श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 959, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/202-212 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
और महाप्रभु सभी भक्तोंके साथ सुखपूर्वक भोजन
करते॥202॥
महाप्रभुकी सेवासे श्रीअद्वैतका सबकुछ धन्य :-
आचार्येर श्रद्धा-भक्ति, गृह-सम्पद्-धने।
सकल सफल हैल प्रभुर आगमने॥203॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यकी श्रद्धा-भक्ति, उनका घर,
सम्पत्ति, धनादि सब कुछ महाप्रभुकी सेवामें प्रयोग
होनेसे सार्थक हो गये॥203॥
शचीमाताका सुख :-
शचीर आनन्द बाड़े देखि' पुत्रमुख।
भोजन कराञा पूर्ण कैल निजसुख॥204॥
अनुवाद-अपने पुत्र निमाइका मुख देखकर
शचीमाताका आनन्द बढ़ता जाता और उसे भोजन
कराके उन्होंने अपने अभिलाषित परम सुखको प्राप्त
किया॥204॥
श्रीअद्वैतके घरमें कुछ दिन तक अप्राकृत आनन्द :-
एइमत अद्वैत-गृहे भक्तगण मिले।
वञ्चिला कतकदिन महा-कुतूहले॥205॥
अनुवाद-इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यके घरमें महाप्रभुने
भक्तोंके साथ कुछेक दिन आनन्दपूर्वक बिताये॥205॥
महाप्रभुके द्वारा भक्तोंको विदायी देना :-
आर दिन प्रभु कहे सब भक्तगणे।
"निज-निज-गृहे सबे करह गमने॥206॥
महाप्रभु और भक्त-दोनोंका परस्पर
भविष्यमें मिलनके सुयोगका निर्देश :-
घरे गिया कर सबे कृष्णसङ्कीर्त्तन।
पुनरपि आमा-सङ्गे हइबे मिलन॥207॥
भक्तोंके द्वारा नीलाचल जाने और महाप्रभुके द्वारा
नवद्वीपमें आने पर मिलनकी सम्भावना :-
कभु वा तोमरा करिबे नीलाद्रि-गमन।
कभु वा आसिब आमि करिते गङ्गास्नान॥"208॥
अनुवाद-अगले दिन महाप्रभुने सभी भक्तोंसे
कहा,-"अब आप सब अपने-अपने घर जाइये। घर
जाकर आप सब श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करते रहना। मेरे
साथ आपका पुनः मिलन होगा। कभी आप लोग
नीलाचलमें आयेंगे और कभी मैं गङ्गास्नान करने यहाँ
आऊँगा॥"206-208॥
पुरीके मार्गमें महाप्रभुके साथ श्रीनिताइ आदि चार भक्त;
महाप्रभुके द्वारा शचीमाताको सान्त्वना तथा उनकी
वन्दनाके बाद यात्रा :-
नित्यानन्द-गोसाञि, पण्डित जगदानन्द।
दामोदर पण्डित, आर दत्त मुकुन्द॥209॥
एइ चारिजन, आचार्य दिल प्रभु-सने।
जननी प्रबोध करि' वन्दिल चरणे॥210॥
ताँरे प्रदक्षिण करि' करिल गमन।
एथा आचार्येर घरे उठिल क्रन्दन॥211॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने श्रीनित्यानन्द प्रभु,
श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित और श्रीमुकुन्द
दत्त-इन चार भक्तोंको महाप्रभुके साथ भेजा। महाप्रभुने
शचीमाताको सान्त्वना देकर उनके श्रीचरणकमलोंकी
वन्दना की और उनकी परिक्रमा करके महाप्रभु
नीलाचलकी ओर चल दिये। उस समय श्रीअद्वैताचार्यके
घरमें सभी महाप्रभुके वियोगमें ज़ोर-ज़ोरसे रोने
लगे॥209-211॥
निरपेक्ष हञा प्रभु शीघ्र चलिला।
कान्दिते कान्दिते आचार्य पश्चात् चलिला॥212॥
अनुवाद-परन्तु महाप्रभु निरपेक्ष होकर अर्थात्
बिना विचलित हुए शीघ्रतासे वहाँसे चल दिये और
श्रीअद्वैताचार्य भी रोते-रोते उनके पीछे चलने लगे॥212॥
अनुभाष्य-'निरपेक्ष'-जड़ीय वस्तुकी अपेक्षा या
प्रभावसे मुक्त अपने स्वरूप भगवद्-दास्यमें स्थित रहना
निरपेक्ष होना है। बादमें श्रीकृष्णके अन्वेषण कार्यमें
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