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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 302

[ ५/२२-२५
कामधेनुओंका पालन करनेवाले अर्थात् गोपोचित परिचर्या करनेवाले और लाखों लक्ष्मियों
(गोपियों) के द्वारा सम्भ्रम भावसे सेवित आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥२२॥
आदि चतुर्व्यूह :-
मथुरा-द्वारकाय निजरूप प्रकाशिया।
नानारूपे विलसये चतुर्व्यूह हैञा॥२३॥
सभी चतुर्व्यूहोंके अंशी :-
वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्ध।
सर्वचतुर्व्यूह-अंशी, तुरीय, विशुद्ध॥२४॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२३-२४॥
अमृतप्रवाह भाष्य-उस कृष्णधामके मथुरा और द्वारका प्रकोष्ठमें श्रीकृष्ण, वासुदेव-सङ्कर्षण-
प्रद्युम्न-अनिरुद्ध-इस आदि-चतुर्व्यूहको प्रकाशितकर अनेक प्रकारसे विलास करते हैं। द्वारकामें
जो चतुर्व्यूह है, वह अन्य सभी चतुर्व्यूहोंका अंशी है और विशुद्ध-चिन्मय है॥२३-२४॥
अमृतानुकणिका-'वासुदेव'-देवकी-वसुदेवके पुत्र; ये द्वारका-चतुर्व्यूहके प्रथमव्यूह और
व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णके प्रकाशरूप हैं। व्रजेन्द्रनन्दन द्विभुज हैं और उनका गोपवेश एवं
गोप-अभिमान है। वासुदेव कभी द्विभुज और कभी चतुर्भुज होते हैं; उनका क्षत्रिय वेश एवं
क्षत्रिय अभिमान है। 'सङ्कर्षण'-श्रीबलराम जिस स्वरूपमें द्वारका-मथुरामें लीला करते हैं, उसे
सङ्कर्षण कहते हैं; देवकीके गर्भसे आकर्षणकर रोहिणीके गर्भमें स्थापित होनेके कारण उनको
सङ्कर्षण कहते हैं। ये द्वारका-चतुर्व्यूहके द्वितीय व्यूह हैं। जो श्रीबलराम स्वयंरूपमें स्वयंरूप
श्रीकृष्णकी लीलामें सहायता करते हैं, वही श्रीबलराम ही सङ्कर्षण रूपमें द्वारका-मथुरामें
वासुदेवकी लीलामें सहायक हैं। वासुदेवको श्रीकृष्ण भी कहा जाता है, उसी प्रकार सङ्कर्षणको
बलराम भी कहा जाता है। वर्ण और अङ्ग-सन्निवेशमें व्रजविलासी बलराम और द्वारका-मथुरा-विलासी
सङ्कर्षणमें कोई पार्थक्य नहीं है-दोनों ही द्विभुज और श्वेत वर्ण हैं, किन्तु उनके भावोंका
पार्थक्य है-व्रजमें उनका गोपभाव और द्वारका-मथुरामें क्षत्रियभाव है। अप्रकटलीलामें गोकुल,
मथुरा और द्वारका, इन तीन धामोंमें श्रीकृष्ण और श्रीबलरामके पृथक् पृथक् विग्रह नित्य
विराजमान होते हैं, किन्तु प्रकटलीलामें, एक धाममें जब वे लीला करते हैं, तब अन्य धामोंमें
कोई भी प्रकटरूप नहीं होता है। 'प्रद्युम्न'-श्रीरुक्मिणी देवीके गर्भजात श्रीकृष्णके पुत्र हैं।
श्रीकृष्ण ही आश्रयरूपमें वात्सल्यरस आस्वादनके निमित्त प्रद्युम्न नामसे निज-पुत्र-अभिमानसे
नित्य द्वारका लीला करते हैं। इसलिये श्रीप्रद्युम्न श्रीकृष्णके आविर्भाव-विशेष हैं, ये
द्वारका-चतुर्व्यूहके तृतीय व्यूह हैं। 'अनिरुद्ध'-ये श्रीकृष्णके पौत्र हैं, रुक्मीकी कन्या रुक्मवतीके
गर्भसे प्रद्युम्नके पुत्र हैं। प्रद्युम्नके समान ये भी श्रीकृष्णके ही आविर्भाव-विशेष हैं; ये
द्वारका-चतुर्व्यूहके चतुर्थ व्यूह हैं॥२३-२४॥
गोकुल, मथुरा और द्वारकामें द्विभुजरूपमें लीला :-
एइ तिन लोके कृष्ण केवल लीलामय।
निजगण लञा खेले अनन्त समय॥२५॥
२६० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत