श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 898, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय 1/261-266 ]
श्रीसनातन गोस्वामीको वृन्दावन भेजना
और श्रीअद्वैत-घरमें भिक्षा :-
तुष्ट हञा प्रभु ताँरे पाठाइला वृन्दावन।
अद्वैतेर हस्ते प्रभुर अद्भुत भोजन ॥ 261 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीसे सन्तुष्ट होकर महाप्रभुने उन्हें वृन्दावन वापिस भेज दिया। श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुको अपने हाथोंसे भोजन करानेकी अद्भुत लीला की ॥ 261 ॥
अनुभाष्य— 'श्रीअद्वैतगृहेमें महाप्रभुका अकेले भोजन'—अन्त्यलीला आठवाँ अध्याय देखें ॥ 261 ॥
गौड़देशमें श्रीनित्यानन्दको नाम-प्रेम-प्रचारार्थ भेजना :-
नित्यानन्द-सङ्गे युक्ति करिया निभृते।
ताँरे पाठाइला गौड़े प्रेम प्रचारिते ॥ 262 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने एकान्तमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ विचार-विमर्श करके उनको कृष्णप्रेमको वितरित करनेके लिये गौड़देशमें भेज दिया ॥ 262 ॥
अनुभाष्य— 'श्रीनित्यानन्द प्रभुको गौड़देशमें नाम-प्रचारकी आज्ञा देना'—मध्यलीला, 15/42, 16/59-67 संख्या देखें ॥ 262 ॥
वल्लभभट्टका गर्व-नाश और कृष्णनाम-महिमा-श्रवण :-
तबे त' वल्लभभट्ट प्रभुरे मिलिला।
कृष्णनामेर अर्थ प्रभु ताँहारे कहिला ॥ 263 ॥
अनुवाद—तब वल्लभभट्ट पुरीमें आकर महाप्रभुसे मिले और महाप्रभुने (उनका गर्वनाश करके) उन्हें महिमा सहित कृष्णनामके अर्थकी व्याख्या की ॥ 263 ॥
अनुभाष्य— 'वल्लभभट्ट'—अन्त्यलीला, सातवाँ अध्याय और मध्यलीला, उन्नीसवाँ अध्याय देखें।
श्रीगौरसुन्दरने अपने प्रियजन श्रीगदाधर पण्डितसे वल्लभभट्टको नाममन्त्र दिलवाया और स्वयं उसे अपने सम्प्रदायके अनुसार नामका अर्थ बतलाया। "विनीतानथ पुत्रादीन् संस्कृत्य प्रतिबोधयेत्" अर्थात् "विनीत शिष्योंको वैदिक दस संस्कारोंसे संस्कृतकर आचार्य अपने शिष्योंको ब्रह्मचारी बनाकर उनको मन्त्रके अर्थकी शिक्षा देवें।"—इस पञ्चरात्र वाक्यके अनुसार वल्लभभट्टने नामार्थ श्रवण करनेका अधिकार पाया था ॥ 263 ॥
ब्राह्मणकुल-उत्पन्न प्रद्युम्न मिश्रका ब्राह्मणकुलमें नहीं जन्मे वैष्णवाचार्य श्रीराय रामानन्दको गुरु रूपमें वरण :-
प्रद्युम्न मिश्रेरे प्रभु रामानन्द-स्थाने।
कृष्णकथा शुनाइल कहि' ताँर गुणे ॥ 264 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने (कायस्थकुलमें जन्में) श्रीराय रामानन्दके दिव्य गुणोंकी महिमा गान करके (ब्राह्मणकुलमें जन्में) प्रद्युम्न मिश्रको उनसे श्रीकृष्णकथा श्रवण करनेके लिये प्रेरित किया ॥ 264 ॥
अनुभाष्य—अन्त्यलीला, पाँचवाँ अध्याय देखें ॥ 264 ॥
राजाके क्रोधसे गोपीनाथका उद्धार :-
गोपीनाथ पट्टनायक—रामानन्द-भ्राता।
राजा मारितेछिल, प्रभु हैल त्राता ॥ 265 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दके भाई गोपीनाथ पट्टनायकके प्राणोंकी रक्षा की, जिसे राजाने मृत्यु दण्ड दिया था ॥ 265 ॥
अनुभाष्य—अन्त्यलीला, नौवाँ अध्याय देखें ॥ 265 ॥
विद्वेषी रामचन्द्र पुरीका महाप्रभुके प्रति शासन और भक्तोंका दुःख :-
रामचन्द्रपुरी-भये भिक्षा घटाइल।
वैष्णवेर दुःख देखि' अर्द्धेक राखिल ॥ 266 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके ऊपर रामचन्द्रपुरीके द्वारा अधिक प्रसाद ग्रहण करनेका दोषारोपण करनेपर उन्होंने बहुत अल्पमात्रामें प्रसाद पाना आरम्भ किया। इसे देखकर सभी वैष्णव लोग बहुत दुःखी हो गये, तब महाप्रभु दोषारोपणसे पूर्व जितना प्रसाद पाते थे, उसका आधा ग्रहण करने लगे ॥ 266 ॥
अनुभाष्य—अन्त्यलीला, आठवाँ अध्याय देखें ॥ 266 ॥
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