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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 56

[ १/३६-४५
श्रीगौरसुन्दरको अनन्त प्रणाम, श्रीअद्वैताचार्य और श्रीशिक्षागुरुको कोटि प्रणाम, शक्ति और
भक्ततत्त्वको हजारों प्रणाममें संख्यानुसार भेद दिखनेपर भी इनके प्रति ग्रन्थकारकी मायिक
भेदबुद्धि उद्दिष्ट नहीं हुई है॥३६-४२॥
सावरणे प्रभुरे करिया नमस्कार।
एइ छय तैंहों यैछे—करिये विचार॥४३॥
अनुवाद—निज-पार्षदरूपी आवरणसहित भगवान्‌को प्रणामकर उनमें ही अन्तर्हित पूर्वोक्त
छह तत्त्वोंकी मैं विशेषरूपसे विवेचना कर रहा हूँ॥४३॥
अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान्‌के चारों ओर विराजमान भक्त उनके आवरण हैं। आवरण
सहित उन भगवान्‌को मैंने नमस्कार किया है। ये छह तत्त्व—गुरु, ईशभक्त, ईशावतार,
ईशप्रकाश, ईशशक्ति और ईशस्वरूप श्रीकृष्णचैतन्य, इनका जैसा स्वरूप है, अब उसका विचार
करता हूँ॥४३॥
गुरुतत्त्व :- (१) दीक्षागुरु-
यद्यपि आमार गुरु—चैतन्येर दास।
तथापि जानिये आमि ताँहार प्रकाश॥४४॥
अनुवाद—यद्यपि मेरे गुरुदेव श्रीचैतन्य महाप्रभुके दास हैं, तथापि मैं उन्हें महाप्रभुका प्रकाश
ही मानता हूँ॥४४॥
अमृतप्रवाह भाष्य—यद्यपि सभी जीव ही श्रीकृष्णके दास हैं, इसलिये मेरे गुरु भी वास्तवमें
श्रीकृष्णदास हैं, तथापि मैं अपने गुरुको श्रीकृष्णका प्रकाश मानता हूँ। शिष्यके लिये गुरुदेव
श्रीकृष्णके प्रकाशस्वरूप होते हैं, किन्तु श्रीनित्यानन्द-श्रीबलदेव प्रभु ही वास्तवमें श्रीकृष्णके
विलासस्वरूप प्रकाशतत्त्व हैं॥४४॥
गुरु कृष्णरूप हन शास्त्रेर प्रमाणे।
गुरुरूपे कृष्ण कृपा करेन भक्तगणे॥४५॥
अनुवाद—शास्त्रोंमें यह प्रमाणित है कि श्रीगुरुदेव श्रीकृष्णका ही रूप (प्रकाश) होते हैं और
गुरुके रूपमें ही श्रीकृष्ण भक्तोंपर कृपा करते हैं॥४५॥
अनुभाष्य—दो प्रकारके गुरु, भक्त, ईश्वर, ईश्वरावतार, ईश्वर-प्रकाश और शक्ति—इन छह
तत्त्वोंके रूपमें ही श्रीकृष्णचैतन्यदेवका विलास है और अचिन्त्यभेदाभेद विचारसे अद्वयज्ञान
तत्त्वको श्रीकृष्णचैतन्यके नामसे कहा जाता है।
सभी श्रीचैतन्य महाप्रभुके दास हैं, इसलिये श्रीगुरुदेवमें भी चैतन्यदासके अतिरिक्त अन्य कोई
प्रकाश होनेकी सम्भावना नहीं है। वे आश्रय-विग्रह हैं, इसलिये सेवक हैं। सेवाप्रकाश-विग्रह
अर्थात् भगवान्‌की सेवा-परिपाटीकी शिक्षा देनेवाले (प्रकाश करनेवाले) श्रीगुरुदेव सेव्य-भगवान्‌के
सेवकके अतिरिक्त किसी अन्य प्रकारसे प्रकाशित नहीं होते हैं। प्रकाश-विग्रह गुरुदेवमें
विषय-विग्रहकी बुद्धिका अवकाश नहीं है अर्थात् गुरुको विषय-विग्रह श्रीकृष्ण नहीं समझना
चाहिये। आश्रय-विग्रह होनेके कारण (दीक्षा) गुरुदेवको शास्त्रोंमें श्रीकृष्णरूप कहा गया
है॥३७-४५॥
१४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत