श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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महाप्रभुकी तीन रूपोंमें अवतीर्ण होकर कृपा :-
भक्ते कृपा करेन प्रभु ए तिन स्वरूपे।
'साक्षात्', 'आवेश' आर 'आविर्भाव'-रूपे॥ ५६॥
अनुवाद—भगवान् तीन स्वरूपोंसे अपने भक्तोंपर कृपा करते हैं, 'साक्षात्' रूपसे, 'आवेश' रूपसे और 'आविर्भाव' रूपसे॥ ५६॥
अमृतप्रवाह भाष्य—सभी भक्तोंके समक्ष एक रूपका दर्शन देकर भगवान् 'साक्षात्' कृपा करते हैं, किन्तु श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी देहमें समय-समयपर आविष्ट होते हैं; प्रद्युम्न ब्रह्मचारीकी देहमें श्रीचैतन्यका आविर्भाव होता है॥ ५६॥
अनुभाष्य—'साक्षात्'—स्वयंरूप श्रीगौरसुन्दर; 'आवेश'—नकुल और प्रद्युम्न ब्रह्मचारीमें। 'आविर्भाव'—(चैःचः अन्त्यलीला 2/34-35)—
“शचीर मन्दिरे आर नित्यानन्द-नर्त्तने।
श्रीवास-कीर्त्तने, आर राघव-भवने॥
एइ चारि ठाँइ प्रभुर सदा 'आविर्भाव'।
प्रेमाविष्ट हय प्रभुर सहज स्वभाव॥”
“शची माताके गृहके मन्दिरमें, जहाँ श्रीनित्यानन्द प्रभु नृत्य करते हैं, श्रीवास पण्डितके गृहमें सङ्कीर्त्तनमें और श्रीराघव पण्डितके गृहमें श्रीगौरसुन्दरका सदा आविर्भाव होता है।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 73-74वें श्लोकोंमें)—
“आविर्भावो गौरहरेर्नकुल-ब्रह्मचारिणि॥ 73(ख)॥
आवेशश्च तथा ज्ञेयो मिश्रे प्रद्युम्नसञ्ज्ञके॥ 74(क)॥
“श्रीनकुल ब्रह्मचारीमें श्रीगौरहरिका आविर्भाव और श्रीप्रद्युम्न मिश्रमें उनका आवेश जानना चाहिये॥” 56॥
'साक्षाते' सकल भक्ते देखे निर्विशेष।
नकुल ब्रह्मचारी-देहे प्रभुर 'आवेश'॥ ५७॥
अनुवाद—सभी भक्त अपने समक्ष प्रकट महाप्रभुको जब देखते हैं, तब उसे 'साक्षात्' कहा जाता है। नकुल ब्रह्मचारीके शरीरमें महाप्रभुकी शक्ति-विशेष सञ्चारित होनेपर उसे 'आवेश' कहते हैं॥ ५७॥
अनुभाष्य—प्रत्यक्ष रूपसे सभी भक्तोंको परस्पर वैशिष्ट्य-विहीन अर्थात् एक ही प्रकारके सेवक अथवा अभिन्न रूपमें देखा जाता है, किन्तु नकुल ब्रह्मचारीमें महाप्रभुका आवेश होनेपर उनको श्रीगौरसुन्दरके समान, अन्य सभी भक्तोंसे अधिक अलौकिक ईश्वर-चेष्टायुक्त श्रीकृष्णप्रेममय-रूपमें श्रीशिवानन्द सेन आदि भक्तोंने दर्शन किया।
नकुल ब्रह्मचारीका पूर्व निवास कालनाके निकट 'पियारीगञ्ज' नामक पल्लीमें था। चैःचः अन्त्यलीला 2/3-83 संख्यामें इस प्रसङ्गका उल्लेख है॥ ५७॥
'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' ताँर आगे नाम छिल।
'नृसिंहानन्द' नाम प्रभु पाछे त' राखिल॥ ५८॥
अनुवाद—पहले उनका नाम श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी था, परन्तु बादमें महाप्रभुने उनका नाम 'नृसिंहानन्द' रख दिया॥ ५८॥
अनुभाष्य—चैःचः आदिलीला 10/35 और चैःभाः अन्त्यखण्ड 3रा तथा 8वाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ ५८॥
ताँहाते हइल चैतन्येर 'आविर्भाव'।
अलौकिक ऐछे प्रभुर अनेक स्वभाव॥ ५९॥
अनुवाद—इनकी देहमें श्रीचैतन्यदेवके आविर्भावके लक्षण दिखलायी देते थे। महाप्रभु इस प्रकार अनेक अलौकिक लीलाएँ करते हैं॥ ५९॥
आस्वादिल एसब रस सेन शिवानन्द।
विस्तारि' कहिब आगे एसब आनन्द॥ ६०॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने इन सभी रसों (साक्षात्, आवेश और आविर्भाव) का आस्वादन किया। इन सब आनन्दमयी लीलाओंका आगे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥ ६०॥
दसवाँ अध्याय | 57