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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 950, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 950

तीसरा अध्याय 3/117–128 ]

अनुभाष्य—'भण्डिया'—धोखा करके॥ 117 ॥
महाप्रभुका श्रीकृष्ण-विरह :-
प्रेमेर उत्कण्ठा,—प्रभुर नाहि कृष्णसङ्ग।
विरह बाड़िल, प्रेमज्वालार तरङ्ग ॥ 119 ॥
व्याकुल हञा प्रभु भूमेते पड़िला।
गोसाञि देखिया आचार्य्य नृत्य सम्वरिला ॥ 120 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य प्रभु जब इस प्रकार नृत्य
कर रहे थे, तब महाप्रभु श्रीकृष्णप्रेममें उत्कण्ठित हो
उठे, किन्तु श्रीकृष्ण-सङ्ग प्राप्त न करनेके कारण
विरहमें उनकी प्रेम-ज्वालाकी तरङ्गें बढ़ने लगीं।
श्रीकृष्ण-विरहमें व्याकुल होकर महाप्रभु भूमिपर गिर
पड़े और महाप्रभुको गिरते हुए देखकर श्रीअद्वैताचार्यने
नृत्य करना बन्द कर दिया ॥ 119–120 ॥
मुकुन्दका समयके अनुसार गीत गाना :-
प्रभुर अन्तर मुकुन्द जाने भालमते।
भावेर सदृश पद लागिला गाइते ॥ 121 ॥
आचार्य उठाइल प्रभुके करिते नर्त्तन।
पद शुनि' प्रभुर अङ्ग ना याय धारण ॥ 122 ॥
महाप्रभुके अष्टसात्त्विक विकार :-
अश्रु, कम्प, पुलक, स्वेद, गदगद वचन।
क्षणे उठे, क्षणे पड़े, क्षणेक रोदन ॥ 123 ॥
अनुवाद—श्रीमुकुन्द महाप्रभुके अन्तरङ्ग भावोंको
भलीभाँति जानते थे और वे उनके भावोंके अनुरूप
पदका गान करने लगे। तब श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुको
नृत्य करनेके लिये उठाने लगे, परन्तु मुकुन्दके पदको
सुनकर महाप्रभु इतने अधिक भावाविष्ट हो गये कि
उन्हें पकड़ा नहीं जा रहा था। उनकी आँखोंसे अश्रुपात
हो रहा था, सारा शरीर काँप रहा था, देहमें पुलक हो
रहा था, शरीर पसीनेसे तर-बतर हो रहा था तथा
उनका गला रुद्ध हो गया था। एक क्षण वे उठते, क्षण
भरमें गिर पड़ते तथा अगले क्षण क्रन्दन करने
लगते ॥ 121–123 ॥

यथा पद :-
हा हा प्राणप्रियसखि, कि ना हैल मोरे।
कानुप्रेमविषे मोर तनु-मन जरे ॥ 124 ॥
रात्रि-दिने पोड़े मन, सोयास्ति ना पाइ।
याँहा गेले कानु पाउँ, ताँहा उड़ि' याइ ॥ 125 ॥
एइ पद गाय मुकुन्द मधुर सुस्वरे।
शुनिया प्रभुर चित्त हइल कातरे ॥ 126 ॥
अनुवाद—हा! हा! प्राणप्रियसखि! मुझे क्या नहीं
हुआ है? कृष्णके प्रेमरूपी विषके प्रभावसे मेरा तन
और मन संतप्त हो रहा है। रात-दिन मेरा मन जलता
रहता है। मुझे इससे तनिक भी आराम नहीं मिलता।
यदि कहीं जानेसे कृष्ण मिलेंगे, तो मैं वहाँ उड़कर
पहुँच जाऊँ।—श्रीमुकुन्द इस पदको मधुर सुस्वरमें गान
कर रहे थे और इसे सुनकर महाप्रभुका हृदय विरहमें
कातर हो रहा था॥ 124-126॥
अनुभाष्य—सम्भोग-रसके गानमें श्रीकृष्णसङ्गके
अभाववशतः महाप्रभुमें विप्रलम्भ रसका पूर्ण प्राकट्य
देखकर श्रीमुकुन्दने उसीके अनुरूप पदका गान आरम्भ
किया। श्रीअद्वैतप्रभुने भी नृत्य बन्द कर दिया।
विद्यापतिको अनुरूप पद—
“कि करिब कोथा याब सोयाथ ना हय।
पियार लागिया हाम् कोने देशे याब॥”
अर्थात् “क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, हृदयको शान्ति
नहीं मिल रही। अपने प्रियतमको खोजने मैं कौनसे
देशको जाऊँ?”॥ 124 ॥
महाप्रभुके भाव :-
निर्वेद, विषाद, हर्ष, चापल्य, गर्व, दैन्य।
प्रभुर सहित युद्ध करे भाव-सैन्य ॥ 127 ॥
जर-जर हैल प्रभु भावेर प्रहारे।
भूमिते पड़िल, श्वास नाहिक शरीरे ॥ 128 ॥

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