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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 963, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 963

चौथा अध्याय
[बायाँ स्तम्भ]
कथासार-श्रीमन्महाप्रभु छत्रभोग-पथसे वृद्धमन्त्रेश्वरसे
होकर उत्कल राज्यकी एक सीमापर पहुँचे। मार्गमें
अनेक प्रकारसे आनन्दमय कीर्तन और भिक्षा आदि
करते-करते रेमुणाग्राममें श्रीगोपीनाथके दर्शन किये। वहाँ
परमानन्दित होकर उन्होंने अपने भक्तोंको श्रीईश्वरपुरीके
द्वारा कही गयी श्रीमाधवेन्द्र पुरीसे सम्बन्धित कथाका
वर्णन किया। पूर्वकालमें श्रीमाधवेन्द्रपुरी जब वृन्दावन
गये थे, तब उन्होंने गोवर्धनमें रातके समय 'वनमें
गोपाल हैं'—यह स्वप्न देखा। उस स्वप्नको देखनेके
बाद उन्होंने अगले दिन प्रातःकालमें गोवर्धनवासियोंको
लेकर वनसे श्रीगोपालमूर्तिको बाहर निकालकर पर्वतके
ऊपर स्थापित किया। महासमारोहके साथ श्रीगोपालकी
पूजा और अन्नकूट महोत्सव हुआ। इस बातका क्रमशः
प्रचार होनेसे बहुतसे गाँवोंसे अनेक लोग आकर
श्रीगोपालका महोत्सव करने लगे। श्रीगोपालने एक रात
श्रीमाधवेन्द्रपुरीको यह स्वप्न दिया,—“तुम बिना देरी
किये नीलाचल जाकर मलयज चन्दनको संग्रह करके
(यहाँपर ले आओ और उसे घिसकर) मेरे शरीरपर
लगाकर मेरा ताप दूर करो।” गोपालजीकी आज्ञा पाकर
पुरी गोस्वामी बङ्गालसे होते हुए उत्कलदेश (उड़ीसा)के
रेमुणा नामक गाँवमें पहुँचे, वहाँ श्रीगोपीनाथके द्वारा
प्रदान किये खीर-प्रसादको पाकर उन्होंने श्रीपुरुषोत्तमकी
ओर गमन किया। श्रीमाधवेन्द्रपुरीको श्रीगोपीनाथजीने
चोरी करके खीर प्रदान की थी, इसलिये उनका नाम
‘क्षीरचोरा गोपीनाथ’ हो गया है। नीलाचल पहुँचकर
श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंके द्वारा राजकर्मचारियोंसे एक
मन (लगभग 36 किलो) चन्दन और बीस तोला
(लगभग 250 ग्राम) श्रीकर्पूर एकत्रित करके, दो
व्यक्तियोंके द्वारा इन दोनों वस्तुओंको लेकर वे पुनः
[दायाँ स्तम्भ]
रेमुणा आये। तब गोवर्धनधारी श्रीगोपालने उन्हें पुनः
स्वप्नमें आज्ञा दी,—“इस चन्दन और कर्पूरको गोपीनाथके
अङ्गोंमें लगानेसे मेरा ताप दूर हो जायेगा।” श्रीमाधवेन्द्रपुरी
उनकी उस आज्ञाका पालन करके पुनः नीलाचल चले
गये। महाप्रभुने इस इतिहासको श्रीनित्यानन्द आदि
भक्तोंको सुनाकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी विशुद्ध प्रेमभक्तिकी
बहुत प्रशंसा की। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा रचित श्लोकका
पाठ करनेसे महाप्रभुमें प्रेमोन्माद उदित हुआ। लोगोंकी
भीड़को देखकर महाप्रभुको बाह्यज्ञान होनेपर उन्होंने
खीर प्रसाद पाकर वह रात्रि वहीं व्यतीत करके अगले
दिन नीलाचलकी यात्रा की।
—(अमृतप्रवाहभाष्य)
‘क्षीरचोरा गोपीनाथ’-सेवक श्रीमाधवेन्द्रपुरीको प्रणाम :—
यस्मै दातुं चोरयन् क्षीरभाण्डं
गोपीनाथः क्षीरचोराभिधोऽभूत्।
श्रीगोपालः प्रादुरासीद्दृशः सन्
यत्प्रेम्णा तं माधवेन्द्रं नतोऽस्मि ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिनको खीर अर्पण करनेके
लिये खीरके भाण्ड (कुल्हड़) की चोरी करके श्रीगोपीनाथका
‘क्षीरचोरा’-नाम हुआ था और जिनकी भक्तिके वशीभूत
होकर श्रीगोपालदेव प्रकाशित हुए थे, उन श्रीमाधवेन्द्रपुरीको
मैं नमस्कार करता हूँ ॥ 1 ॥
अनुभाष्य—
गोपीनाथः (रेमुणा-ग्रामस्थस्तन्नामप्रसिद्धः श्रीविग्रहः) क्षीरभाण्डं
(पायसान्नपूर्णं पात्रं) चोरयन् (अपहरण) यस्मै (श्रीमाधवेन्द्राय)
दातुं क्षीरचोराभिधः अभूत (क्षीरचोरागोपीनाथेति संज्ञां प्राप्तवान्);
यत् (यस्य माधवेन्द्रस्य) प्रेमणा वशः (वशीभूतः सन्)
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