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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 600

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थे। उनकी धारावाहिक वंशप्रणाली श्रीखण्डमें है।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 175वाँ श्लोक)—
“व्रजाधिकारिणी यासीद्वृन्दा देवी तु नामतः।
सा श्रीमुकुन्ददासोऽद्य खण्डवासः प्रभुप्रियः॥175॥”
“व्रजकी अधिकारिणी वृन्दादेवी अब श्रीमन्महाप्रभुके
प्रिय खण्डग्राम-वासी श्रीमुकुन्द दास हैं।” इनके अति
आश्चर्यमय श्रीकृष्णप्रेमका वर्णन (चैःचः मध्यलीला,
15/113-131)में द्रष्टव्य है।
‘रघुनन्दन’—ये श्रीगौरविग्रहकी सेवा करते थे
(भक्तिरत्नाकर आठवीं तरङ्ग)। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
70वाँ श्लोक)—
“व्यूहस्तृतीयः प्रद्युम्नः प्रियनर्मोसखोऽभवन्।
चक्रे लीलासहायं यो राधा-माधवयोर्व्रजे।
श्रीचैतन्याद्वैततनुः स एव रघुनन्दनः॥70॥”
“व्रजमें जो श्रीकृष्णके प्रियनर्म सखा होकर श्रीराधा-
माधवकी लीलामें सहायता करते थे तथा जो चतुर्व्यूहमें
तृतीय श्रीप्रद्युम्न हैं, वे ही अब श्रीचैतन्यकी अभिन्न
देह-स्वरूप श्रीरघुनन्दन हैं।” भक्तिरत्नाकर ग्रन्थकी नौवीं
तरङ्गमें श्रीखण्डके महोत्सवका विवरण द्रष्टव्य है।
‘नरहरिदास सरकार ठाकुर’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
177वाँ श्लोक)—
“पुरा मधुमती प्राणसखी वृन्दावने स्थिता।
अधुना नरहर्याख्यः सरकारः प्रभोः प्रियः॥177॥
“पहले वृन्दावनमें मधुमती नामक जो प्राणसखी थीं,
वे अब महाप्रभुके प्रियपात्र श्रीनरहरि सरकार हैं।”
झामटपुरके निकट कोग्रामके निवासी श्रीचैतन्यमङ्गलके
प्रणेता श्रीलोचनदास ठाकुर इनके शिष्य हैं। इस ग्रन्थमें
श्रीगदाधर और श्रीनरहरिको महाप्रभुका अत्यन्त प्रिय
बतलाया गया है। चैतन्यभागवतमें खण्डवासिसियोंका उस
प्रकारसे विशेष उल्लेख नहीं मिलता।
‘चिरञ्जीव और सुलोचन’—ये दोनों खण्डवासी थे।
उनका स्थान आज भी श्रीखण्डमें देखा जाता है। इनका
वंश भी अभी विद्यमान है। चिरञ्जीव सेनके दो पुत्र
थे। श्रीनिवासाचार्यके शिष्य और श्रीनरोत्तम ठाकुरके
सङ्गी, श्रीरामचन्द्र कविराज इनके ज्येष्ठ पुत्र थे और
पदकर्त्ता श्रीगोविन्ददास कविराज इनके कनिष्ठ पुत्र थे।
चिरञ्जीवकी पत्नी सुनन्दा और ससुर दामोदर सेन
कविराज खण्डवासी थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 209वाँ
श्लोक)—
“खण्डवासौ नरहरेः साहचर्यान्महत्तरौ।
गौराङ्गैकान्तशरणौ चिरञ्जीव-सुलोचनौ॥209॥”
“खण्डवासी श्रीनरहरिके सङ्ग हेतु श्रीचिरञ्जीव और
सुलोचन महत्तर हैं तथा वे श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके एकान्त
आश्रित हैं॥” 78॥
कुलीनग्रामवासी—(20ख) रामानन्द, (20ग) यदुनाथ,
(20घ) पुरुषोत्तम, (20ङ) शङ्कर, (20च) विद्यानन्द :—
कुलीनग्रामवासी सत्यराज, रामानन्द।
यदुनाथ, पुरुषोत्तम, शङ्कर, विद्यानन्द॥80॥
(20छ) वाणीनाथ बसु आदि कुलीन-
ग्रामवासियोंका माहात्म्य :—
वाणीनाथ बसु आदि यत ग्रामी जन।
सबेइ चैतन्यभृत्य, —चैतन्य-प्राणधन॥81॥
प्रभु कहे, —‘कुलीनग्रामेर ये हय कुक्कुर।
सेइ मोर प्रिय, अन्य जन बहु दूर॥82॥
कुलीनग्रामीर भाग्य कहेन ना याय।
शूकर चराय डोम, सेइ कृष्ण गाय’॥83॥
अनुवाद—श्रीसत्यराज, श्रीरामानन्द, श्रीयदुनाथ,
श्रीपुरुषोत्तम, श्रीशङ्कर, श्रीविद्यानन्द और श्रीवाणीनाथ
बसु आदि कुलीनग्रामके वासी हैं। ये श्रीचैतन्य
महाप्रभुके सेवक हैं और महाप्रभु इनके प्राणधन हैं।
महाप्रभुका कहना है कि औरोंकी बात तो दूर की है,
कुलीनग्रामका कुत्ता भी मुझे प्रिय है। कुलीनग्रामवासियोंके
भाग्यका वर्णन नहीं किया जा सकता, वहाँके सूअर
चरानेवाले डोम भी श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते
हैं॥80-83॥
अनुभाष्य—‘रामानन्द वसु’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
173वाँ श्लोक)—
64 | श्रीचैतन्यचरितामृत