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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 405

६/७६-७९ ]
११) शेषरूपी अनन्तका दस देहोंसे श्रीकृष्णदास्य :-
सहस्रवदने यँहो शेष-सङ्कर्षण।
दश देह धरि' करे कृष्णेर सेवन ॥७६॥
अनुवाद—हजारों मुखोंवाले शेष, जिन्हें सङ्कर्षण भी कहते हैं, वे दस रूप धारणकर
श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं॥७६॥
अमृतप्रवाह भाष्य—छत्र, पादुका, शय्या, तकिया, वस्त्र, आभूषण, आराम, आवास, यज्ञसूत्र
और सिंहासन—ये दस प्रकारके शरीर हैं॥७६॥
१२) शिवका श्रीकृष्णदास्य :-
अनन्त ब्रह्माण्डे रुद्र-सदाशिवेर अंश।
गुणावतार तैंहो, सर्वदेव-अवतंस ॥७७॥
तैंहो करेन कृष्णेर दास्य-प्रत्याश।
निरन्तर कहे शिव, 'मुञि कृष्णदास' ॥७८॥
कृष्णप्रेमे उन्मत्त, विह्वल दिगम्बर।
कृष्ण-गुण-लीला गाय, नाचे निरन्तर ॥७९॥
अनुवाद—अनन्त ब्रह्माण्डोंमें विराजमान जो रुद्र हैं, वे सभी सदाशिवके अंश हैं। वे
गुणावतार और सभी देवोंके शिरोमणि हैं। वे भी श्रीकृष्णदास्यकी अभिलाषा रखते हैं और
सदा कहते हैं—'मैं श्रीकृष्णका दास हूँ।' वे श्रीकृष्णप्रेममें उन्मत्त और विह्वल होकर दिगम्बर
वेशमें श्रीकृष्णके गुण और लीलाओंका निरन्तर गान करते हुए नाचते रहते हैं॥७७-७९॥
अनुभाष्य—(रुद्र और सदाशिव)—लघुभागवतामृतमें गुणावतार वर्णनप्रसङ्गमें (१८-२४)
श्लोक। रुद्र—
“एकादशव्यूहस्तथाष्टतनुरप्यसौ। प्रायः पञ्चाननस्त्र्यक्षो दशबाहुरुदीर्यते॥ क्वचिज्जीवविशेषत्वं हरस्योक्तं
विधेरिव। तत्तु शेषवदेवास्तां तदंशत्वेन कीर्त्तनात्॥ हरः पुरुषधामत्वान्निर्गुणप्राय एव सः। विकारवानिह तमियोगात्
सर्वैः प्रतीयते॥”
यथा श्रीदशमे (१०/८८/३)—
“शिवः शक्तियुतः शश्वत् त्रिलिङ्गो गुणसंवृत॥”
यथा ब्रह्मसंहितायां (५/४५)—
“क्षीरं यथा दधि विकारविशेषयोगात्,
सञ्जायते न तु ततः पृथगस्ति हेतोः।
यः शम्भुतामपि तथा समुपैति कार्याद्,
गोविन्दमादि पुरुषं तमहं भजामि॥”
“विधेर्ललाटाज्जन्मास्य कदाचित् कमलापतेः।
कालाग्निरुद्रः कल्पान्ते भवेत् सङ्कर्षणादपि॥
सदाशिवाख्या तन्मूर्त्तिस्तमोगन्धविवर्जिता।
सर्वकारणभूतासावङ्गभूता स्वयं प्रभोः।
वायव्यादिषु सैवेयं शिवलोके प्रदर्शिता॥”
तथा च ब्रह्मसंहितायाम् आदिशिव-कथने—(५/८)—
छठा अध्याय | ३६३