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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 919, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 919

दूसरा अध्याय 2/62-64 ]
श्लोकका अर्थ :-
"तोमार माधुरी-बल, ताते मोर चापल,
एइ दुइ, तुमि आमि जानि।
काँहा करूँ काँहा याङ, काँहा गेले तोमा पाङ,
ताहा मोरे कह त' आपनि॥" 62 ॥
अनुवाद-हे कृष्ण ! तुम्हारी माधुरीका बल और
कैसे वह मेरे चित्तको चपल बना देती है, इन दोनोंको
तुम भी जानते हो और मैं भी जानती हूँ। तुम बताओ
कि मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? कहाँ जानेसे तुम
मिलोगे ? ॥ 62 ॥
महाभावमें महाप्रभुका दिव्योन्माद :-
नाना-भावेर प्राबल्य, हैल सन्धि-शाबल्य,
भावे-भावे हैल महारण।
औत्सुक्य, चापल्य, दैन्य, रोषामर्ष आदि सैन्य,
प्रेमोन्माद-सबार कारण॥ 63 ॥
मत्तगज भावगण, प्रभुर देह-इक्षुवन,
गज-युद्धे वनेर दलन।
प्रभुर हैल दिव्योन्माद, तनुमनेर अवसाद,
भावावेशे करे सम्बोधन ॥ 64 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके हृदयमें नाना भाव प्रबल वेगसे
आ रहे हैं; दो भावोंका एक साथ समावेश होनेसे
भाव-सन्धि और एक भावको दबाकर दूसरे भावका
उदय होनेसे भाव-शाबल्य; इस प्रकार भावोंमें परस्पर
महायुद्ध हो रहा है। औत्सुक्य, चापल्य, दैन्य, रोष,
अमर्ष आदि भाव इस युद्धमें सैनिक हैं और कृष्णप्रेमका
उन्माद ही इन सबका कारण है। महाप्रभुका शरीर
गन्नेके खेतके समान था जिसमें मतवाले हाथियोंके
समान भाव प्रवेश कर गये। उन हाथियोंमें युद्ध हो गया
और उसके कारण वह गन्नेका खेत नष्ट हो गया।
महाप्रभुके शरीरमें दिव्योन्माद जाग्रत हो गया और
उनके तन-मनमें निराशा छा गयी। भावावेशमें वे कहने
लगे॥ 63-64 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'दिव्योन्माद'- मोहनभावमें भ्रमके
जैसी किसी प्रेमवैचित्य-दशाका नाम 'दिव्योन्माद' है ॥ 64 ॥
अनुभाष्य- 'सन्धि'- (भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)-
“सरूपयोर्भिन्नयोर्वा सन्धिः स्याद्भावयोर्युतिः।”
'सरूपसन्धि'- "सन्धिः सरूपयोस्तत्र भिन्नहेतुत्थयोर्मतः।”
'भिन्नरूप सन्धि'- "भिन्नयोर्हेतुनैकेन भिन्नेनाप्युपजातयोः।”
अर्थात् “समानरूप अथवा भिन्नरूप दो भावोंके
मिलनको 'सन्धि' कहते हैं। भिन्न-भिन्न कारणोंसे समानरूप
दो भावोंके मिलनको 'सरूपसन्धि' और एक कारण या
भिन्न कारणसे दो भिन्न भावोंके मिलनको 'भिन्नरूप
सन्धि' कहते हैं।" एक कारण या भिन्न कारण-जनित
दो भावोंकी सन्धि; हर्ष और शङ्का-दोनोंकी सन्धि, हर्ष
और विषादकी सन्धि।
'शाबल्य'- (भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)-
“शबलत्वं तु भावानां संमर्द्दः स्यात् परस्परम्।”
अर्थात् “समस्त सञ्चारी भावोंके परस्पर युद्धका
नाम 'शाबल्य' है। गर्व, विषाद, दैन्य, मति, स्मृति, शङ्का,
अमर्ष, त्रास, निर्वेद, धैर्य और औत्सुक्य आदि भावोंके
युद्ध होनेपर 'शाबल्य' होता है।"
'औत्सुक्य'-(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)-
“कालाक्षमत्वमौत्सुक्यमिष्टेष्ठाप्ति-स्पृहादिभिः ।
मुखशोष-त्वरा-चिन्ता-निश्वास-स्थिरतादिकृत् ॥”
अर्थात् “अभीष्टवस्तुके दर्शनकी इच्छा या
अभीष्टप्राप्ति-वासनाके लिये काल विलम्ब सहन न
कर सकनेको 'औत्सुक्य' कहते हैं। इसमें मुखका
सूखना, व्यस्तता, चिन्ता, दीर्घःश्वास और स्थैर्य आदि
लक्षित होते हैं।”
'चापल'-(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)-
“रागद्वेषादिभिborderश्चित्तलाघवं चापलं भवेत्।
तत्राविचारपारुष्यस्वच्छन्दाचरणादयः ॥”
अर्थात् “आसक्ति और विरक्तिके द्वारा चित्तकी
लघुताको 'चापल' कहते हैं। इसमें अविचार, स्वच्छन्द
आचरण और कर्कशवाक्यादि लक्षित होते हैं।”
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