श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 763, कुल 2549 में से
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अनुवाद-तत्पश्चात् महाप्रभुने श्रीवासके घरपर
एक वर्षतक निरन्तर रात्रिकालमें सङ्कीर्त्तन किया ॥ ३४ ॥
द्वेषी-पाषण्डी व्यक्तियोंका प्रवेश निषेध :-
कपाट दिया कीर्त्तन करे परम आवेशे।
पाषण्डी हासिते आइसे, ना पाय प्रवेशे ॥ ३५ ॥
श्रीवासके प्रति ईर्ष्या और विद्वेष :-
कीर्त्तन शुनि' बाहिरे तारा ज्वलि' पुड़ि' मरे।
श्रीवासेरे दुःख दिते नाना युक्ति करे ॥ ३६ ॥
अनुवाद-द्वार बन्द करके महाप्रभु परमावेशमें सङ्कीर्त्तन
करते थे। पाषण्डी लोग उनका उपहास करनेके लिये
आते, परन्तु द्वार बन्द होनेके कारण वे भीतर प्रवेश
नहीं कर पाते। वे बाहरसे ही कीर्त्तन सुनकर ईर्ष्याके
कारण जल मरते थे। तब वे श्रीवासको दुःख देनेके
लिये अनेक प्रकारकी युक्तियाँ करने लगे ॥ ३५-३६ ॥
श्रीवासके विरुद्ध गोपाल-चापालका काण्ड :-
एकदिन विप्र, नाम-'गोपाल चापाल'।
पाषण्डि-प्रधान सेइ दुर्मुख, वाचाल ॥ ३७ ॥
भवानी-पूजार सब सामग्री लञा।
रात्रे श्रीवासेर द्वारे स्थान लेपाञा ॥ ३८ ॥
अनुवाद-एक दिन रात्रिमें पाषण्डियोंमें प्रधान दुर्वचन
और अधिक बोलनेवाला 'गोपाल-चापाल' नामका एक
ब्राह्मण भवानी-पूजाकी सारी सामग्री लाया और उसने
श्रीवास पण्डितके घरके द्वारके बाहर भूमिको लेपकर
वह सामग्री रख दी ॥ ३७-३८ ॥
अनुभाष्य-चैतन्यभागवतमें 'गोपाल-चापाल' का कोई
वृत्तान्त प्राप्त नहीं होता है ॥ ३७ ॥
श्रीवासको शक्तिके उपासक दिखलानेकी चेष्टा :-
कलार पात उपरे थुइल ओड़-फुल।
हरिद्रा, सिन्दूर आर रक्तचन्दन, तण्डुल ॥ ३९ ॥
मद्यभाण्ड-पाशे धरि' निज-घरे गेल।
प्रातःकाले श्रीवास ताहा त' देखिल ॥ ४० ॥
श्रीवासको शक्तिका उपासक सिद्ध करनेकी चेष्टा :-
बड़ बड़ लोकेर आनिल बोलाइया।
सबारे कहे श्रीवास हासिया हासिया ॥ ४१ ॥
"नित्य रात्रे करि आमि भवानी-पूजन।
आमार महिमा देख, ब्राह्मण-सज्जन ॥" ४२ ॥
अनुवाद-वह केलेके पत्तेके ऊपर जवा-पुष्प,
हल्दी, सिन्दूर, लाल-चन्दन, चावल और साथमें मदिराका
पात्र रखकर अपने घर चला गया। प्रातःकाल श्रीवासने
उठकर जब उस सामग्रीको देखा, तो वे पड़ोसके सभी
सम्माननीय व्यक्तियोंको बुलाकर हँसते-हँसते कहने लगे,
"हे ब्राह्मणों ! हे सज्जनों ! मेरी महिमा देखो। मैं प्रत्येक
रात्रिमें भवानीकी पूजा करता हूँ ॥" ३९-४२ ॥
अनुभाष्य-'बोलाइया'-बुलाकर ॥ ४१ ॥
स्थानीय सज्जन व्यक्तियोंके मनमें क्षोभ
और स्थान-शुद्धिकरण :-
तबे सब शिष्टलोक करे हाहाकार।
'ऐछे कर्म हेथा कैल कोन् दुराचार ॥' ४३ ॥
हाड़िके आनिया सब दूर कराइल।
जल-गोमय दिया सेइ स्थान लेपाइल ॥ ४४ ॥
अनुवाद-तब सब सज्जन लोग हाहाकार करके
कहने लगे, "किस दुराचारीने ऐसा नीच कर्म किया
है?" उन्होंने जमादारको बुलवाकर वह सब सामग्री दूर
फिंकवा दी और जल तथा गोबरसे उस स्थानको
लीपकर शुद्ध किया ॥ ४३-४४ ॥
वैष्णव-अपराधके फलस्वरूप गोपाल-चापालको कोढ़ :-
तिन दिन रहि' सेइ गोपाल-चापाल।
सर्वाङ्गे हइल कुष्ठ, बहे रक्तधार ॥ ४५ ॥
अनुवाद-तीन दिन बाद उस गोपाल-चापालके
सभी अङ्गोंमें कुष्ट रोग हो गया और उनमेंसे रक्त
बहने लगा ॥ ४५ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जिस समय महाप्रभु श्रीवास
सतरहवाँ अध्याय | 227