्र कार्यमें व्यस्त रहनेके कारण एक
सप्ताह तक प्रजाके सामने नहीं आ सके; इसलिये
राम-दर्शननिष्ठ ब्राह्मणने सात दिन तक पानीकी एक
बूँद तक भी नहीं ग्रहण नहीं की। अन्तमें आठवे
दिनके बाद नौंवे दिनमें ब्राह्मणने श्रीरामचन्द्रके निकट
उपस्थित होकर उनके दर्शन प्राप्त किये। ब्राह्मणकी
निष्ठाको सुनकर श्रीरामचन्द्रने लक्ष्मणजीको आदेश
दिया कि वे अपने घरमें रखी हुई राम-सीताकी
युगलमूर्ति इस वास्तविक भक्त ब्राह्मणको दे दें। ब्राह्मण
लक्ष्मणजीसे दोनों श्रीविग्रहोंको प्राप्त करके अपने
जीवन भर उनकी सेवा करता रहा और शरीर त्यागते
समय उसने उन श्रीविग्रहोंको श्रीहनुमानको दे दिया।
श्रीहनुमानने इन दोनों विग्रहोंको बहुत समय तक वक्षपर
धारण करके उनकी सेवा की। बहुत समयके बाद
भीमसेन गन्धमादन पर्वतपर श्रीहनुमानके पास गये।
श्रीहनुमानने विदा करते समय इन दोनों विग्रहोंको
भीमसेनको प्रदान किया। भीमसेनने उन्हें लाकर अपने
राजमहलमें संरक्षित रखा। उस राजवंशके अन्तिम
राजा 'क्षेमाकान्त'के समय तक यह दोनों विग्रह
राजमहलमें ही सेवित हुए। बादमें वे उत्कल (उड़ीसा)के
गजपति-राजाओंके हाथोंमें आये तथा उनके राजकोषमें
संरक्षित थे। श्रीमन्मध्वाचार्यने अपने शिष्य श्रीनरहरितीर्थको
राजकोषसे उन मूल रामसीता विग्रहोंको लेकर उनकी
सेवा करनेकी अनुमति दी। ये रामसीताके विग्रह
इक्ष्वाकु-राजाके समयसे सूर्यवंशीय राजाओंके द्वारा
महलोंमें सेवित होते थे। श्रीरामचन्द्रके जन्मके पहलेसे
ही दशरथ महाराज इनकी सेवा करते थे। बादमें
लक्ष्मणजी जब उन श्रीविग्रहोंकी सेवा करते थे, तब
उन्होंने श्रीरामचन्द्रके आदेशसे उन्हें पूर्वोक्त ब्राह्मणको
अर्पित किये थे।' श्रीमन्मध्वाचार्यने अपने तिरोभावसे तीन
मास सोलह दिन पहले इन दोनों विग्रहोंको प्राप्त करके
उडुपी गाँवके मूल-मठ उत्तर-राढ़ी-मठमें स्थापित किया,
तबसे श्रीमाध्व आचार्यगण उनके अधिकारी हैं।
। 341
[ 9/11-17 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
रामानुजीय-सम्प्रदायमें श्रीरामायणको गुरुके रूपमें
स्वीकार करनेकी पद्धति प्रचलित है। रामानुजीय भक्त
तिरुपति और अन्यान्य स्थानोंपर श्रीराममूर्तिकी पूजा
करते हैं। रामानुजीय-सम्प्रदायसे उत्पन्न 'रामानन्दी',
'जमायेत्' या 'रामात्'-सम्प्रदायमें श्रीरामसीताकी उपासना
प्रबलरूपसे प्रतिष्ठित हैं। रामानुजीय भक्त श्रीकृष्णकी
अपेक्षा श्रीरामके अधिक अनुगत हैं॥11॥
मार्गपर चलते हुए महाप्रभुके द्वारा गान :-
राम ! राघव ! राम ! राघव !
राम ! राघव ! पाहि माम्।
कृष्ण ! केशव ! कृष्ण ! केशव !
कृष्ण ! केशव ! रक्ष माम्॥13॥
गोमती गङ्गा :-
एइ श्लोक पथे पड़ि' करिला प्रयाण।
गौतमी-गङ्गाय याइ' कैल गङ्गास्नान॥14॥
अनुवाद— महाप्रभु मार्गमें यह गान करते चल रहे
थे—'हे राम! हे राघव! आप मेरा पालन कीजिये। हे
कृष्ण! हे केशव! आप मेरी रक्षा कीजिये।' चलते-चलते
महाप्रभु गौतमी-गङ्गा पहुँचे और उन्होंने वहाँ स्नान
किया॥13-14॥
अमृतप्रवाह भाष्य— श्रील कविराज गोस्वामीने जिस
तीर्थ दर्शनका वर्णन किया है, उसमें भौगोलिक क्रम
नहीं है, यह उन्होंने स्वयं भी स्वीकार किया है।
गोविन्ददास-कृत कड़चेमें (?) जो क्रम प्राप्त होता है,
उसकी भौगोलिक विवरणके साथ बहुत कुछ समानता
है। पाठकवर्ग उसी ग्रन्थका क्रम देखकर विचार करेंगे।
गोविन्ददासके मतानुसार राजमाहेन्द्रिसे महाप्रभु त्रिमन्दे
गये थे और वहाँसे दुण्डिराम तीर्थ गये। इस ग्रन्थके
मतानुसार राजमाहेन्द्रिसे गौतमी-गङ्गा जाकर महाप्रभुने
मल्लिकार्जुन तीर्थके लिये गमन किया॥14॥
अनुभाष्य— 'गौतमी गङ्गा'—गोदावरी नदीकी एक
धारा है। राजमाहेन्द्रिके दूसरे तटपर गौतम-ऋषिका
आश्रम था, इसलिये गोदावरीका नाम वहाँ गौतमी-गङ्गा
है॥14॥
मल्लिकार्जुन-तीर्थमें रामदास शम्भुका दर्शन :-
मल्लिकार्जुन-तीर्थे याइ' महेश देखिल।
ताँहा सब लोके कृष्णनाम लओयाइल॥15॥
अनुवाद— मल्लिकार्जुन-तीर्थमें जाकर महाप्रभुने
श्रीमहेशका दर्शन किया। महाप्रभुने उस तीर्थके सभी
लोगोंसे श्रीकृष्णनाम कीर्तन करवाया॥15॥
अनुभाष्य— 'मल्लिकार्जुन'—श्रीशैलम्; यह कर्णूलसे
सत्तर मील दूर कृष्णा नदीके दक्षिण तटपर अवस्थित
है। घिरी हुई चारदीवारीके केन्द्रमें प्रधानदेवता 'मल्लिकार्जुन'
शिवका मन्दिर है। यह ज्योतिर्लिङ्गोंमें एक प्रसिद्ध
शिवलिङ्ग है (कर्णुल म्यानुयेल)॥15॥
अहोबल नृसिंहका दर्शन :-
रामदास महादेवे करिल दरशन।
अहोबल-नृसिंहरे करिला गमन॥16॥
अनुवाद— रामदास महादेवके दर्शन करके महाप्रभु
अहोबल-नृसिंहदेवके दर्शनके लिये गये॥16॥
अनुभाष्य— 'अहोबल-नृसिंह'—मध्यलीला 1/106
देखें॥16॥
सिद्धवटमें श्रीराम और सीताके विग्रहोंका दर्शन :-
नृसिंह देखिया ताँरे कैल नति-स्तुति।
सिद्धवट गेला याँहा मूर्ति सीतापत्ति॥17॥
अनुवाद— महाप्रभुने नृसिंह भगवान्के दर्शन करके
उनको प्रणाम और स्तुति की। वहाँसे वे सिद्धवट
पहुँचे, जहाँ सीतापति श्रीरामचन्द्रका विग्रह विराजमान
है॥17॥
अनुभाष्य— 'सिद्धवट'—कुडापा नगरके दस मील
पूर्वमें स्थित है। यह स्थान 'सिधौट'—नामसे और पहले
किसी समय 'दक्षिण-काशी'के नामसे भी प्रसिद्ध था।
'आश्रम-वटवृक्ष'से इस नाम 'सिद्धवट'की उत्पत्ति हुई है
(कुडापा म्यानुयेल)॥17॥
342 ।
नौवाँ अध्याय 9/18-28 ]
वहाँ रामसेवक एक वैष्णव ब्राह्मणके द्वारा
महाप्रभुको भिक्षा प्रदान :-
रघुनाथ देखि' कैल प्रणति स्तवन।
ताँहा एक विप्र प्रभुर कैल निमन्त्रण॥ 18॥
सेइ विप्र रामनाम निरन्तर लय।
'राम' 'राम' बिना अन्य वाणी ना कहय॥ 19॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरघुनाथजीके दर्शन करके
उन्हें प्रणामकर उनकी स्तव-स्तुति की। वहाँ एक
ब्राह्मणने महाप्रभुको भोजनके लिये निमन्त्रण दिया। वह
ब्राह्मण निरन्तर रामनामका जप किया करता था। 'राम'
'राम'के अतिरिक्त वह मुखसे कुछ भी नहीं बोलता
था॥ 18-19॥
उसके घरमें एक दिन वास और उसपर कृपा :-
सेइ दिन ताँर घरे रहि' भिक्षा करि'।
ताँरे कृपा करि' आगे चलिला गौरहरि॥ 20॥
अनुवाद—उस दिन महाप्रभु उस ब्राह्मणके घरमें
रहे और भिक्षा ग्रहण की। उसपर कृपा करके महाप्रभु
आगे यात्रापर चल पड़े॥ 20॥
स्कन्दक्षेत्रमें स्कन्द और त्रिमठमें वामन-विग्रहका दर्शन :-
स्कन्दक्षेत्र-तीर्थे कैल स्कन्द-दरशन।
त्रिमठ आइला ताँहा देखि' त्रिविक्रम॥ 21॥
अनुवाद—स्कन्दक्षेत्र-तीर्थमें आकर महाप्रभुने स्कन्द
(कार्तिकेय)का दर्शन किया। फिर त्रिमठमें आकर
उन्होंने श्रीत्रिविक्रम (वामन भगवान्)का दर्शन किया॥21॥
अनुभाष्य—'स्कन्द'—कार्तिकेय। यह तीर्थ हैदराबादमें
है॥ 21॥
पूर्वोक्त ब्राह्मणका रामनामके बदले कृष्णनाम ग्रहण :-
पुनः सिद्धवट आइला सेइ विप्र-घरे।
सेइ विप्र कृष्णनाम लय निरन्तरे॥ 22॥
अनुवाद—त्रिमठसे महाप्रभु पुनः सिद्धवटमें उसी
ब्राह्मणके घर लौटकर आये। तब वह ब्राह्मण निरन्तर
कृष्णनामका जप कर रहा था॥ 22॥
महाप्रभुके प्रश्न और विप्रका उत्तर :-
भिक्षा करि' महाप्रभु ताँरे प्रश्न कैल।
“कह विप्र, एइ तोमार कोन् दशा हैल ? ॥ 23 ॥
पूर्वे तुमि निरन्तर लैते रामनाम।
एबे केने निरन्तर लओ कृष्णनाम ॥” 24 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने उस ब्राह्मणके घर भिक्षा ग्रहण
करनेके बाद उससे पूछा,—“हे ब्राह्मण ! कहो तुम्हारी
यह दशा कैसे हुई? पहले तो तुम निरन्तर रामनामका
जाप करते थे, अब क्यों निरन्तर कृष्णनामका कीर्तन
कर रहे हो? ॥” 23-24 ॥
विप्र बोले,—“एइ तोमार दर्शन-प्रभाव।
तोमा देखि' गेल मोर आजन्म-स्वभाव ॥ 25 ॥
बाल्यावधि रामनाम-ग्रहण आमार।
तोमा देखि' कृष्णनाम आइल एकबार ॥ 26 ॥
सेइ हैते कृष्णनाम जिह्वाते बसिला।
कृष्णनाम स्फुरे, रामनाम दूरे गेला ॥ 27 ॥
बाल्यकाल हैते मोर स्वभाव एक हय।
नामेर महिमा-शास्त्र करिये सञ्चय ॥ 28 ॥
अनुवाद—उस ब्राह्मणने उत्तर दिया,—“यह आपके
दर्शनका प्रभाव है। आपके दर्शनसे मेरा आजन्म-स्वभाव
चला गया। मैं बाल्यकालसे ही श्रीरामनाम करता था,
परन्तु आपके दर्शनसे मेरे मुखमें एकबार श्रीकृष्णनाम
उदित हुआ। तभीसे श्रीकृष्णनाम मेरी जिह्वापर बैठ गया
और अब जिह्वापर श्रीकृष्णनाम ही स्फुरित होता है
और श्रीरामनाम दूर चला गया। बाल्यकालसे मेरा एक
स्वभाव है कि मैं शास्त्रोंसे नामकी महिमाको संग्रह
करता आया हूँ॥ 23-28 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जन्मसे ही जो श्रीरामनाम-जप
। 343
[ 9/25-33 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
करनेका स्वभाव था, वह परिवर्तित होकर
श्रीकृष्णनाम-जपका स्वभाव हो गया ॥ 25 ॥
'राम'-शब्दका व्युत्पत्तिगत अर्थ :-
(पद्मपुराणमें श्रीरामचन्द्र शतनामस्तोत्रका आठवाँ श्लोक) -
रमन्ते योगिनोऽनन्ते सत्यानन्दे चिदात्मनि।
इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥ 29 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अनन्त सत्यानन्द-चिदात्मस्वरूप
परमतत्त्वमें सभी योगी रमण (आनन्द प्राप्त) करते हैं।
इसलिये परमब्रह्म-वस्तुको रामनामसे कहा जाता है॥29॥
अनुभाष्य-
योगिनः (विषयनिवृत्ताः) अनन्ते (जड़ातीते) सत्यानन्दे
चिदात्मनि (सच्चिदानन्दे) रमन्ते। इति [अतः] रामपदेन असौ
(रामचन्द्रः) परं ब्रह्म अभिधीयते (कथ्यते)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29 ॥
'कृष्ण'-शब्दका व्युत्पत्तिगत अर्थ :-
श्रीधरस्वामी-उद्धृत महाभारतमें उः पः (71/4)-
कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः।
तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ॥ 30 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 30 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'कृष-धातु'-भू अर्थात् आकर्षक
सत्त्वा-वाचक है; ण-शब्द निवृत्ति अर्थात् परमानन्द-वाचक
है। कृष-धातुमें ण-प्रत्यय लगानेसे उन दोनोंके एक
होनेपर 'कृष्ण'-शब्दसे परमब्रह्म प्रतिपादित हुए हैं॥30॥
अनुभाष्य-
कृषिः-शब्दः भूः-वाचकः (सत्ता-निर्धारकः) णश्च
निर्वृत्ति-वाचकः (आनन्दाभिधः); तयोः (द्वयोः) ऐक्यं कृष्णः
परं ब्रह्म इति अभिधीयते (कथ्यते)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 30 ॥
रामनाम और कृष्णनामका लीलागत वैचित्र्य :-
परंब्रह्म दुइनाम समान हइल।
पुनः आर शास्त्रे किछु विशेष पाइल ॥ 31 ॥
अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 31 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-पूर्वोक्त दो श्लोकोंका तात्पर्य
लेनेपर, राम और कृष्ण नाममें परमब्रह्म समान
अर्थवाले हैं, तथापि शास्त्रोंमें और भी कुछ कहा गया
है, उसे बादमें कहा जा रहा है ॥ 31 ॥
अनुभाष्य- 'राम' और 'कृष्ण', ये दोनों नाम ही
परब्रह्मके हैं। उनमें समानता वर्तमान है। परन्तु
शास्त्रोंमें इन दोनों नाम-परब्रह्मके रस-तारतम्यके वैशिष्ट्यका
अनुसन्धान करनेपर एक विशेष बात समझमें आती
है॥31॥
सहस्र विष्णुनामके समान एक रामनाम :-
पद्मपुराणमें श्रीरामचन्द्र शतनामस्तोत्र 9वाँ श्लोक,
उत्तरखण्डमें श्रीविष्णु सहस्रनाम-स्तोत्रमें (72/335)-
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनामभिस्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ 32 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 32 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'राम' 'राम' 'राम' कहकर
मनोरम जो राम हैं, मैं उनमें रमण (आनन्द प्राप्त)
करता हूँ। हे वरानने (सुन्दरी), एक राम-नाम सहस्र
विष्णुनामोंके तुल्य है ॥ 32 ॥
अनुभाष्य-
हे वरानने, अहं राम रामेति रामेति सङ्कीर्त्त्य मनोरमे
(मनोहरे) रामे रमे (आनन्दं प्राप्नोमि)। [एकं] राम-नाम
सहस्रनामभिः (विष्णुसहस्रनामभिः) तुल्यम्।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 32 ॥
तीन बार रामनामके समान एक कृष्णनाम :-
(ब्रह्माण्डपुराणका वचन)-
सहस्रनाम्नां पुण्यानां त्रिरावृत्त्या तु यत्फलम्।
एकावृत्त्या तु कृष्णस्य नामैकं तत् प्रयच्छति ॥ 33 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 33 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- (विष्णुके) पवित्र सहस्रनामोंका
तीनबार पाठ करनेसे जो फल होता है, कृष्णनाम एक
344 ।
बार उच्चारित होनेसे ही वही फल देते हैं। तात्पर्य यह
है कि एक रामनाम सहस्र विष्णुनामके समान है।
इसलिये तीन बार रामनामका फल एक बार कृष्णनामसे
ही प्राप्त होता है॥ 33 ॥
अनुभाष्य-
पुण्याणां (पवित्राणां) सहस्रनाम्नां (विष्णुसहस्रनाम्नां) त्रिरावृत्त्या
(वारत्रयपठनेन) यत् फलं प्राप्नोति, कृष्णस्य एकं नामं
एकवृत्त्या (सकृत्तदुच्चारणेन) तत् फलं तु प्रयच्छति (ददाति)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥
श्रीकृष्णनामका सर्वश्रेष्ठ माहात्म्य :-
एइ वाक्ये कृष्णनामेर महिमा अपार।
तथापि लइते नारि, शुन हेतु तार ॥ 34 ॥
ब्राह्मणके द्वारा पहले श्रीकृष्णनाम नहीं लेनेका हेतु :-
इष्टदेव राम, ताँर नामे सुख पाइ।
सुख पाञा रामनाम रात्रिदिन गाइ ॥ 35 ॥
श्रीकृष्णविग्रह ही श्रीकृष्णनाम प्रदान करनेमें समर्थ होनेके
कारण ब्राह्मणका महाप्रभुमें श्रीकृष्ण-ज्ञान :-
तोमार दर्शने यबे कृष्णनाम आइल।
ताहार महिमा तबे हृदये लागिल ॥ 36 ॥
सेइ कृष्ण तुमि-इहा साक्षात् निर्धारिल।”
एत कहि' विप्र प्रभुर चरणे पड़िल ॥ 37 ॥
अनुवाद-यद्यपि इस श्लोकमें कहा गया है कि
श्रीकृष्णनामकी महिमा अपार है, तथापि मैं श्रीकृष्णनाम
नहीं लेता था, इसका कारण सुनिये। मेरे इष्टदेव
श्रीरामचन्द्र हैं और उनके नामके कीर्तनसे मुझे बहुत
आनन्द मिलता था। इसलिये मैं रात-दिन श्रीरामनामका
कीर्तन करते हुए आनन्द प्राप्त करता था। परन्तु
आपके दर्शन करके जब मेरी मुखमें श्रीकृष्णनाम
स्फुरित हुआ, तभीसे मेरे हृदयमें श्रीकृष्णनामकी महिमा
प्रकाशित हुई। आप ही वे श्रीकृष्ण हैं, यह मुझे साक्षात्
अनुभव हुआ है।” यह कहकर ब्राह्मण महाप्रभुके
चरणोंमें गिर पड़ा॥ 34-37 ॥
वृद्धकाशीमें शम्भुका दर्शन :-
ताँरे कृपा करि' प्रभु चलिला आर दिने।
वृद्धकाशी आसिं' कैल शिव-दरशने ॥ 38 ॥
अनुवाद-उस ब्राह्मणपर कृपा करके महाप्रभु
अगले दिन वहाँसे चले गये और वृद्धकाशीमें आकर
उन्होंने शिवजीका दर्शन किया॥ 38 ॥
अनुभाष्य- 'वृद्धकाशी'- वर्तमान नाम 'वृद्धाचलम्'
है। यह दक्षिण आर्कट-जिलेकी भेलार-नदीकी एक
उपनदी 'मणिमुख'के तटपर अविस्थित है। पहले इसका
नाम 'वृद्धकाशी' था (दक्षिण-आर्कट म्यानुयेल)। कोई-कोई
'कालहस्तिपुर'को वृद्धकाशी कहते हैं। श्रीरामानुजाचार्यके
मौसेरे भाई गोविन्दने इन्हीं शिवकी बहुत दिनों तक
सेवा की थी॥ 38 ॥
उसके बाद अन्य ग्राममें वास और महाप्रभुके दर्शनोंके
लिये बहुतसे लोगोंका आना :-
ताँहा हैते चलि' आगे गेला एक ग्रामे।
ब्राह्मण-समाज ताँहा, करिल विश्रामे ॥ 39 ॥
प्रभुर प्रभावे लोक आइल दरशने।
लक्षार्बुद लोक आइसे ना याय गणने ॥ 40 ॥
अनुवाद-महाप्रभु वृद्धकाशीसे आगे चले। एक
ग्राममें उन्होंने देखा कि अधिकांश व्यक्ति ब्राह्मण थे,
तब महाप्रभुने उस स्थानपर ही विश्राम किया। महाप्रभुके
प्रभावसे लाखों-लाखों लोग उनके दर्शनके लिये आने
लगे। जितने लोग आये उनकी गणना नहीं की जा
सकती॥ 39-40 ॥
महाप्रभुके दर्शनोंसे सभीको वैष्णवताकी प्राप्ति :-
गोसाञिर सौन्दर्य देखि' ताते प्रेमावेश।
सबे 'कृष्ण' कहे, 'वैष्णव' हैल सर्वदेश ॥ 41 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके सौन्दर्यको और उसके ऊपर
उनके प्रेमके आवेशको देखकर सभी 'कृष्ण' नामका
कीर्तन करने लगे। इस प्रकार वहाँके सब देशवासी
वैष्णव बन गये ॥ 41 ॥
। 345
[ 9/42-48 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
महाप्रभुके द्वारा समस्त मतवादियोंके विचारोंका खण्डन :—
तार्किक-मीमांसक, यत मायावादिगण।
सांख्य, पातञ्जल, स्मृति, पुराण, आगम ॥ 42 ॥
निज-निज-शास्त्रोद्ग्राहे सबाइ प्रचण्ड।
सर्व मत दुषि' प्रभु करे खण्ड खण्ड ॥ 43 ॥
वेदान्तके अचिन्त्यभेदाभेदरूप भक्तिसिद्धान्तकी स्थापना :—
सर्वत्र स्थापय प्रभु वैष्णवसिद्धान्ते।
प्रभुर सिद्धान्त केह ना पारे खण्डिते ॥ 44 ॥
महाप्रभुके अकाट्य सिद्धान्तसे पराजित
व्यक्तियोंके द्वारा भक्तिसिद्धान्त-ग्रहण :—
हारि' हारि' प्रभुमते करेन प्रवेश।
एइमते 'वैष्णव' करिल दक्षिण देश ॥ 45 ॥
अनुवाद—वहाँ तार्किक, मीमांसक, मायावादी, सांख्यक, पातञ्जल-योगी, स्मृति, पुराण और आगम शास्त्रोंको माननेवाले बड़े-बड़े पण्डित लोग थे, वे सभी अपने-अपने शास्त्रोंके प्रमाण देकर अपने मतको स्थापित करनेमें प्रवीण थे। महाप्रभुने उन सबके मतोंके दोषोंको दिखलाकर उन सभीके सिद्धान्तोंको खण्ड-खण्ड करके सर्वत्र वैष्णव सिद्धान्तको स्थापित किया, परन्तु कोई भी महाप्रभुके सिद्धान्तका खण्डन न कर सका। पराजय स्वीकार करके सभी दार्शनिकोंने महाप्रभुके मतमें प्रवेश किया। इस प्रकार महाप्रभुने दक्षिण-भारतको वैष्णव बना दिया॥ 42-45 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'तार्किक'—गौतमीय नैयायिक और कणादीय वैशेषिक। 'मीमांसक'—जैमिनी-मतके स्थापक। 'मायावादी'—शङ्करके मतके स्थापक। 'सांख्य'—कपिल-मत। 'पातञ्जल'—योगशास्त्र। 'स्मृति'—मन्वादि आदि बीस धर्मशास्त्रीय संहिता। 'पुराण'—अठारह महापुराण और अठारह उपपुराण। 'आगम'—तन्त्रशास्त्र। 'शास्त्रोद्ग्राहे'—शास्त्र-संस्थापन करनेमें। 'प्रभुर सिद्धान्त', 'एइमते'—महाप्रभुका मत अर्थात् वेद, वेदान्त और ब्रह्मसूत्रके द्वारा स्थापित अचिन्त्यभेदाभेद-सिद्धान्त॥ 42-45 ॥
पाखण्डी बौद्धाचार्यका अपने शिष्योंके साथ आगमन :—
पाषण्डी आइल यत पाण्डित्य शुनिया।
गर्व करि' आइल सङ्गे शिष्यगण लञा ॥ 46 ॥
अनुवाद—जब पाखण्डी (बौद्धाचार्य)ने महाप्रभुके पाण्डित्यके विषयमें सुना, तो अपनी विद्वताका अभिमान करते हुए वह अपने शिष्योंके साथ महाप्रभुके पास आया॥ 46 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पाषण्डिगण'—वेद, स्मृति, दर्शन, पुराण और आगम आदि शास्त्रोंसे बहिर्भूत मतवादियोंको पाखण्डी कहा जाता है॥ 46 ॥
उसका तर्क :—
बौद्धाचार्य महापण्डित विजन वनेते *।
प्रभुर आगे उद्ग्राह करि' लागिला बलिते ॥ 47 ॥
*पाठान्तरमें 'निज नवमते'।
अनुवाद—बौद्धाचार्य महापण्डित 'विजन वनेते' (अर्थात् एकान्तमें) महाप्रभुके पास आकर अपने सिद्धान्त स्थापित करनेके लिये तर्क करने लगा।
पाठान्तरमें 'निज नवमते', अर्थात् अपने नये मत॥ 47 ॥
असम्भाष्य होनेपर भी कृपाको प्रकाशित करके उसके विचारका खण्डन :—
यद्यपि असम्भाष्य बौद्ध अयुक्त देखिते।
तथापि बलिला प्रभु गर्व खण्डाइते ॥ 48 ॥
अनुवाद—यद्यपि बौद्धोंसे वार्त्तालाप नहीं करना चाहिये और यहाँ तक कि उनको देखना तक नहीं चाहिये, तथापि महाप्रभुने उसके अभिमानको चूर करनेके लिये उसके साथ बातचीत की॥ 48 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'असम्भाष्य'—बातचीत करनेके योग्य नहीं, क्योंकि वे वेदविरुद्ध और भक्तिसे बहिर्मुख हैं। 'देखिते अयुक्त'—निरीश्वर बौद्धादिको देखनेपर 'सचेलं जलमाविशेत्' [वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिये],
346 ।
नौवाँ अध्याय 9/48-56 ]
क्योंकि (सात्वत) शास्त्र-वाक्यानुसार नास्तिक बौद्धादिका
दर्शन अनुचित है ॥ 48 ॥
अश्रौतपन्थी बौद्ध-शास्त्रका विचार-युक्तिसे खण्डन :-
तर्क-प्रधान बौद्धशास्त्र 'नव मते'।
तर्केइ खण्डिल प्रभु, ना पारे स्थापिते ॥ 49 ॥
बौद्धाचार्य 'नव प्रश्न' सब उठाइल।
दृढ़ युक्ति-तर्के प्रभु खण्ड खण्ड कैल ॥ 50 ॥
अनुवाद-बौद्धशास्त्र मुख्यतः तर्कपर आधारित हैं
और इनमें नौ प्रधान सिद्धान्त हैं। महाप्रभुने
तर्कके द्वारा ही उनके तर्कका खण्डन कर दिया और
बौद्धाचार्य अपना मत स्थापित न कर सका। बौद्धाचार्यने
अपने नौ प्रधान सिद्धान्तोंके आधारपर सब प्रश्न
उठाये, परन्तु महाप्रभुने दृढ़ युक्ति और तर्कोंसे उनके
समस्त विचारोंका खण्डन कर दिया ॥ 49-50 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-बौद्धमतमें 'हीनायन' और 'महायन'
दो प्रकारके मार्ग है। उस मार्गपर गमन करनेके
प्रस्थान-स्वरूप नौ सिद्धान्त हैं; जैसे-(1) विश्व
अनादि है, इसलिये ईश्वरशून्य है, (2) जगत् असत्य
है, (3) अहंतत्त्व, (4) जन्म-जन्मान्तर (पुनर्जन्म)
और परलोक सत्य हैं, (5) बुद्ध ही तत्त्व-प्राप्तिका
उपाय हैं, (6) निर्वाण (मुक्ति) ही परमतत्त्व है, (7)
बौद्धदर्शन ही वास्तविक दर्शन है, (8) वेद मानवके
द्वारा रचित हैं, (9) दया आदि सद्-धर्मका आचरण
ही बौद्ध-जीवन है ॥ 49 ॥
बौद्धाचार्यकी पराजय देख लोगोंका हास्य :-
दार्शनिक पण्डित सबाइ पाइल पराजय।
लोके हास्य करे, बौद्ध पाइल लज्जा-भय ॥ 51 ॥
अनुवाद-सभी (पाखण्डी) दार्शनिक और पण्डित
महाप्रभुसे पराजित हुए और जब लोग उनपर हँसने
लगे, तब बौद्ध लोग लज्जित और भयभीत हुए ॥ 51 ॥
अनुभाष्य-'दार्शनिक पण्डित सबाइ'-उपस्थित पाखण्डी
दर्शन-आचार्यगण ॥ 51 ॥
वैष्णव सिद्धान्तको श्रवणकर महाप्रभुको वैष्णव सम्प्रदायके
अन्तर्गत जानकर बौद्धाचार्यका षड़यन्त्र :-
प्रभुके वैष्णव जानि' बौद्ध घरे गेल।
सकल बौद्ध मिलि' तबे कुमन्त्रणा कैल ॥ 52 ॥
'महाप्रसाद'के नामपर महाप्रभुको अपवित्र
अन्नके द्वारा छलनेकी चेष्टा :-
अपवित्र अन्न एक थालिते भरिया।
प्रभु-आगे निल 'महाप्रसाद' बलिया ॥ 53 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके विचारोंसे बौद्धलोग जान गये
कि वे वैष्णव हैं। अपने मठमें जाकर सभी बौद्धोंने
मिलकर षड़यन्त्र रचा। उन बौद्धोंने अपवित्र अन्नसे
भरकर एक थाली लाकर महाप्रभुके आगे रख दी और
कहा कि यह भगवान्का 'महाप्रसाद' है ॥ 52-53 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'अपवित्र'-वैष्णवोंके द्वारा ग्रहण
करने अयोग्य ॥ 53 ॥
अनुभाष्य-अवैष्णवोंके द्वारा अर्पित नैवेद्य (भोग)
कितना भी सुन्दर रूपमें क्यों ना सजाया गया हो,
उसमें बिन्दुमात्र भी त्रुटि ना हो, हजार बार हजार
मुखोंसे उसे 'महाप्रसाद' कहनेपर भी वास्तवमें उनमें
विष्णुदास्य या चिद्-दर्शनका अभाव अर्थात् उनकी
विष्णुविमुखताके कारण उस अन्नको विष्णु कभी भी
ग्रहण नहीं करते। इसलिये शुद्धवैष्णवदास उसको
'अपवित्र' मानकर कभी भी उसे ग्रहण करते या खाते
नहीं हैं ॥ 53 ॥
जैसा कर्म, वैसा फल :-
हेनकाले महाकाय एक पक्षी आइल।
ओठे करि' थालि-सह अन्न लञा गेल ॥ 54 ॥
बौद्धगणेर उपरे अन्न अमेध्य हञा।
बौद्धाचार्येर माथाय थालि पड़िल बाजिया ॥ 55 ॥
पाखण्डी बौद्धकी सजा :-
तेरछे पड़िल थालि, -माथा काटि' गेल।
मूर्च्छित हञा आचार्य भूमिते पड़िल ॥ 56 ॥
। 347
[ 9/54-63 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—उसी समय वहाँ एक विशाल पक्षी
उड़ता हुआ आया और अपनी चोंचमें अन्न-सहित
थालीको उठाकर ले गया। ऊपर आकाशमें जाकर वह
थाली पक्षीकी चोंचसे छूट गयी और सारा अपवित्र अन्न
उन्हीं बौद्धोंके सिरपर आ गिरा और थाली बौद्धाचार्यके
सिरपर गिरी, जिससे बहुत जोरका शब्द हुआ। वह
थाली तिरछी होकर ऐसे बौद्धाचार्यके सिरपर आकर
गिरी, जिससे उसका सिर फट गया और वह मूर्च्छित
होकर भूमिपर गिर पड़ा॥54-56॥
गुरुकी दशाको देखकर शिष्योंके द्वारा
महाप्रभुके चरणोंमें शरणागति :-
हाहाकार करि' कान्दे सब शिष्यगण।
सबे आसि' प्रभु-पदे लइल शरण॥57॥
“तुमि त' ईश्वर साक्षात्, क्षम अपराध।
जीयाओ आमार गुरु, करह प्रसाद॥”58॥
अनुवाद—अपने गुरुकी दशा देखकर सभी शिष्य
हाहाकार करते हुए रोने लगे। तब सब आकर
महाप्रभुके चरणोंकी शरण लेकर कहने लगे,–“आप तो
साक्षात् भगवान् हैं, हमारे अपराध क्षमा कीजिये। कृपा
करके हमारे गुरुदेवको पुनः जीवित कर दीजिये॥”57-58॥
शरणागतिके बाद महाप्रभुके द्वारा उन्हें कृष्णनाम-दान :-
प्रभु कहे,–“सबे कह 'कृष्ण' 'कृष्ण' 'हरि'।
गुरुकर्णे कह कृष्णनाम उच्च करि'॥59॥
महाप्रभुके मुखसे कीर्तित कृष्णनामके श्रवणसे ही अचैतन्य
मायावादी जीवको चेतना एवं वैष्णवताकी प्राप्ति :-
तोमा-सबार गुरु तब पाइबे चेतन।”
सब बौद्ध मिलि' करे कृष्णसङ्कीर्त्तन॥60॥
गुरु-कर्णे कहे सबे 'कृष्ण' 'राम' 'हरि'।
चेतन पाञा आचार्य बोले 'हरि' 'हरि'॥61॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने उनसे कहा,–“तुम सब
मिलकर 'कृष्ण' 'कृष्ण' 'हरि' आदि नामोंका कीर्तन
करो। और अपने गुरुके कानमें भी उच्चस्वरसे
कृष्णनाम कहो, तब तुम सबके गुरुकी चेतनता लौट
आयेगी।” सभी बौद्ध मिलकर कृष्णनाम-सङ्कीर्तन करने
लगे और गुरुके कानमें सब 'कृष्ण' 'राम' 'हरि' नाम
सुनाने लगे। नाम सुनकर बौद्धाचार्यकी चेतना लौट
आयी और वह भी 'हरि' 'हरि' बोलने लगा॥59-61॥
अनुभाष्य—'सब बौद्ध'—बौद्धगण महाप्रभुके श्रीमुखसे
कृष्णनाम-दीक्षा प्राप्त करनेपर अब पहलेकी भाँति
पाखण्डवत् आचरण करनेवाले बौद्ध नहीं रहे। अब
उन्होंने 'वैष्णव' बनकर जीवोंके स्वरूपधर्म-विष्णुपूजाको
आरम्भ किया।
गुरु ही शिष्यका उद्धार करते हैं अर्थात् वे
अचैतन्य (आत्माको भूले हुए) शिष्यको चैतन्य (आत्माकी
स्मृति) सम्पादन करके विष्णु-पूजाका ज्ञान प्रदान करके
उसे उसमें नियुक्त करते हैं—यही 'दीक्षा' अथवा
दिव्यज्ञान है।
किन्तु यहाँ देखते हैं कि अचेतन बौद्धाचार्यके पूर्व
शिष्योंने ही महाप्रभुकी कृपासे कृष्णनामसे चैतन्य प्राप्त
करके उन नाममात्रके गुरुके कानमें कृष्णनामका
उच्चारण करके आचार्यका कार्य किया। बाहरी दृष्टिकोणसे
बौद्धाचार्य गुरु थे और स्वयंको उनका शिष्य माननेवाले
उनके शिष्य थे। परन्तु इस घटनाके बाद गुरु और
शिष्यकी परस्पर पदवी विपरीत हो गयी। क्योंकि जो
वास्तवमें श्रीकृष्णकृपासे चैतन्य-लाभ करके श्रीकृष्णनामका
उच्चारण करते हैं, वे ही 'गुरु' हैं और अचैतन्य-व्यक्ति
ही 'लघु' अर्थात् उनके शिष्य हैं—यही जगद्गुरु महाप्रभुकी
शिक्षा है॥59-61॥
बौद्धके द्वारा महाप्रभुको श्रीकृष्ण जानकर स्तुति :-
कृष्ण बलि' आचार्य प्रभुरे करेन विनय।
देखिया सकल लोक हइल विस्मय॥62॥
महाप्रभुका अन्तर्धान होना :-
एइरूपे कौतुक करि' शचीर नन्दन।
अन्तर्धान कैल, केह ना पाय दर्शन॥63॥
348 ।
नौवाँ अध्याय 9/62–68 ]
अनुवाद—जब बौद्धाचार्यने कृष्ण बोलते हुए महाप्रभुको
आत्म-समर्पण किया, तब यह देखकर उपस्थित सभी
लोग बहुत आश्चर्यचकित हुए। तब श्रीशचीनन्दन एक
और कौतुक करते हुए वहाँसे अन्तर्धान हो गये और
उनको कोई देख नहीं पाया॥ 62–63॥
तिरुपति एवं तिरुमलयमें आगमन और बालाजी-दर्शन :-
महाप्रभु चलि' आइला त्रिपत्ति-त्रिमल्ले।
चतुर्भुज-मूर्त्ति देखि' व्येङ्कटाद्रये चले॥ 64॥
अनुवाद—तब महाप्रभु त्रिपत्ति-त्रिमल्लमें आये। वहाँ
चतुर्भुज श्रीविष्णुमूर्तिके दर्शन करके वे व्येङ्कट-पर्वतकी
ओर गये॥ 64॥
अनुभाष्य—महाप्रभुके द्वारा भ्रमण किये गये स्थानोंका
प्रायः ठीक प्रकारसे वर्णन किया जा रहा है—
'तिरुपति' अथवा 'तिरुपट्टूर'—उत्तर आर्कटमें
चन्द्रगिरि-तालुकके अन्तर्गत प्रसिद्ध तीर्थ है। व्येङ्कटेश्वरके
नामसे व्येङ्कट-गिरि अथवा व्येङ्कट-पर्वतके ऊपर आठ
मील दूरीपर 'श्री' और 'भू'—दो शक्तियोंके साथ चतुर्भुज
'बालाजी' अथवा व्येङ्कटेश्वर विष्णु-विग्रह है। इसको
व्येङ्कटक्षेत्र भी कहते हैं। सम्पूर्ण दक्षिण भारतमें यही
एक श्रेष्ठ ऐश्वर्य-सम्पद्-शाली मन्दिर है। आश्विन
मासमें यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है।
'निम्न-तिरुपति'—व्येङ्कट पर्वतकी तलहटीमें स्थित है।
वहाँ कुछ मन्दिर हैं। यहाँ श्रीगोविन्दराज और
श्रीरामचन्द्रजीकी मूर्तियाँ हैं। 'तिरुमल्लय'—सम्भवतः
पर्वतके ऊपर विराजमान तिरुपतिके प्राचीन कालका
नामान्तर है॥ 64॥
व्येङ्कटाचलमें श्रीराम-दर्शन :-
त्रिपत्ति आसिया कैल श्रीराम-दरशन।
रघुनाथ-आगे कैल प्रणाम-स्तवन॥ 65॥
पाना-नृसिंहका दर्शन :-
स्वप्रभावे लोक सबार कराञा विस्मय।
पाना-नृसिंहे आइला प्रभु दयामय॥ 66॥
नृसिंहे प्रणति-स्तुति प्रेमावेशे कैल।
प्रभुर प्रभावे लोक चमत्कार हैल॥ 67॥
अनुवाद—त्रिपत्तिमें आकर महाप्रभुने श्रीरामचन्द्रके
दर्शन किये। उन्होंने श्रीरघुनाथको प्रणाम किया और
उनकी स्तव-स्तुति की। अपने प्रभावसे महाप्रभुने सभी
लोगोंको विस्मित कर दिया। तब दयामय महाप्रभु
पाना-नृसिंहमें आये। महाप्रभुने प्रेमावेशमें नृसिंह भगवान्को
प्रणाम किया और उनकी स्तव-स्तुति की। महाप्रभुके
प्रेमावेशको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये॥ 65–67॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पाना-नृसिंह'—चीनीका पाना अर्थात्
शरबत जिसका भोग श्रीनृसिंहदेवको लगता है॥ 66॥
अनुभाष्य—'पाना-नृसिंह' (पानाकल् नरसिंह)—कृष्णा
जिलेमें विजयवाड़ा शहरसे सात मील दूर 'मङ्गलगिरि'में
स्थित है। छह सौ सीढ़ियाँ चढ़नेके बाद यह प्रसिद्ध
मन्दिर है। प्रवाद (किंवदन्ती)—इन श्रीनृसिंहदेवको
शरबतका भोग लगानेपर, वे शरबतको आधेसे अधिक
ग्रहण नहीं करते। इस मन्दिरमें ताञ्जोरके भूतपूर्व
महाराजाने 'श्रीकृष्णके द्वारा व्यवहार किये गये कहलानेवालें'
एक शङ्खका दान किया था। मार्चके महीनेंमें इस
स्थानपर बहुत बड़ा मेला लगता है॥ 66॥
शिवकाञ्चीमें शिवका दर्शन और महाप्रभुकी कृपासे
शैवोंको भी वैष्णवताकी प्राप्ति :-
शिवकाञ्ची आसिया कैल शिव-दरशन।
प्रभावे 'वैष्णव' कैल सब शैवगण॥ 68॥
अनुवाद—फिर महाप्रभुने शिवकाञ्ची आकर शिवजीका
दर्शन किया। अपने प्रभावसे महाप्रभुने समस्त शैवोंको
वैष्णव बना दिया॥ 68॥
अनुभाष्य—'शिवकाञ्ची'—अर्थात् काञ्चीपुरम, यह
'दक्षिणकाशी'के नामसे जाना जाता है। यहाँ असंख्य
शिवलिङ्ग हैं, उनमेंसे 'एकाम्बर कैलाशनाथ'का मन्दिर
बहुत प्राचीन है॥ 68॥
। 349
[ 9/69–74 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
विष्णुकाञ्चीमें लक्ष्मी-नारायणका दर्शन
और वहाँके लोगोंको वैष्णवताकी प्राप्ति :—
विष्णुकाञ्ची आसि' देखिल लक्ष्मी-नारायण।
प्रणाम करिया कैल बहुत स्तवन॥ 69 ॥
प्रेमावेशे नृत्य-गीत बहुत करिल।
दिन-दुइ रहिं लोके 'कृष्णभक्त' कैल॥ 70 ॥
अनुवाद—उसके बाद महाप्रभुने विष्णुकाञ्ची आकर
श्रीलक्ष्मी-नारायणका दर्शनकर उनको प्रणाम किया
और उनकी बहुत स्तव-स्तुति की। प्रेमावेशमें महाप्रभुने
बहुत देर तक नृत्य-गान किया। दो दिन वहाँ रहकर
महाप्रभुने लोगोंको कृष्णभक्त बना दिया॥ 69–70 ॥
अनुभाष्य—'विष्णुकाञ्ची'—काञ्चीपुरमसे पाँच मीलकी
दूरी पर है। यहाँ 'वरदराज' विष्णु-विग्रह और 'अनन्त
सरोवर' है॥ 69 ॥
त्रिकालहस्तीमें शम्भु-दर्शन :—
त्रिमलय देखि' गेला त्रिकालहस्ती-स्थाने।
महादेव देखि' ताँरे करिल प्रणामे ॥ 71 ॥
अनुवाद—त्रिमलयका दर्शन करके महाप्रभु त्रिकालहस्ती
नामक स्थानपर आये। वहाँ महादेवका दर्शन करके
महाप्रभुने उन्हें प्रणाम किया॥ 71 ॥
अनुभाष्य—'त्रिमलय'—ताञ्जोर अथवा तौण्डीर-मण्डलमें
स्थित है।
'त्रिकालहस्ती'—तिरुपतिसे बाइस मील उत्तर-पूर्व
दिशामें सुवर्णमुखी-नदीके दक्षिण-तटपर स्थित है। यह
'श्रीकालहस्ती' अथवा प्रचलित भाषामें 'कालहस्ती'-नामसे
भी जाना जाता है। यह स्थान 'वायुलिङ्ग-शिव'
मन्दिरके लिये विख्यात है। (उत्तर आर्कटम्यानुयेल) ॥ 71 ॥
पक्षीतीर्थमें शिव-दर्शन, वृद्धकोल-तीर्थमें
श्वेतवराह-विग्रहका दर्शन :—
पक्षीतीर्थ देखि' कैल शिव दरशन।
वृद्धकोल-तीर्थे तबे करिला गमन॥ 72 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने पक्षीतीर्थमें आकर शिवजीका
दर्शन किया और वहाँसे वृद्धकोल-तीर्थके लिये गमन
किया॥ 72 ॥
अनुभाष्य—'पक्षीतीर्थ'—तिरुकालुकुन्द्रम्। चेङ्गलपट्टुसे
नौ मील दक्षिण-पूर्वमें, समतल भूमिसे 500 फुट ऊँचे
पर्वतमालाके ऊपर एक शिव-मन्दिर है। इस पर्वतका
नाम वेदगिरि अथवा वेदाचलम् है और मूर्तिका
नाम—वेदगिरिश्वर है। प्रतिदिन दो बाज पक्षी आकर
सेवायेत पुजारीसे आहार प्राप्त करते हैं। वहाँ किंवदन्ती
है कि अनादिकालसे ही ऐसा चला आ रहा है
(चेङ्गलपट्टु म्यानुयेल)।
'वृद्धकोल'—श्रीवराह-विग्रहका मन्दिर; इस मन्दिरकी
विशेषता यह है कि यह केवल एक पत्थरसे ही बना
है। यह 'महाबलीपुरम्' अथवा 'सप्तमन्दिर'के अन्तर्गत
'बलिपीठम्'से प्रायः एक मील दक्षिणमें है। इस मन्दिरके
अन्दर वराहरूपी विष्णुविग्रहके ऊपर 'शेष'-नागने छत्र
धारण किया हुआ है॥ 72 ॥
पीताम्बर-शम्भुका दर्शन :—
श्वेतवराह देखि', ताँरे नमस्करि'।
पीताम्बर-शिव-स्थाने गेला गौरहरि ॥ 73 ॥
अनुवाद—वृद्धकोलमें आकर महाप्रभुने श्वेतवराहका
दर्शनकर उन्हें प्रणाम किया। फिर श्रीगौरहरि पीताम्बर
शिवजीका दर्शन करनेके लिये गये॥ 73 ॥
अनुभाष्य—'पीताम्बर'—अर्थात् 'चिदाम्बरम्'। यह
'कुडालोर'-नगरसे छब्बीस मील दक्षिणकी ओर स्थित
है। विग्रहका नाम—'आकाशलिङ्ग' शिव है। उनतालीस
एकड़ जमीनके ऊपर बना हुआ यह एक बहुत बड़ा
मन्दिर है। यह चारों ओर साठ फुट चौड़े पक्के रास्तेसे
घिरा हुआ है (दक्षिण आर्कट म्यानुयेल) ॥ 73 ॥
शियाली-भैरवीरूपिणी कात्यायनीका दर्शन :—
शियाली भैरवी देवी करि' दरशन।
कावेरीर तीरे आइला शचीर नन्दन ॥ 74 ॥
350 ।
नौवाँ अध्याय 9/74-79 ]
अनुवाद-शियाली-भैरवीदेवी [दुर्गादेवी] का दर्शनकर
श्रीशचीनन्दन कावेरीके तटपर आये ॥ 74 ॥
अनुभाष्य- 'शियालि'-ताञ्जोर जिलेमें है। ताञ्जोर
नगरसे अड़तालीस मील उत्तर-पूर्व दिशामें शियाली
तालुक (मौजा)के अन्तर्गत एक प्रधान ग्राम है। इस
स्थानपर एक विख्यात शैव-मन्दिर और एक बहुत बड़ा
सरोवर है। 'तिरुज्ञान सम्बन्धर्' नामक एक शिवभक्तने
यह मन्दिर भेंट किया था। (किंवदन्ती)-यह शिवभक्त
शिशुकालमें जब मन्दिरमें आया था, तब भैरवीने
उसको स्तनपान कराया था (ताञ्जोर गेजेटियार)। (इस
अध्यायके 358 संख्या पयारका अनुभाष्य देखें)।
वहाँसे महाप्रभु त्रिचिनपल्ली जिलेमें कोलिरण अथवा
कावेरी नदीके तटपर आये।
'कावेरी'- "कावेरी च महापुण्या" (भाः 11/5/40) ॥ 74 ॥
कावेरीके तटपर शम्भुका दर्शन :-
गो-समाजे शिव देखि' आइला वेदावन।
महादेव देखि' ताँरे करिला वन्दन ॥ 75 ॥
अनुवाद-गो-समाज नामक स्थानपर शिवजीका
दर्शन करके महाप्रभुने वेदावनमें जाकर महादेवका
दर्शन करके उनकी वन्दना की ॥ 75 ॥
अनुभाष्य- 'गो-समाज'- शैवतीर्थ है। 'वेदावन'-ताञ्जोर
जिलेके तिरुत्तराइमण्डि-तालुकके दक्षिणपूर्व-कोणमें और
पयेन्ट कलिमियारके पाँच मील उत्तरमें स्थित है। वहाँके
ब्राह्मणोंके मतानुसार तीर्थोंके महत्त्वके हिसाबसे रामेश्वरके
बाद इसका स्थान आता है (ताञ्जोर गेजेटियार) ॥ 75 ॥
महाप्रभुकी कृपासे शैवोंको वैष्णवताकी प्राप्ति :-
अमृतलिङ्ग-शिव देखि' वन्दन करिल।
सब शिवालये शैव 'वैष्णव' हइल ॥ 76 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने अमृतलिङ्ग-शिवके दर्शनकर
उनकी वन्दना की। महाप्रभुके प्रभावसे सभी शिवालयोंके
शैव वैष्णव बन गये ॥ 76 ॥
देवस्थानमें विष्णुदर्शन और 'श्रीवैष्णवों'के सङ्ग आलाप :-
देवस्थाने आसि' कैल विष्णु-दरशन।
श्री-वैष्णवेर सङ्गे ताँहा गोष्ठी अनुक्षण ॥ 77 ॥
अनुवाद-देवस्थान आकर महाप्रभुने भगवान् विष्णुका
दर्शन किया और वहाँ रहनेवाले 'श्रीवैष्णव' सम्प्रदायके
लोगोंके साथ बहुत समय इष्टगोष्ठी की ॥ 77 ॥
कुम्भकोणममें सरोवर-दर्शन, शिवक्षेत्रमें शिव-दर्शन :-
कुम्भकर्ण-कपाले देखि' सरोवर।
शिव-क्षेत्रे शिव देखे गौराङ्गसुन्दर ॥ 78 ॥
अनुवाद-तब कुम्भकर्ण-कपालमें महाप्रभुने एक
विशाल सरोवरका दर्शन किया। तत्पश्चात् श्रीगौराङ्गसुन्दरने
शिवक्षेत्र नामक स्थानपर शिवजीका दर्शन किया ॥ 78 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'कुम्भकर्ण कपाले' - कुम्भकर्णकी
खोपड़ीसे जो सरोवर बना था ॥ 78 ॥
अनुभाष्य- 'कुम्भकर्ण कपाले'-'कपाल' अर्थात्
खोपड़ी। कुम्भकर्ण ही ताञ्जोर जिलेमें स्थित वर्तमान
कुम्भकोणम-नगर है। यह ताञ्जोर नगरसे बीस मील
उत्तर पूर्व दिशामें है। इस स्थानपर बारह शिवमन्दिर,
चार विष्णुमन्दिर और एक ब्रह्मामन्दिर है (ताञ्जोर
गेजेटियार)।
'शिवक्षेत्र'-ताञ्जोर नगरमें एक शिवगङ्गा-सरोवर
है। यहाँ एक विशाल बृहतीश्वर-शिव-मन्दिर है ॥ 78 ॥
पापनाशनमें विष्णुके दर्शनके बाद श्रीरङ्गमें जाना :-
पापनाशने विष्णु कैल दरशन।
श्रीरङ्गक्षेत्रे तबे करिला गमन ॥ 79 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने पापनाशन नामक तीर्थमें भगवान्
श्रीविष्णुका दर्शन किया। तब उन्होंने श्रीरङ्गक्षेत्रके लिये
प्रस्थान किया ॥ 79 ॥
अनुभाष्य- 'पापनाशन' - कुम्भकोणम्से आठ मील
दक्षिण-पश्चिममें स्थित है (ताञ्जोर गेजेटियार)। तिनेभेलि
जिलेके अन्तर्गत पालमकोटा नगरसे उनतीस मील
। 351
[ 9/79 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
पश्चिममें पापनाशन-नामक एक नगर है। इसी स्थानपर
ही एक मन्दिरके निकट ताम्रपर्णी-नदी पहाड़से समतल
भूमिपर आ गयी है। (तिनेभेलि म्यानुयेल)।
'श्रीरङ्गक्षेत्र'-त्रिचिनपल्लीके निकट कावेरी या
कोलिरन-नदीके ऊपर श्रीरङ्गम अवस्थित है। यह
ताञ्जोर जिलेमें कुम्भकोणम्से चार-पाँच कोस पश्चिममें
है। श्रीरङ्गनाथजीका मन्दिर भारतके समस्त मन्दिरोंकी
अपेक्षा बड़ा है; इसकी सात प्राचीर हैं। श्रीरङ्गमके सात
रास्तोंके पुराने नाम-
(1) धर्मका पथ।
(2) राजमहेन्द्रका पथ।
(3) कुलशेखरका पथ।
(4) आलिनाड़नका पथ।
(5) तिरुविक्रमका पथ।
(6) माड़माड़ि-गाइसका तिरुविडि पथ। और
(7) अड़इयावलइन्दानका पथ।
चोलराज आदिकुलोत्तुङ्गसे पहले राजमहेन्द्रने राज्य
किया था; उससे पहले धर्मवर्मने और उससे पहले
श्रीरङ्गमका पतन हुआ था। कुलशेखर आदि कुछ
व्यक्तियों और आलवान्दारुने श्रीरङ्ग-मन्दिरमें वास
किया था। यामुनाचार्य, श्रीरामानुज, सुदर्शनाचार्य आदिने
श्रीरङ्गनाथकी सेवाकी प्रधान अध्यक्षता की थी। लक्ष्मीकी
अवतार 'गोदादेवी'-जो बारह सिद्ध दिव्यसूरियोंमेंसे एक
हैं, उन्होंने श्रीरङ्गनाथके साथ विवाह करके भगवद्-देहमें
प्रवेश किया। कार्मुक-अवतार तिरुमङ्गइ आलोवरने
दस्यु-वृत्तिके द्वारा एकत्रित धनसे श्रीरङ्गनाथ मन्दिरकी
चौथी प्राचीर और अन्यान्य गृहादिका निर्माण करवाया
था। कहा जाता है, -289 कल्याब्दमें तोन्डरडिप्पडि
आलोवर जन्म ग्रहण करके भक्तिसाधन करते-करते
किसी वेश्याके प्रलोभनसे पतित हुए। श्रीरङ्गनाथने
अपने सेवककी दुर्दशा देखकर उसके उद्धारकी अभिलाषासे
अपने एक सोनेके बर्तनको किसी सेवक द्वारा उस स्त्री
(वेश्या)के घरमें भेज दिया। मन्दिरमें सोनेके बर्तनको
नहीं देखनेपर बहुत खोज-बीन करनेपर वह उस स्त्रीके
घरमें मिला। श्रीरङ्गनाथकी उस स्त्रीपर कृपा देखकर
भक्तका भ्रम दूर हुआ। तिरुमङ्गइके आविर्भाव कालसे
पहले इन्होंने रङ्गनाथ मन्दिरकी तीसरी प्राचीरका निर्माण
करवाया और वहाँ इन्होंने तुलसीके बगीचेकी रचना
की थी।
श्रीरामानुजके शिष्य-कुरेश, उनके सबसे छोटे
पुत्र-श्रीरामपिल्लाइ, उनके पुत्र-वाग्विजय भट्ट, उनके
पुत्र-वेदव्यास भट्ट या श्रीसुदर्शनाचार्य हैं। इन महात्माकी
वृद्धावस्थाके समय मुसलमानोंने रङ्गनाथ मन्दिरपर आक्रमण
किया और बारह हजार श्रीवैष्णवोंको मार डाला। तब
श्रीरङ्गनाथदेवको तिरुपतिमें स्थानान्तरित किया गया था।
विजयनगर राज्यके अधीन गिङ्गिके शासनकर्त्ता श्रीवैष्णव
ब्राह्मण 'कम्पन्न उदय' या 'गोप्पणार्य' ने श्रीवैष्णवोंकी
प्रार्थनापर श्रीरङ्गनाथदेवको 'तिरुपति'से 'सिंहब्रह्म'में लाकर
तीन वर्ष तक रखा और बादमें 1293 शकाब्दमें
श्रीरङ्गक्षेत्रमें पुनः प्रतिष्ठित किया। श्रीरङ्गनाथ मन्दिरके
प्राचीरके पूर्व भागमें श्रील वेदान्त-देशिकके द्वारा रचित
यह श्लोक खुदा हुआ है, जैसे-
“आनीय नीलशृङ्गद्युतिरचित-जगद्भ्रान्तादञ्जनाद्रेः
श्रेण्यामाराध्य कञ्चित् समयमथ निहत्योद्धनुष्कांस्तुलुष्कान्।
लक्ष्मी-क्ष्माभ्यामुभाभ्यां सह निजनगरे स्थापयन् रङ्गनाथं
सम्यग्वर्यां सपर्यां पुनरकृतयशो दर्पणे गोप्पणार्यः ॥ ”
“विश्वेशं रङ्गराजं वृषभगिरितटात् गोप्पणः क्षौणिदेवो
नीत्वा स्वां राजधानीं निजबलनिहतोत्सिक्त-तौलुष्कसैन्यः।
कृत्वा श्रीरङ्गभूमिं कृतयुगसहितां तन्तु लक्ष्मी-महीभ्यां
संस्थाप्यास्यां सरोजोद्भवं इव कुरुत साधुचर्यां सपर्याम् ॥ ”
अर्थात् “गोप्पणार्यने तलुष्क लोगोंको मारकर जगत्को
आनन्द देनेवाले नीलशृङ्गद्युतिसे रचित श्रीरङ्गनाथदेवको
अञ्जन पर्वतकी श्रेणीसे लाकर लक्ष्मी और भूदेवीके
साथ अपने नगरमें स्थापित किया। उन्होंने श्रेष्ठ अर्चन
पद्धतिसे उनकी कुछ समय तक वहाँ सेवा की।
अभिमानी तौलुष्क राज्यकी सेनाका निजबलसे नाश
करनेवाले पृथिवीपति गोप्पणने तब जगदीश श्रीरङ्गनाथको
वृषभगिरितटसे लाकर सत्ययुगके गुणोंसे युक्त अपनी
राजधानी श्रीरङ्गक्षेत्रमें लक्ष्मी और भूदेवीके साथ स्थापित
352 ।
नौवाँ अध्याय 9/79-88 ]
किया। राजा गोप्पणने ब्रह्माके समान साधु आचरण
करते हुए श्रीरङ्गनाथदेवका उनकी शक्तियों सहित
पूजनकी पद्धति स्थापित की॥” 79 ॥
स्नानके पश्चात् रङ्गनाथ-दर्शन और नृत्य-गान :-
कावेरीते स्नान करि' देखि' रङ्गनाथ।
स्तुति-प्रणति करि' मानिला कृतार्थ ॥ 80 ॥
प्रेमावेशे कैल बहुत गान नर्त्तन।
देखि' चमत्कार हैल सब लोकेर मन ॥ 81 ॥
अनुवाद-कावेरीमें स्नान करके महाप्रभुने श्रीरङ्गनाथके
दर्शन किये। उन्हें प्रणामकर उनकी स्तुति करके
महाप्रभुने स्वयंको कृतार्थ माना। महाप्रभुने वहाँ प्रेमावेशमें
बहुत देर तक नृत्य-कीर्तन किया, जिसे देखकर सभी
लोगोंके मन चमत्कृत हो गये ॥ 80-81 ॥
अनुभाष्य-कावेरीका जलपान करनेसे भगवद्भक्ति
(भा: 11/5/40) देखें ॥ 80 ॥
रङ्गक्षेत्रवासी व्येङ्कटभट्टके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :-
श्री-वैष्णव एक, - 'व्येङ्कट भट्ट' नाम।
प्रभुरे निमन्त्रण कैल करिया सम्मान ॥ 82 ॥
अनुवाद-श्रीव्येङ्कट भट्ट नामक एक श्रीवैष्णवने
आदरपूर्वक महाप्रभुको अपने घरमें निमन्त्रित किया ॥ 82 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-व्येङ्कटभट्ट, उनके भाई त्रिमल्लभट्ट
और प्रबोधानन्द सरस्वती, -ये पहले श्रीसम्प्रदायमें
आचार्यरूपमें थे। व्येङ्कटभट्टके पुत्रका नाम ही श्रीगोपालभट्ट
गोस्वामी है॥ 82 ॥
अनुभाष्य- 'श्रीव्येङ्कटभट्ट' - श्रीरङ्गक्षेत्रमें रहनेवाले
श्रीसम्प्रदायके एक ब्राह्मण थे। 'श्रीरङ्ग'-तमिलदेशके
अन्तर्गत है, इसलिये वहाँके निवासियोंके 'व्येङ्कट',
'तिरुमलय' आदि नाम आजकल नहीं होते। ये वंश
सम्भवतः कुछ समय पहलेसे ही श्रीरङ्गममें वास करने
लगे थे। 'व्येङ्कटभट्ट' - 'बड़गलइ' शाखामें रामानुजीय-वैष्णव
थे। इनके एक और भ्राता - त्रिदण्डी रामानुजीयाचार्य
स्वामी श्रीपाद प्रबोधानन्द सरस्वती थे। व्येङ्कटके पुत्र ही
श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी हैं। आदिलीला 10/105 संख्या
और श्रीभक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्ग देखें॥ 82 ॥
व्येङ्कटभट्टके द्वारा महाप्रभुकी सेवा और उनको अपने
घरमें चातुर्मास्य व्रत पालन करनेकी प्रार्थना :-
निज-घरे लञा कैल पादप्रक्षालन।
सेइ जल लञा कैल सवंशे भक्षण॥ 83 ॥
भिक्षा कराञा किछु कैल निवेदन।
“चातुर्मास्य आसिं', प्रभु, हैल उपसन्न ॥ 84 ॥
चातुर्मास्ये कृपा करि' रह मोर घरे।
कृष्णकथा कहिं' कृपाय उद्धार' आमारे॥” 85 ॥
अनुवाद-श्रीव्येङ्कट भट्टने महाप्रभुको अपने घर ले
जाकर उनके श्रीचरणोंको धोया और उसी जलको
(चरणामृतको) अपने वंशसहित पान किया। महाप्रभुको
भोजन करानेके बाद उन्होंने उनसे कुछ निवेदन
किया,-“प्रभो! चातुर्मास्यका समय आ गया है। ये चार
मास आप कृपा करके मेरे घरपर ही रहिये और
कृष्णकथा कहकर कृपया हम सबका उद्धार
कीजिये॥” 83-85 ॥
व्येङ्कटभट्टके घरमें महाप्रभुके द्वारा चातुर्मास्य यापन :-
ताँर घरे रहिला प्रभु कृष्णकथा-रसे।
भट्टसङ्गे गोङाइल सुखे चारि मासे ॥ 86 ॥
अनुवाद-महाप्रभु व्येङ्कट भट्टके अनुरोधपर उनके
घरमें रहे। उन्होंने व्येङ्कट भट्ट और उनके परिवारके
साथ कृष्णकथाके रसमें निमग्न होकर सुखपूर्वक चार
मास बिताये ॥ 86 ॥
प्रतिदिन श्रीरङ्गनाथका दर्शन :-
कावेरीते स्नान करि' श्रीरङ्ग-दर्शन।
प्रतिदिन प्रेमावेशे करेन नर्त्तन ॥ 87 ॥
महाप्रभु-दर्शनसे लोगोंको अशोक-अभय-अमृत-प्राप्ति :-
सौन्दर्यादि प्रेमावेश देखि' सर्वलोक।
देखिबारे आइसे, देखे, खण्डे दुःख-शोक ॥ 88 ॥
। 353
[ 9/87-96 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
महाप्रभुके दर्शनके फलसे असंख्य
लोगोंको श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :-
लक्ष लक्ष लोक आइल नाना-देश हैते।
सबे कृष्णनाम कहे प्रभुके देखिते॥ 89 ॥
कृष्णनाम बिना केह नाहि कहे आर।
सबे कृष्णभक्त हैल,—लोके चमत्कार ॥ 90 ॥
शुद्धभक्तियोगमें जड़विद्या अथवा पाण्डित्यका अभिमान
अथवा कृत्रिम-भावाभास नहीं :-
अष्टादशाध्याय पड़े आनन्द-आवेशे।
अशुद्ध पड़ेन, लोक करे उपहासे॥ 94 ॥
केह हासे, केह निन्दे, ताहा नाहि माने।
आविष्ट हञा गीता पड़े आनन्दित-मने॥ 95 ॥
अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन कावेरीमें स्नान करनेके
बाद श्रीरङ्गनाथका दर्शन करते और वहाँ प्रेमावेशमें
नृत्य करते। वहाँके सब लोग महाप्रभुके सौन्दर्य आदि
और प्रेमावेशको देखने आते और महाप्रभुके दर्शनसे
उन सबके दुःख और शोक दूर हो जाते। अनेक
स्थानोंसे लाखों-लाखों लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये
आये। महाप्रभुको देखने मात्रसे ही वे श्रीकृष्णनामका
उच्चारण करने लगे। श्रीकृष्णनामके अतिरिक्त कोई
कुछ भी नहीं कहता था और इस प्रकार सभी
कृष्णभक्त बन गये,—जिसे देखकर लोगोंके हृदयमें
चमत्कार हुआ॥ 87-90॥
अनुवाद—उसी स्थानमें एक वैष्णव-ब्राह्मण रहता
था। वह प्रतिदिन मन्दिरमें आकर गीताका पाठ करता
था। बड़े आनन्दके आवेशमें वह ब्राह्मण गीताके पूरे
अठारह अध्यायोंका पाठ करता था, परन्तु वह पाठ
शुद्ध नहीं होता था, जिसके कारण लोग उसका उपहास
करते थे। कोई उनपर हँसता था, तो कोई उनकी
निन्दा करता था, तो भी वह ब्राह्मण गीताका पाठ
करना बन्द नहीं करता था। बल्कि प्रेमाविष्ट होकर
आनन्दित मनसे गीताको पढ़ता जाता था॥ 93-95॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'वैष्णव-ब्राह्मण'-गोविन्दके
कड़चामें (?) इस ब्राह्मणका नाम 'युधिष्ठिर' कहा गया
है॥ 93॥
एक-एक वैष्णव ब्राह्मणके घर एक-एक दिन भिक्षा :-
श्रीरङ्गक्षेत्रे वैसे यत वैष्णव-ब्राह्मण।
एक एक दिन सबे कैल निमन्त्रण ॥ 91 ॥
एक एक दिने चातुर्मास्य पूर्ण हैल।
कतक ब्राह्मण भिक्षा दिते ना पाइल ॥ 92 ॥
अनर्थसे निवृत्त एवं चेतनताको प्राप्त करनेवाले
व्यक्तिके सात्त्विक-भाव :-
पुलकाश्रु, कम्प, स्वेद,—यावत् पठन।
देखि' आनन्दित हैल महाप्रभुर मन ॥ 96 ॥
अनुवाद—श्रीरङ्गक्षेत्रमें जितने ब्राह्मण-वैष्णव रहते
थे, वे एक-एक दिन करके महाप्रभुको निमन्त्रण करने
लगे। एक-एक दिन निमन्त्रण करते-करते चातुर्मास्यका
समय पूरा हो गया, परन्तु कुछ ब्राह्मण महाप्रभुको
भोजन न करा पाये॥ 91-92॥
अनुवाद—गीताका पाठ करते समय उस ब्राह्मणकी
देहमें पुलक, अश्रु, कम्प और स्वेद आदि अष्ट-सात्त्विक
भाव उदित हो रहे थे, जिसे देखकर महाप्रभुके मनमें
बहुत आनन्द हुआ॥ 96 ॥
अनुभाष्य-(भाः 1/5/11)—
“तद्वाग्विसर्गो जनताघविप्लवो
यस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि।
नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि यत्
शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः॥”
अर्थात् “इसके विपरीत जिन वाणियों अथवा
एक शरणागत सेवोन्मुख ब्राह्मणका गीतापाठ :-
सेइ क्षेत्रे रहे एक वैष्णव-ब्राह्मण।
देवालये आसि' करे गीता आवर्त्तन ॥ 93 ॥
354 ।
नौवाँ अध्याय 9/94-98 ]
ग्रन्थोंमें भगवान् अनन्तदेवके महिमासूचक नामोंका
वर्णन है, उसका प्रत्येक श्लोक अथवा आख्यान दूषित
अपशब्दादिसे युक्त रहनेपर भी, तथा सुर, मान, लय,
ताल आदि साहित्यगत अलङ्कार-गुणोंसे रहित होनेपर
भी लोगोंके पापोंका विनाश करता है। ऐसी वाणीका
वक्ता मिलनेपर ही साधुजन उसका श्रवण करते हैं,
श्रोता मिलनेपर कीर्तन करते हैं और यदि कोई न हो
तो स्वयं ही गान करते हैं।”
भा: 4/31/21, 11/12/5-9 श्लोक और भा:
2/3/24 “तदश्मसारं” श्लोककी श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती
ठाकुरकी ‘सारार्थदर्शिनी' टीका विशेष रूपसे देखें॥ 94-96 ॥
अमृताणुकणिका-(भा: 2/3/24) “तदश्मसारं” श्लोककी
‘सारार्थदर्शिनी' टीका-
“जिनमें अनन्तस्वरूप श्रीकृष्णके यशोङ्कित सभी
नाम सजे हुए हों, उन श्लोकोंकी सुन्दररूपसे रचना
नहीं होनेपर भी, वह वाक्यविन्यास ही जीवोंकी समस्त
पापराशिको ध्वंस करता है। साधुजन उसीका श्रवण
और कीर्तन करते हैं (भा: 1/5/11)। 'तदश्मसारं' (भा:
2/3/24) श्लोककी सारार्थदर्शिनी टीका-बहुत नाम
ग्रहण करनेपर भी चित्त द्रवीभूत न होनेपर वह
नामापराधका लक्षण है, ऐसा समझना चाहिये। किन्तु
अश्रु, पुलक ही चित्तके द्रवित होनेके लक्षण हैं, ऐसा
भी नहीं कहा सकता। क्योंकि श्रीरूपगोस्वामीने कहा
है,-“निसर्गापिच्छलस्वान्ते तदभ्यासपरेऽपि च। सत्त्वाभासं
बिनापि स्युः क्वाप्यश्रुपुलकादयः॥ (भ:र:सि:
2/3/89) - अर्थात् जिनका हृदय स्वभावतः पिच्छिल
(फिसलनेवाला) है और जिन्होंने अश्रु बहाने आदिका
अभ्यास किया है, उनके हृदयमें सत्त्वाभासके बिना ही
कहीं-कहीं अश्रु-पुलकादि देखे जाते हैं। और फिर,
अति गम्भीर महानुभाव-भक्तोंका चित्त हरिनामके द्वारा
द्रवित होनेपर भी उनके अनेक समय अश्रु-पुलकादि
दिखायी नहीं देते। इसलिये उक्त श्लोककी इस प्रकारसे
व्याख्या करनी होगी, - हरिनाम ग्रहण करनेपर बाहरसे
अश्रु-पुलकादि विकार दिखायी देनेपर भी जो हृदय
विगलित नहीं होता, वह पाषाणके समान है, यही अर्थ
है। हृदय-विकारके ये असाधारण लक्षण हैं-“(1)
क्षान्तिः, (2) अव्यर्थकालत्वं, (3) विरक्तिः, (4) मानशून्यता,
(5) आशाबन्ध, (6) समुत्कण्ठा, (7) नामगाने सदा
रुचिः, (8) आसक्तिः तद्गुणाख्याने, (9) प्रीतिः तद्वसतित्थले।
इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभावाङ्कुरे जने॥” (भ:र:सि:
1/3/25)। निर्मत्सर उत्तमाधिकारियोंको नामग्रहण-मात्रसे
ही नाम-माधुर्य अनुभव होता है, तब उनके हृदयमें
विकार होता है। हृदय विकार होनेपर 'क्षान्ति' आदि
नौ प्रकार असाधारण लक्षण और अश्रु-पुलकादि
साधारण लक्षण प्रकाशित होते हैं। किन्तु मात्सर्यपरायण
कनिष्ठाधिकारियोंका चित्त अपराधमय होनेके कारण
बहुत नामग्रहणपर भी नामके माधुर्यका अनुभव नहीं
होनेसे चित्तमें विकार उत्पन्न नहीं होता। फलस्वरूप
उनमें 'क्षान्ति'-आदि (असाधारण) लक्षण सब कभी भी
प्रकाशित नहीं होते। अश्रु-पुलकादि साधारण-लक्षण
दिखायी देनेपर भी उनका हृदय पाषाणतुल्य कहकर
निन्दनीय है। साधुसङ्गसे अनर्थनिवृत्ति, निष्ठा, रुचि
आदि भूमिकामें आरूढ़ होनेपर यथाकाल उनका चित्त
भी द्रवित होगा और चित्तकी कठोरता दूर होगी। किन्तु
जिनका चित्त द्रवित होनेपर भी चित्तकी कठिनता बनी
रहती है, उनका रोग अति गम्भीर है, ऐसा जानना
होगा॥” 94-96 ॥
उसके भावोंको देखकर महाप्रभुकी कारण-जिज्ञासा :-
महाप्रभु पुछिल ताँरे, - “शुन, महाशय।
कोन् अर्थ जानि' तोमार एत सुख हय ॥” 97 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उस ब्राह्मणसे पूछा, - “सुनो
महाशय ! गीताके किस अर्थको जानकर आपको इतना
आनन्द प्राप्त होता है ॥” 97 ॥
वास्तवसत्यमें विश्वासी ब्राह्मणका सरलरूपसे उत्तर :-
विप्र कहे, - “मूर्ख आमि, शब्दार्थ ना जानि।
शुद्धाशुद्ध गीता पड़ि, गुरु-आज्ञा मानि ॥ 98 ॥
। 355
[ 9/98–106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अर्जुनरे रथे कृष्ण हय रज्जुधर।
बसियाछेन ताते—येन श्यामल-सुन्दर ॥ 99 ॥
अर्जुनरे कहिलेन हित-उपदेश।
ताँरे देखि' हय मोर आनन्द-आवेश ॥ 100 ॥
यावत् पड़ों, तावत् पाङ ताँर दरशन।
एइ लागि' गीता-पाठ ना छाड़े मोर मन॥”101॥
अनुवाद—ब्राह्मणने उत्तर दिया,—“मैं तो मूर्ख हूँ,
शब्दोंके अर्थ तक भी नहीं जानता हूँ। मैं तो गुरुदेवकी
आज्ञा मानकर भले शुद्ध हो या अशुद्ध, गीताका पाठ
करता हूँ। अर्जुनके रथपर श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण, घोड़ेकी
लगामको पकड़कर सारथीके रूपमें बैठे हैं और
अर्जुनको हितोपदेश दे रहे हैं—उन्हें देखने मात्रसे ही
मैं आनन्दसे आविष्ट हो जाता हूँ। जब तक मैं
गीताको पढ़ता रहता हूँ, तब तक मुझे उनका दर्शन
होता रहता है, इसलिये मेरा मन गीताके पाठको छोड़ना
नहीं चाहता॥”98–100॥
महाप्रभुके द्वारा शुद्धचित्त ऐकान्तिक भक्तकी प्रशंसा :—
प्रभु कहे,—“गीता-पाठे तोमारइ अधिकार।
तुमि से जानह एइ गीतार अर्थ-सार॥”102॥
अनुवाद—महाप्रभुने उस ब्राह्मणसे कहा,—“गीता-पाठमें
वास्तवमें तुम्हारा ही अधिकार है। तुम जो जानते हो,
वही गीताका सारार्थ है॥”102॥
अनुभाष्य—भाः 7/5/23 और “भक्त्या भागवतं
ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकया”; “गीताधीता च येनापि
भक्तिभावेन चेतसा। वेदशास्त्रपुराणानि तेनाधीतानि सर्वशः॥”
आदि एवं (श्वेःउः 6/23)—“यस्य देवे परा भक्तिर्यथा
देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥”
आदि देखें।
अर्थात् ‘श्रीमद्भागवत केवल भक्तिके द्वारा ही ग्रहण
की जा सकती है—बुद्धि या टीकाके द्वारा नहीं।’ ‘जो
भक्तिभावयुक्त चित्तसे श्रीमद्भगवद्गीता अध्ययन करते हैं,
वे वेद-पुराणादि सर्वशास्त्र अध्ययन करते हैं।’ ‘जिनकी
श्रीभगवान्में पराभक्ति है, और जैसी श्रीभगवान्में है,
श्रीगुरुदेवमें भी वैसी पराभक्ति है, उन महात्माके हृदयमें
कहे गये सभी विषय अर्थात् श्रुतियोंके मर्मार्थ प्रकाशित
होते हैं॥’102॥
महाप्रभुके द्वारा ब्राह्मणको आलिङ्गन और ब्राह्मणको
महाप्रभुमें श्रीकृष्णका ज्ञान :—
एत बलि' सेइ विप्रे कैल आलिङ्गन।
प्रभु-पद धरि' विप्र करेन रोदन॥ 103॥
“तोमा देखि' ताहा हैते द्विगुण सुख हय।
सेइ कृष्ण तुमि,—हेन मोर मने लय॥”104॥
अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभुने उस ब्राह्मणका
आलिङ्गन किया और वह ब्राह्मण महाप्रभुके चरणकमलोंको
पकड़कर रोते हुए कहने लगा, —“गीता पाठके समय
श्रीकृष्णका दर्शन करके मुझे जिस आनन्दकी प्राप्ति
होती थी, उससे भी दो गुणा अधिक आनन्दकी प्राप्ति
आपके दर्शनसे हो रही है, मेरा मन कहता है कि आप
वही श्रीकृष्ण हैं॥”103–104॥
कर्मज्ञान-अन्याभिलाषशून्य छलरहित शुद्ध मन ही वृन्दावन,
उसी मनमें ही सम्विद्विग्रह श्रीकृष्णका अधिष्ठान :—
कृष्णस्फूर्त्ये ताँर मन हञाछे निर्मल।
अतएव प्रभुर तत्त्व जानिल सकल॥ 105 ॥
अनुवाद—गीताका पाठ करते हुए उस ब्राह्मणके
हृदयमें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति हुई थी, जिससे उसका हृदय
निर्मल हो गया था, इसलिये वह महाप्रभुके तत्त्वके
विषयमें सब कुछ जान सका॥ 105॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 6/83–84 संख्या देखें॥ 105 ॥
महाप्रभुकी अपने प्रचारकी निषेधाज्ञाके
द्वारा असुर लोगोंकी वञ्चना :—
तबे महाप्रभु ताँरे कराइल शिक्षण।
“एइ बात काँहा ना करिह प्रकाशन॥”106॥
356 ।
नौवाँ अध्याय
9/106-114 ]
अनुवाद—तब महाप्रभुने उस ब्राह्मणको शिक्षा दी
और कहा, — “मुझे तुमने कृष्ण समझा है, इस बातको
किसीके सामने प्रकाशित मत करना ॥” 106 ॥
महाप्रभु-भक्त ब्राह्मण :—
सेइ विप्र महाप्रभुर बड़ भक्त हैल।
चारि मास प्रभु-सङ्ग कभु ना छाड़िल॥ 107 ॥
अनुवाद—वह ब्राह्मण महाप्रभुका बड़ा भक्त बन
गया। चार महीने जब तक महाप्रभु श्रीरङ्गम्में थे, तब
तक उस ब्राह्मणने कभी भी उनका साथ नहीं
छोड़ा॥ 107 ॥
व्येङ्कटभट्टके घरमें महाप्रभु गौरचन्द्र :—
एइमत भट्टगृहे रहे गौरचन्द्र।
निरन्तर भट्ट-सङ्गे कृष्णकथानन्द॥ 108 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरचन्द्र व्येङ्कट भट्टके
घरमें रहे और निरन्तर कृष्णकथा करते हुए दोनोंने
उसका आनन्द लिया॥ 108 ॥
लक्ष्मीनारायण-सेवक श्रीसम्प्रदायी भट्ट :—
'श्री-वैष्णव' भट्ट सेवे लक्ष्मी-नारायण।
ताँर भक्ति देखि' प्रभुर तुष्ट हैल मन॥ 109 ॥
अनुवाद—व्येङ्कट भट्ट 'श्रीवैष्णव' सम्प्रदायके थे,
इसलिये वे श्रीलक्ष्मी-नारायणकी सेवा करते थे। उनकी
भक्तिको देखकर महाप्रभु बहुत सन्तुष्ट हुए॥ 109 ॥
महाप्रभुके साथ उनका सख्यभाव :—
निरन्तर ताँर सङ्गे हैल सख्यभाव।
हास्य-परिहास दुँहे सख्येरे स्वभाव॥ 110 ॥
अनुवाद—निरन्तर साथ रहनेके कारण महाप्रभु
और व्येङ्कट भट्टका साथ सख्यभाव हो गया, इसलिये
दोनों कभी सखाकी भाँति हास-परिहास भी करते
थे॥ 110 ॥
महाप्रभुकी उनको श्रीकृष्णसेवा-दानकी इच्छा, महाप्रभु और
भट्टका संवाद; महाप्रभुका कौतुकपूर्ण प्रश्न—लक्ष्मी और
गोपियोंकी श्रीकृष्णसेवाका वैशिष्ट्य :—
प्रभु कहे, — “भट्ट, तोमार लक्ष्मी-ठाकुराणी।
कान्त-वक्षःस्थिता, पतिव्रता-शिरोमणि॥ 111 ॥
नारायणाश्रित होते हुए भी लक्ष्मीका श्रीकृष्णके माधुर्यसे
आकर्षित होकर श्रीकृष्णसङ्ग प्राप्त करनेकी प्रार्थना :—
आमार ठाकुर कृष्ण—गोप, गो-चारण।
साध्वी हञा केने चाहे ताँहार सङ्गम॥ 112 ॥
इस उद्देश्यसे लक्ष्मीकी कठोर तपस्या :—
एइ लागि' सुखभोग छाड़ि' चिरकाल।
व्रत-नियम करि' तप करिल अपार ॥” 113 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, “भट्ट! आपकी ठाकुराणी
श्रीलक्ष्मी देवी पतिव्रता शिरोमणि हैं और सदा अपने
कान्तके वक्षःस्थलपर विराजमान रहती हैं। मेरे ठाकुर
श्रीकृष्ण एक गोप हैं और गैया चराते हैं, परन्तु तुम्हारी
ठाकुराणी साध्वी होकर भी उनका सङ्ग क्यों चाहती
हैं? इसके लिये उन्होंने बहुत लम्बे समय तक
वैकुण्ठके समस्त सुख-भोगोंको छोड़कर व्रत लेकर
नियमोंका पालन करते हुए बहुत कठोर तपस्या भी की
है॥” 111-113 ॥
श्रीमद्भागवत (10/16/36)—
कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महे,
तवाङ्घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः।
यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपो,
विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता॥ 114 ॥
अनुवाद—हे देव! जिनकी चरणरजको प्राप्त करनेकी
वासनासे कमलाने (लक्ष्मीने) बहुत समय तक समस्त
प्रकारके विषय-भोगोंका परित्याग करके दृढ़व्रत धारण
करके तपस्या की थी, उस चरणरजको इस कालिय-नागने
किस सुकृतिके द्वारा लाभ करनेका अधिकार प्राप्त
किया, उसे हम नहीं जानती॥ 114 ॥
। 357
[ 9/111–121 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
अनुभाष्य—मध्यलीला 8/146 संख्या देखें॥ 114॥
भट्टका उत्तर, श्रीकृष्णके सङ्गसे नारायण-पत्नीके
सतीत्वकी हानिकी असम्भावना :—
भट्ट कहे, —“कृष्ण-नारायण—एकइ स्वरूप।
कृष्णेते अधिक लीला-वैदग्ध्यादिरूप ॥ 115 ॥
ताँर स्पर्शे नाहि याय पतिव्रता-धर्म।
कौतुके लक्ष्मी चाहेन कृष्णेर सङ्गम ॥ 116 ॥
अनुवाद—व्येङ्कट भट्टने कहा, —“श्रीकृष्ण और
श्रीनारायण—दोनों एक ही स्वरूप हैं, परन्तु श्रीकृष्णमें
लीला-वैदग्ध्यादि अधिक है। कौतुकवशतः श्रीलक्ष्मीने
श्रीकृष्णके सङ्गकी इच्छा की, क्योंकि श्रीकृष्णके स्पर्शसे
उनका पतिव्रता-धर्म नष्ट नहीं होता ॥ 115–116 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीनारायण ही श्रीकृष्णकी
विलास-मूर्ति हैं, इसलिये श्रीकृष्णसे उनका स्वरूप
द्विभुज-चतुर्भुजका भेद होनेपर भी पृथक् नहीं है।
नारायणमें श्रीकृष्णके समान लालित्य होनेपर भी उनमें
श्रीकृष्ण जैसी वैदग्ध्य आदि रूप लीला नहीं है।
श्रीकृष्ण ही जब विलासमूर्तिमें श्रीनारायण हैं, तब
नारायण-पत्नी-लक्ष्मीका श्रीकृष्ण-स्पर्शसे पतिव्रता-धर्म
नहीं नष्ट होता है। इसलिये श्रीकृष्णसङ्गममें लक्ष्मीका
कौतुक होना स्वाभाविक ही है ॥ 115–116 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 5/223 संख्या और मध्यलीला
8/144 संख्या देखें ॥ 111–116 ॥
श्रीकृष्ण और नारायणकी लीलाका वैचित्र्य :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/59)—
सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि श्रीश-कृष्णस्वरूपयोः।
रसेनोत्कृष्यते कृष्णरूपमेषा रसस्थितिः ॥ 117 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 117 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘श्रीनारायण’ और ‘श्रीकृष्ण’के
दो स्वरूपोंमें सिद्धान्तके अनुसार कोई भेद नहीं है,
तथापि शृङ्गार-रसविचारसे श्रीकृष्णरूपने ही रसके द्वारा
[दायाँ स्तम्भ]
उत्कर्षता प्राप्त की है। इसी प्रकार ही रसत्तत्त्वकी
स्थापना होती है ॥ 117 ॥
अनुभाष्य—
सिद्धान्ततः (वस्तुतत्त्वतः) श्रीश्रीकृष्णस्वरूपयोः
(नारायण-कृष्णतत्त्वयोः) अभेदे सति अपि रसेन कृष्णरूपम्
(एव) उत्कृष्यते, —एषा रसस्थितिः (रस-स्वभावः)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें।
आदिलीला दूसरा और तीसरा अध्याय एवं
लघुभागवतामृत देखें ॥ 117 ॥
कृष्णसङ्गे पतिव्रता-धर्म नहे नाश।
अधिक लाभ पाइये, आर रासविलास ॥ 118 ॥
विनोदिनी लक्ष्मीर हय कृष्णे अभिलाष।
इहाते कि दोष, केने कर परिहास ॥” 119 ॥
अनुवाद—लक्ष्मीजीने विचार किया कि श्रीकृष्णके
सङ्गसे उनका पतिव्रता-धर्म नष्ट नहीं होगा, अपितु
श्रीकृष्णका सङ्ग होनेसे रासलीलारूपी अधिक लाभ ही
मिलेगा। लक्ष्मीजी विनोदिनी हैं, इसलिये उन्होंने यदि
श्रीकृष्णके सङ्गकी अभिलाषा की, तो इसमें क्या दोष
है? आप क्यों उनका परिहास कर रहे हैं?” ॥ 118–119 ॥
महाप्रभुका पुनः प्रश्न :—
प्रभु कहे, —“दोष नाहि, इहा आमि जानि।
रास ना पाइल लक्ष्मी, शास्त्रे इहा शुनि ॥ 120 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“इसमें कोई दोष नहीं
है, यह मैं भी जानता हूँ। परन्तु मैंने शास्त्रोंमें सुना है
कि लक्ष्मीजीका रासमें प्रवेश नहीं हुआ ॥ 120 ॥
व्रजगोपियोंकी महिमा :—
श्रीमद्भागवत (10/47/60)—
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः।
स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः।
रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ-
लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम् ॥ 121 ॥
358 ।
नौवाँ अध्याय 9/121-128 ]
अनुवाद-श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी
भुजाओंके द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरियोंके
प्रति जो कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर
स्थित लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको
भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे
कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी
कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो
क्या कहूँ?॥ 121॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 8/80 संख्या देखें॥ 121 ॥
गोपियोंके आनुगत्यके बिना लक्ष्मीका
श्रीकृष्णके साथ रासविलास असम्भव :-
लक्ष्मी केने ना पाइल, इहार कि कारण।
तप करि' कैछे कृष्ण पाइल श्रुतिगण ॥ 122 ॥
अनुवाद-तपस्या करके श्रुतियोंने कैसे श्रीकृष्णको
रासलीलामें प्राप्त किया? और लक्ष्मीजीको रासमें प्रवेश
क्यों नहीं मिला? इसका क्या कारण है? ॥ 122॥
गोपियोंके आनुगत्यसे ही श्रुतियोंको
रागमार्गमें श्रीकृष्णसेवाकी प्राप्ति :-
श्रीमद्भागवत (10/87/23)-
निभृतमरुन्मनोऽक्षदृढ़योगयुजो हृदि य-
न्मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः स्मरणात्।
स्त्रिय उरगेन्द्र-भोगभुजदण्डविषक्त-धियो
वयमपि ते समाः समदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाः ॥ 123 ॥
अनुवाद-मुनियोंने प्राणायामके द्वारा निश्वासको
जीतकर मन और इन्द्रियोंको दृढ़रूपसे योगयुक्त करके
हृदयमें जिस ब्रह्मकी उपासना की थी, भगवान्के सभी
शत्रुओंने भी उनके निरन्तर ध्यानके बलसे उस ब्रह्ममें
प्रवेश किया था। व्रजस्त्रियोंने श्रीकृष्णके सर्पके शरीरतुल्य
भुजाओंके सौन्दर्यरूप तीव्र विषके द्वारा हतबृद्धि होकर
उनके चरणकमलोंकी सुधाको प्राप्त किया था। हमने
भी वैसी गोपीदेह प्राप्त करके गोपीभावसे उनके
चरणकमलोंकी सुधाका पान किया है॥123॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 8/223 संख्या देखें ॥ 123 ॥
महाप्रभुके प्रश्नका उत्तर देनेमें भट्टकी असमर्थता :-
श्रुति पाय, लक्ष्मी ना पाय, इथे कि कारण।”
भट्ट कहे,-"इहा प्रवेशिते नारे मोर मन॥ 124 ॥
आमि जीव, -क्षुद्रबुद्धि, सहजे अस्थिर।
ईश्वरेर लीला-कोटिसमुद्र-गम्भीर ॥ 125 ॥
प्रभुकी कृपासे ही प्रभुकी लीलाका ज्ञान :-
तुमि साक्षात् सेइ कृष्ण, जान निजकर्म।
यारे जानाह, सेइ जाने तोमार लीलामर्म॥" 126 ॥
अनुवाद-(महाप्रभुका प्रश्न-) श्रुतियोंको रासकी
प्राप्ति हुई, परन्तु लक्ष्मीजीको नहीं हुई, इसका क्या
कारण है?” व्येङ्कट भट्टने कहा, - "इस रहस्यमें प्रवेश
करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। मैं एक जीव हूँ जिसकी
बुद्धि अल्प और स्वभावतः चञ्चल है। श्रीकृष्णकी
लीला करोड़ों समुद्रकी भाँति गम्भीर (गहरी) है, मेरी
बुद्धिका उसमें प्रवेश नहीं है। आप साक्षात् वही
श्रीकृष्ण हैं, आप ही अपनी लीलाओंके उद्देश्यको
जानते हैं। आप जिसे उसे जनाते हैं, वही आपकी
लीलाओंके मर्मको जान पाता है॥” 124-126॥
अनुभाष्य-(कठ, 2/23, मुःउः 3/2/3)-
“यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं
स्वाम्।”
अर्थात् “जब जीवात्मा भगवान्के प्रति सेवोन्मुख
होकर परमात्माकी कृपायाचना करता है, तब उसीके
निकट वे परमात्मा अपना स्वयंप्रकाश श्रीविग्रह प्रकट
करते हैं ॥ 126 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्ण और व्रजवासियोंके
सहज रागात्मक स्वभावका वर्णन :-
प्रभु कहे,-"कृष्णेर एक सजीव लक्षण।
स्वमाधुर्ये सर्व चित्त करे आकर्षण ॥ 127 ॥
व्रजलोकेर भावे पाइये ताँहार चरण।
ताँरे ईश्वर करि' नाहि जाने व्रजजन ॥ 128 ॥
। 359
यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:
[ 9/127–135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
केह ताँरे पुत्र-ज्ञाने उदुखले बान्धे।
केह सखा-ज्ञाने जिनि' चड़े ताँर कान्धे ॥ 129 ॥
'व्रजेन्द्रनन्दन' बलि' ताँरे जाने व्रजजन।
ऐश्वर्यज्ञाने नाहि कोन सम्बन्ध-मानन ॥ 130 ॥
व्रजलोकेर भावे येइ करये भजन।
सेइ व्रजे पाये शुद्ध व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 131 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/137-158 संख्या एवं
मध्यलीला 8/138, 142, 147, 148 संख्या देखें।
पयार संख्या 130 की पहली पंक्तिके लिये—आदिलीला
4/33 संख्या, मध्यलीला 8/203–204, 220–222, 226,
228–230 संख्या देखें। पयार संख्या 130 की दूसरी
पंक्तिके लिये—आदिलीला 4/21–26 संख्या देखें ॥ 127–130 ॥
श्रीमद्भागवत (10/9/21)—
नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः।
ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ 132 ॥
अनुवाद—यशोदाके पुत्र भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमान्
देहधारियोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, आत्मभूत
ज्ञानियोंके लिये वैसे नहीं हैं ॥ 132 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 8/226 संख्या देखें ॥ 132 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “श्रीकृष्णका एक सजीव
लक्षण यह है कि वे अपने माधुर्यके द्वारा सबके
चित्तको आकर्षित करते हैं। केवल व्रजवासियोंके
भावोंका आनुगत्य करके ही श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी
प्राप्ति की जा सकती है। व्रजवासी श्रीकृष्णको भगवान्
नहीं मानते। कोई उन्हें अपना पुत्र मानकर ऊखलसे
बाँध देती हैं, तो कोई उन्हें सखा मानकर खेलमें उनसे
जीतकर उनके कन्धेपर चढ़ जाता है। व्रजवासी
श्रीकृष्णको व्रजेन्द्रनन्दनके रूपमें ही जानते हैं। ऐश्वर्यज्ञानसे
श्रीकृष्णके साथ वे कोई सम्बन्ध नहीं मानते हैं।
व्रजवासियोंके भावोंके अनुगत होकर जो श्रीकृष्णका
भजन करते हैं, वे ही व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णको
प्राप्त करते हैं॥ 127–131 ॥
गोपियोंके आनुगत्यसे श्रुतियोंको रासमें कृष्णसेवा-प्राप्ति :—
श्रुतिगण गोपीगणेर अनुगत हञा।
व्रजेश्वरीसुत भजे गोपीभाव लञा ॥ 133 ॥
बाह्यान्तरे गोपीदेह व्रजे यबे पाइल।
सेइ देहे कृष्णसङ्गे रासक्रीड़ा कैल ॥ 134 ॥
अनुवाद—श्रुतियोंने गोपियोंके अनुगत होकर गोपीभावसे
यशोदानन्दनका भजन किया था। जब श्रुतियोंको व्रजमें
गोपीदेहकी प्राप्ति हुई, तब उस देहसे उन्होंने श्रीकृष्णके
साथ रासक्रीड़ा की थी ॥ 133-134 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'सजीव-लक्षण'—क्रियालक्षण;
पाठान्तरमें 'स्वभाव-लक्षण', इसका अर्थ स्पष्ट है।
तीसरा पाठान्तर 'स्वभाव-विलक्षण',—श्रीकृष्णका स्वभाव
दूसरोंके स्वभावसे भिन्न प्रकारका है, अथवा
'विलक्षण'-शब्दका अर्थ विशेष लक्षण है।
'उदूखल'—ओखली अर्थात् जिसमें धानादि कूटा
जाता है।
व्रजवासी श्रीकृष्णको 'नन्दनन्दन'के रूपमें जानते
हैं। परम ऐश्वर्यशाली 'परमेश्वर'से जो एक अन्य
प्रकारका सम्बन्ध है, वे उसे नहीं मानते। व्रजवासियोंके
दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन चार प्रकारके
भावोंमेंसे कोई भाव ग्रहण करके जो परमतत्त्वका भजन
करता है; वह चरम अवस्थामें व्रजेन्द्रनन्दन-श्रीकृष्णको
शुद्ध रूपमें व्रजधाममें प्राप्त होता है ॥ 127–131 ॥
गोपीके अतिरिक्त अन्य चिन्मयी स्त्रीके लिये भी
मधुर-सेवा-प्राप्ति असम्भव :—
गोपजाति कृष्ण, गोपी-प्रेयसी ताँहार।
देवी वा अन्य स्त्री कृष्ण ना करे अङ्गीकार ॥ 135 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण गोपजातिके हैं और गोपियाँ
उनकी प्रेयसियाँ हैं। श्रीकृष्ण गोपियोंके अतिरिक्त अन्य
किसी और देवी या स्त्रीको अङ्गीकार नहीं करते ॥ 135 ॥
360 ।