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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 306

[ ५/३२-३५
ब्रह्मधामका दृष्टान्त :-
सूर्य्यमण्डल येन बाहिरे निर्विशेष।
भितरे सूर्य्येर रथ-आदि सविशेष ॥ ३४॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ३२-३४॥
अमृतप्रवाह भाष्य-['वैकुण्ठ'-शब्दसे 'कृष्णधाम' और 'परव्योम'को समझना चाहिये]। उस
परव्योमके बाहर श्रीकृष्णकी अङ्गप्रभाका विस्तार एक ज्योतिर्मय मण्डल बनाता है। उसे
'सिद्धलोक', 'ब्रह्मलोक' आदि कहते हैं। ब्रह्मसायुज्यमुक्तिका वह एकमात्र स्थान है। वह धाम
चित्स्वरूप तो है, परन्तु वहाँ चित्-शक्तिगत विकार अर्थात् विचित्रता नहीं है। सूर्य्यमण्डल जैसे
बाहरसे निर्विशेष अर्थात् विचित्रतारहित ज्योतिर्मय मात्र है, किन्तु मण्डलके भीतर सूर्य्यके रथादि
सविशेष अर्थात् अनेक विचित्रताएँ दिखायी देती हैं, उसी प्रकार ब्रह्मज्योतिके भीतर वैकुण्ठ
सविशेष और विचित्रायुक्त है। सूर्य्यमण्डलके बाहरका अंश ब्रह्मधामके सदृश है॥ ३२-३४॥
श्रीमद्भागवत (७/१/२९)
कामाद्द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः।
आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः॥ ३५॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ३५॥
अमृतप्रवाह भाष्य-“बहुत लोगोंने ही भक्तिके समान काम, द्वेष, भय और स्नेहसे अपने
मनको आविष्ट करके पापोंका त्याग करते हुए उस गतिको प्राप्त किया है।”
अन्य किसी-किसी संस्करणमें यह अतिरिक्त श्लोक (भाः ७/१/३०) भी मिलता है-
“कामाद्गोप्या भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः।
सम्बन्धाद्वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो॥”
अर्थात् [नारदजीने युधिष्ठिर महाराजसे कहा]-“गोपियोंने काम (प्रेम) से, कंसादिने भयसे,
शिशुपाल-दन्तवक्रादि राजाओंने द्वेषसे, यदुवंशियोंने स्नेहयुक्त पारिवारिक सम्बन्धसे, तुम लोगोंने
स्नेहसे और हम लोगोंने भक्तिसे अपने मनको भगवान्में लगाया है।”॥ ३५॥
अनुभाष्य-शिशुपाल श्रीकृष्णविद्वेषी होनेपर भी क्यों सायुज्य-मुक्तिके योग्य बना? धर्मराज
युधिष्ठिरके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीनारदने कहा, -
यथा [विहितया] भक्त्या (सेवनेन) ईश्वरे मनः आवेश्य [तद्गतिं गच्छन्ति], तथा कामाद् [यथा गोप्यः],
द्वेषात् [यथा दन्तवक्र-शिशुपालादयः], भयात् [यथा कंसाद्याः], स्नेहात् [यथा पाण्डवाः] [एतादृशः] बहवः तदघं
(कामादिनिमित्तं पापं) हित्वा तद्गतिं (मोक्षप्रकारभेदं) गताः (प्राप्ताः)।
श्लोक-भावानुवाद-बहुत लोगोंने भक्तिके समान काम (जैसे गोपियोंने), द्वेष (जैसे दन्तवक्र,
शिशुपालादिने), भय (जैसे कंसादिने) और स्नेहसे अपने मनको आविष्ट करके (जैसे आप
पाण्डवोंने) पापोंका त्याग करते हुए उस (मुक्तिके भेदसे भिन्न-भिन्न) गतिको प्राप्त किया है।
श्रीमद्भागवत सातवें-स्कन्धमें युधिष्ठिर महाराजके प्रश्न और श्रीनारदके उत्तरके प्रसङ्गमें
७/१/२२-४६ और ७/३/३०, ३२, ३४ श्लोकोंकी गौड़ीयभाष्यके तथ्यमें विभिन्न टीकाएँ द्रष्टव्य
हैं॥ ३५॥
२६४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत