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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 981, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 981

लोगों सहित चन्दन देकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी विदायी :-
एक विप्र, एक सेवक, चन्दन वहिते।
पुरी-गोसाञिर सङ्गे दिल सम्बल-सहिते ॥ 152 ॥

**अनुवाद—**श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीजगन्नाथदेवके सभी सेवकों
और महन्तोंको श्रीगोपालका (प्रकट होने और चन्दन
मँगवानेका) सब वृत्तान्त कह सुनाया। 'श्रीगोपालने
चन्दन मँगवाया है'—यह सुनकर श्रीजगन्नाथदेवके सभी
भक्त आनन्दपूर्वक चन्दन संग्रह करनेका प्रयास करने
लगे। राज-कर्मचारियोंके साथ जिन-जिनका परिचय था,
उन्होंने उनसे माँगकर कर्पूर-चन्दन इकट्ठा किया।
उन्होंने एकत्रित चन्दन-कर्पूर श्रीमाधवेन्द्रपुरीको दिया
और उसे उठाकर ले जानेके लिये साथमें एक ब्राह्मण
और एक सेवकको दिया। मार्गमें सबके व्ययके लिये
उन्होंने कुछ धन भी भेंट दिया ॥ 149-152 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'कर्पूर'—श्रीकर्पूर, जिससे
श्रीजगन्नाथदेवकी आरती होती है। श्रीजगन्नाथके सेवकोंने
राजकर्मचारियोंसे उस श्रीकर्पूर और मलयज चन्दनको
संग्रह करके पुरी गोसाईंके साथ एक ब्राह्मण और एक
सेवकको भेजा और सबके लिये रास्तेका खर्चा भी
दिया ॥ 152 ॥

अनुभाष्य—'सम्बल'—मार्गमें होने वाला खर्चा ॥ 152 ॥

**अमृतानुकणिका—**उस समय श्रीकर्पूर श्रीजगन्नाथकी
आरती और चन्दन उनके श्रीअङ्गोंमें लेपन करनेके
लिये प्रयोग किये जाते थे। ये दोनों वस्तुएँ राजाके
अधिकारमें होती थीं और सर्व-साधारणको उपलब्ध
नहीं थीं। इसलिये सब भक्त और श्रीजगन्नाथके सेवक
राजकर्मचारियोंसे मिले और उन्हें सब बात बतलायी
कि ये दोनों वस्तुएँ श्रीगोपालकी सेवाके लिये चाहिये।
इस प्रकार उन्होंने श्रीकर्पूर और चन्दनको नीलाचलसे
बाहर ले जानेकी अनुमति प्राप्त की ॥ 150-152 ॥

विघ्नरहित जानेके लिये अनुमति-पत्र देना :-
घाटी-दानी छाड़ाइते राजपात्र-द्वारे।
राजलेखा करि' दिल पुरी-गोसाञिर करे ॥ 153 ॥

**अनुवाद—**मार्गमें घाटी-दानी उनसे कर न माँगे,
इस उद्देश्यसे राजकर्मचारियोंने राजाका अनुमति-पत्र भी
श्रीमाधवेन्द्रपुरीके हाथमें दिया ॥ 153 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'घाटी'—जो पथका शुल्क (कर)
लेता है। 'दानी'—जो पार करानेका पैसा लेता है। उन
सभीको छुड़ानेके लिये अर्थात् उनको पैसा दिये बिना
ही जानेके लिये राजकर्मचारियोंके द्वारा लिखे गये
राजपत्रको अर्थात् फरमानको पुरी गोसाईंके हाथमें दे
दिया ॥ 153 ॥

रेमुणामें पहुँचना और गोपीनाथके दर्शनसे नृत्य-गीत :-
चलिल माधवपुरी चन्दन लञा।
कतदिने रेमुणाते उत्तरिल गिया ॥ 154 ॥
गोपीनाथ-चरणे कैल बहु नमस्कार।
प्रेमावेशे नृत्य-गीत करिला अपार ॥ 155 ॥
पुरी देखि' सेवक सब सम्मान करिल।
क्षीरप्रसाद दिया ताँरे भिक्षा कराइल ॥ 156 ॥

**अनुवाद—**चन्दन लेकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीने नीलाचलसे
गोवर्धनकी ओर प्रस्थान किया। कुछ दिन बाद वे रेमुणा
पहुँचे। वहाँ श्रीगोपीनाथके श्रीचरणोंमें उन्होंने अनेक बार
प्रणाम किया और प्रेममें आविष्ट होकर उन्होंने बहुत
देर तक नृत्य-गान किया। उन्हें देखकर श्रीगोपीनाथके
सभी सेवकोंने उनका बहुत सम्मान किया तथा
श्रीगोपीनाथजीका खीर प्रसाद देकर उन्हें भोजन
कराया ॥ 154-156 ॥

स्वप्नमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीको श्रीगोपालके द्वारा श्रीगोपीनाथके
श्रीअङ्गमें चन्दन लेपन करनेका आदेश :-
सेइ रात्रे देवालये करिल शयन।
शेषरात्रि हैले पुरी देखिल स्वपन ॥ 157 ॥
गोपाल आसिया कहे,—"शुनह, माधव।
कर्पूर-चन्दन आमि पाइलाम सब ॥ 158 ॥