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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 759, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 759

17/13-18 ]
अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द
प्रभुको शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, शार्ङ्ग और वेणुधारी
षड्भुज रूप दिखाया, बादमें दो हाथोंमें शङ्ख, चक्र और
दो हाथोंमें वंशी धारण किये हुए चतुर्भुज रूप दिखलाया।
अन्तमें उन्होंने केवल वंशीधारी श्रीकृष्ण रूप
दिखलाया—(चैःभाः, मध्य) ॥ 13-15 ॥
श्रीगौर ही श्रीनित्यानन्द-बलराम :-
तबे नित्यानन्द-गोसाञिर व्यास-पूजन।
नित्यानन्दावेशे कैल मूषल-धारण॥16॥
अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुकी
व्यासपूजाकी और महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुके आवेशमें
मूसलको धारण किया॥16॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुके आदेशसे श्रीनित्यानन्द
प्रभुने पूर्णिमाकी रात्रिमें व्यासपूजाके लिये श्रीवासके द्वारा
पूजाकी सामग्री एकत्रित करवायी। सङ्कीर्तन करते-करते
श्रीनित्यानन्द प्रभुने पुष्पमाला महाप्रभुके गलेमें अर्पण
की। उस समय श्रीनित्यानन्द प्रभुने षड्भुज रूपके दर्शन
किये। तब व्यासपूजाका और कार्य नहीं हो सका।
श्रीबलरामके आवेशमें व्यासपूजाकी पूर्वरात्रिमें श्रीवासके
गृहमें सङ्कीर्तनके समय महाप्रभुने विष्णु-सिंहासनके ऊपर
बैठकर श्रीनित्यानन्द प्रभुसे हल-मूसल माँगा था। तब
श्रीनित्यानन्द प्रभुने अपने हाथ महाप्रभुके हाथोंमें दे दिये
और उस समय भक्तोंने हल और मूसलके प्रत्यक्ष दर्शन
किये थे॥16॥
शचीका स्वप्न दर्शन और जगाइ-मधाइका उद्धार :-
तबे शची देखिल, रामकृष्ण-दुइ भाइ।
तबे निस्तारिल प्रभु जागाइ-माधाइ॥17॥
अनुवाद—इसके बाद शचीमाताने (श्रीनित्यानन्द प्रभु
और महाप्रभुमें) श्रीबलराम-श्रीकृष्णके दर्शन किये।
बादमें महाप्रभुने जगाइ और माधाइका उद्धार किया॥17॥
अमृतप्रवाह भाष्य—एकबार शचीदेवीने स्वप्नमें देखा
कि उनके गृहमें स्थित कृष्ण-बलराम गौराङ्ग-नित्यानन्दके
साथ नैवेद्यके लिये झगड़ रहे हैं। अगले दिन
महाप्रभुकी इच्छासे शचीदेवीने श्रीनित्यानन्द प्रभुको
उनके घर भोजनके लिये आमन्त्रित किया। विश्वम्भर
और श्रीनित्यानन्द प्रभु जब भोजन कर रहे थे, उस
समय शचीदेवीने साक्षात् श्रीकृष्ण और श्रीबलरामको
भोजन करते हुए देखा, जिसे देखकर वे प्रेमके कारण
मूर्च्छित हो गयीं।
जगाइ और माधाइका जन्म नवद्वीपमें हुआ था,
परन्तु वे बहुत पापोंमें रत थे। महाप्रभुकी आज्ञासे
श्रीनित्यानन्द प्रभु और हरिदास ठाकुर जब घर-घर
नाम प्रचारके लिये जाने लगे, तब एकदिन जगाइ और
माधाइ, दोनों मदिरापान करके नशेमें इनपर क्रोधित हो
गये। उन्होंने उन्मत्त होकर श्रीनित्यानन्द प्रभु और
हरिदास ठाकुरको डाँटा और धमकाया, तब ये दोनों
वहाँसे भाग निकले। एक और दिन माधाइने श्रीनित्यानन्द
प्रभुके मस्तकपर टूटे हुए मिट्टीके बर्तनसे प्रहार किया,
जिसे देखकर जगाइको कुछ दुःख हुआ। महाप्रभुने जब
यह वृत्तान्त सुना, तब वे अपने शिष्योंके साथ वहाँ
आये और जगाइ और माधाइको दण्ड देनेके लिये
उद्यत हुए। करुणामय गौराङ्ग महाप्रभुने जगाइके अच्छे
व्यवहारके विषयमें सुनकर उसे प्रेमालिङ्गन दिया।
भगवद्दर्शन और स्पर्शसे उन दोनों पापियोंका चित्त
परिवर्तित हो गया और महाप्रभुने उन्हें हरिनाम देकर
उनका उद्धार किया॥17॥
महाप्रभुका 'सातप्रहरिया' भाव :-
तबे सप्तप्रहर छिला प्रभु भावावेशे।
यथा तथा भक्तगण देखिल विशेषे॥18॥
अनुवाद—तब महाप्रभु सात प्रहरतक भावावेशमें
रहे और भक्तोंने उनकी विशेष लीलाओंके दर्शन
किये॥18॥
अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन श्रीवासके घरमें महाप्रभु
विष्णु-सिंहासनपर बैठे थे, तब भक्तोंने 'सहस्रशीर्षपुरुषः
सहस्राक्षः सहस्रपात्' आदि पुरुष-सूक्त पाठकर गङ्गाजलसे
सतरहवाँ अध्याय | 223