श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 74, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १/७४-७७
अमृतप्रवाह भाष्य—आश्चर्यका विषय यह है कि एक ही श्रीकृष्णने एक-एक स्वरूपमें
प्रत्येक घरमें एक साथ सोलह हजार स्त्रियोंके साथ विवाह किया॥७४॥
अनुभाष्य—बत (अहो) एतत् चित्रम्। एकः (कृष्णः) एकेन वपुषा युगपत् पृथग्गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं
(षोडश-सहस्रं) स्त्रियः (महिषीः) उदावहत् (उपयेमे)।
श्लोक-भावानुवाद—अहो! यह आश्चर्य है। एक ही श्रीकृष्णने एक-एक रूपसे, एक साथ
सोलह हजार महिषियोंके साथ विवाह किया॥७४॥
लघुभागवतामृत, पूर्वखण्डमें आवेषकथनमें (१/२१) :-
अनेकत्र प्रकटता रूपस्यैकस्य यैकदा।
सर्वथा तत्स्वरूपैव स प्रकाश इतीर्यते॥७५॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७५॥
अमृतप्रवाह भाष्य—एक ही रूपमें एक ही साथ अनेक अभिन्न प्रकाशोंको 'प्रकाश' कहते
हैं ॥७५॥
अनुभाष्य—एकदा (एकस्मिन् काले) एकस्य रूपस्य या अनेकत्र प्रकटता, सर्वथा तत्स्वरूपा (आकृत्या
गुणैर्लीलाभिश्चैकस्वरूपा) एव स प्रकाश इतीर्यते।
श्लोक-भावानुवाद—एक ही समयमें एक रूप, जो अनेक स्थानोंमें प्रकट होते हैं और उनके
रूप-गुण-लीला एक स्वरूप ही होते हैं, तो उन्हें 'प्रकाश' कहते हैं॥७५॥
ईशविलास :-
एकइ विग्रह यदि आकारे हय आन।
अनेक प्रकाश हय, 'विलास' तार नाम॥७६॥
अनुवाद—जब भगवान्के द्वारा प्रकाशित विग्रह उनसे भिन्न आकारवाले होते हैं, तो वे
'विलास-विग्रह' कहलाते हैं॥७६॥
अमृतानुकणिका—प्रकाशके समान विलास भी एक ही विभुरूपके अविर्भाव विशेष हैं, तो
भी उनमें यह पार्थक्य है कि प्रकाशमें अङ्ग-सन्निवेश, रूप, गुणादि मूल स्वरूपके तुल्य होता
है, किन्तु विलासमें आकृति और रूपादि मूल स्वरूपसे भिन्न होता है तथा शक्ति आदि भी
मूल स्वरूपसे कुछ कम होती है॥७६॥
लघुभागवतामृतमें तदेकात्मरूपकथन (१/१५)—
स्वरूपमन्याकारं यत्तस्य भाति विलासतः।
प्रायेणात्मसमं शक्त्या स विलासो निगद्यते॥७७॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७७॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णकी अचिन्त्य शक्तिविलाससे जब उनका स्वरूप प्रायः अपने ही
समान अन्य रूपमें प्रकाशित होता है, तो उसे 'विलास' कहा जाता है॥७७॥
अनुभाष्य—तस्य (मूलरूपस्य) यत् स्वरूपं अन्याकारं (विलक्षणाङ्गसन्निवेशं), विलासतः (लीला-विशेषात्)
प्रायेण (कैश्चिद्गुणैरूपाधिकं) आत्मसमं (निजमूलरूपतुल्यं) शक्त्या भाति, स विलासः निगद्यते।
३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत