श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 903, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय
कथासार-इस दूसरे अध्यायमें ग्रन्थकारने महाप्रभुके
अन्तिम बारह वर्षोंकी भावास्वादन-लीलाओंका सूत्ररूपमें
वर्णन किया है और बीचमें संस्कृत श्लोक उद्धृत
करनेके कारण उनकी व्याख्या भी की है। इन गम्भीर
भावोंके तत्त्वको लोग आसानीसे समझ नहीं सकते।
इस ग्रन्थमें वर्णित श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंके
वर्णनको सुनते-सुनते आसानीसे भावतत्त्व जीवोंके
हृदयमें उदित होगा। कविराज गोस्वामीने बहुत वृद्धावस्थामें
इस ग्रन्थको लिखा था। उन्हें भय था कि कहीं यह
ग्रन्थ अधूरा न रह जाय, इसलिये भक्तोंके उपकारके
लिये उन्होंने अन्त्यलीलाके सूत्रोंको इस अध्यायमें संग्रह
किया है। कविराज गोस्वामीने कहा है,—
श्रीस्वरूप-गोस्वामीका मत ही भजनके सम्बन्धमें प्रधान
मत है। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने उनकी कृपासे उनके
द्वारा रचित कड़चा कण्ठस्थ कर लिया था। श्रीस्वरूपके
अन्तर्धान होनेके बाद श्रीरघुनाथदास गोस्वामी व्रजमें
आये। कविराज-गोस्वामी व्रजमें आकर श्रीरूप और
श्रीरघुनाथसे मिले और उनकी कृपासे उस कण्ठस्थ
कड़चाके तात्पर्यको समझकर इस ग्रन्थकी रचना की।
-(अमृतप्रवाह भाष्य)
महाप्रभुके कृष्ण विरह-प्रलापादिका वर्णन :—
विच्छेदेऽस्मिन् प्रभोरन्त्यलीला-सूत्रानुवर्णने।
गौरस्य कृष्णविच्छेदप्रलापाद्यनुवर्ण्यते॥1॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुकी अन्त्यलीला सूत्ररूपमें
वर्णन करते हुए इस अध्यायमें उनके श्रीकृष्ण-विरह-प्रलाप
आदिका वर्णन किया है॥1॥
अनुभाष्य-
अस्मिन् विच्छेदे (श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यलीलायां
द्वितीयपरिच्छेदे) प्रभोः (श्रीचैतन्यदेवस्य) अन्त्यलीलासूत्रानुवर्णने
(संन्यासचरित्रसूत्र-प्रतिसंक्रमणे विषये) गौरस्य (गोपीभावाश्रितस्य
भगवतो महाप्रभोः) कृष्णविच्छेदप्रलापादिः (निजकान्त-
विरहजन्योन्मत्तवाक्यादिः) अनुवर्ण्यते (मया लिख्यते)।
श्लोक-भावानुवाद-श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यलीलाके
दूसरे अध्यायमें श्रीचैतन्यदेवके संन्यासचरित्रके विषयमें
गोपीभावाश्रित महाप्रभुके निजकान्त विरहजनित उन्मत्त-
वाक्यादिको मैं लिख रहा हूँ॥1॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द
प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौर
भक्तोंकी जय हो॥2॥
अन्तके बारह वर्षोंमें महाप्रभुका कृष्णविरह :-
शेष ये रहिल प्रभुर द्वादश वत्सर।
कृष्णेर वियोग-स्फूर्त्ति हय निरन्तर॥3॥
अनुवाद-अन्तिम बारह वर्षोंमें महाप्रभु निरन्तर
श्रीकृष्णका वियोग और वियोगमें उनकी स्फूर्ति अनुभव
करते थे॥3॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'वियोग'-विच्छेद, विरह॥3॥
उद्धवके दर्शनसे श्रीराधिकाभावमय महाप्रभु :-
श्रीराधिकार चेष्टा येन उद्धव-दर्शने।
एइमत दशा प्रभुर हय रात्रि-दिने॥4॥
निरन्तर हय प्रभुर विरह-उन्माद।
भ्रममय चेष्टा सदा, प्रलापमय वाद॥5॥
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