श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ६/६७-७०
सनन्दन-विदग्धादीन्) च किं स्मरति? क्वचित् (कदाचित्) अपि किङ्करीणां (ललिता-विशाखा चित्रा-चम्पकलता-
तुङ्गविद्येन्दुलेखा-रङ्गदेवी-सुदेवी-कलावती-शुभाङ्गदा-हिरण्याङ्गी-रत्नलेखा-शिखावती-कन्दर्पमञ्जरी-पुण्डरीका-
फुल्लकलिकानङ्गमञ्जरी-सीताखण्डी-चारुचण्डी-सदण्डिका-कुण्ठिता-कलकण्ठी-वामची-मेचका-हरिद्राभा-
हरिच्चेला-वितण्डिका-लीलावती-साधिका-चन्द्रिका-माधवी-विजया-नन्दा-गौरी-सुधामुखी-वृन्दा-कौमुदी-रत्नभवा-
रत्नप्रभादि-दासीनां) नः (अस्माकं श्रीमतीवृषभानुकुमारीणां गान्धर्विकानां) कथां सः गृणीते (किं स्वमुखेनोच्चारयति?)
कदा नु अगुरुसुगन्धं (अगुरुः सकाशादपि सुष्ठुगन्धं यस्य तादृशं) भुजं (स्वभुजं) मूर्ध्नि अधास्यत् (निधास्यति)?
श्लोक-भावानुवाद-हे सौम्य ! आजकल आर्यपुत्र (श्रीनन्दनन्दन) क्या मथुरापुरीमें सुखपूर्वक
निवास कर रहे हैं? क्या वे अपने पिता-माताके साथ अपने गृहको और अपने
बन्धुओं-पर्जन्यबाबा, उपनन्द, अभिनन्द, सत्रन्द, नन्दन, रोहिणी, सानन्द, आनन्दिनी, कण्डव,
दण्डवादि तथा अपने गोपसखाओं-सुबल, अर्जुन, गन्धर्व, वसन्त, श्रीदाम, सुदाम, उज्ज्वल,
कोकिल, सनन्दन, विदग्धादिको स्मरण करते हैं? कभी भी वे अपनी दासियों-ललिता,
विशाखा, चित्रा, चम्पकलता, तुङ्गविद्या, इन्दुलेखा, रङ्गदेवी, सुदेवी, कलावती, शुभाङ्गदा,
हिरण्याङ्गी, रत्नलेखा, शिखावती, कन्दर्पमञ्जरी, फुल्लकल्लिका, अनङ्गमञ्जरी, पुण्डरीका,
सीताखण्डी, चारुचण्डी, सदण्डिका, कुण्ठिता, कलकण्ठी, वामची, मेचका, हरिद्राभा, हरिच्चेला,
वितण्डिका, लीलावती, साधिका, चन्द्रिका, माधवी, विजया, नन्दा, गौरी, सुधामुखी, वृन्दा,
कौमुदी, रत्नभवा, रत्नप्रभादि और मेरी चर्चा कभी अपने मुखकमलसे करते हैं? क्या वे कभी
अपने अगुरु जैसे सुगन्धित हस्तकमल हमारे मस्तकपर रखेंगे? ॥६७॥
(८) यहाँ तक कि, साक्षात् श्रीराधाका भी श्रीकृष्णदास्य :-
ताँ-सबार कथा रहु, - श्रीमती राधिका।
सबा हैते सकलांशे परम-अधिका ॥ ६८ ॥
तेँहो याँर दासी हैञा सेवेन चरण।
याँर प्रेमगुणे कृष्ण बद्ध अनुक्षण ॥ ६९ ॥
अनुवाद-अन्य सबकी बातें रहने दो, श्रीमती राधिका, जो सभी गोपियोंमें सब प्रकारसे
सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनके प्रेम और गुणोंसे श्रीकृष्ण सदा-सर्वदा बँधे हुए हैं, वे भी प्रेमके अद्भुत
स्वभाववशतः श्रीकृष्णकी दासी होकर उनके चरणोंकी सेवा करती हैं ॥ ६८-६९ ॥
श्रीमद्भागवत (१०/३०/४०)-
हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज।
दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम् ॥ ७० ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ७० ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हा नाथ! हा रमण! हा प्रियतम! हा महाबाहो! मैं आपकी अतिदीना
दासी हूँ, मुझे अपने समीप ले लो ॥ ७० ॥
अनुभाष्य-रासक्रीड़ाके समय अन्य गोपियोंका परित्यागकर श्रीकृष्ण केवल श्रीमती राधिकाके
साथ अन्तर्धान हो गये। दूसरी गोपियाँको श्रीकृष्ण-विरहमें विलाप करते हुए देखकर अभिमान
प्रदर्शित करते हुए श्रीमती राधिकाने आदेश दिया कि मैं अब और नहीं चल सकती हूँ,
३६० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत