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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

निवेदन
श्रीचैतन्यदेवके पार्षदगण ही श्रीचैतन्यदेवके समस्त तत्त्वों और लीला-तात्पर्य वर्णनके सभी
प्रकारसे संरक्षणकारी हैं। श्रीमुरारी गुप्त, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरूप गोस्वामी,
श्रीजीव गोस्वामी, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती, श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी, श्रीरघुनाथदास
गोस्वामी, श्रीवृन्दावनदास ठाकुर, कविकर्णपूर, श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी आदि गौरपार्षदोंकी
रचनाएँ ही सभी विद्वानोंके निकट प्रमाणिक रूपमें समादृत हैं। उनमेंसे श्रीमुरारि गुप्तके कड़चा
'श्रीचैतन्यचरित' में श्रीचैतन्यदेवकी विशेषतः नवद्वीपमें अवस्थान-कालीन लीलाएँ और श्रीस्वरूप
दामोदर प्रभुके कड़चामें विशेषतः उनके संन्यास-ग्रहणके बादकी लीलाएँ व्यक्त हुई हैं। मूलतः
ये दोनों कड़चा ही परवर्ती कालमें श्रीचैतन्यलीलाका वर्णन करनेवालोंके लिये दिग्दर्शी रूपमें
आधार हुए हैं।
श्रीचैतन्यदेवके परम प्रणयी भक्त शिवानन्द सेनके पुत्र श्रीचैतन्यदासने १४६४ शकमें अर्थात्
महाप्रभुके अन्तर्धान होनेके नौ वर्षके बाद 'श्रीकृष्णचैतन्यचरितामृत-काव्यम्' की रचना की।
किसीके मतानुसार उक्त ग्रन्थ उनके छोटे भ्राता 'कविकर्णपूर'के द्वारा ही रचित है। १४९४
शकाब्दमें कविकर्णपूरने 'श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटकम्' की रचना समाप्त की। श्रीकृष्णदास
कविराज गोस्वामीने अपने श्रीचैतन्यचरितामृत रचनाकालमें अनेकांशोंमें उस नाटकका ही
अनुसरण किया है और प्रमाणरूपमें अनेक श्लोक उनके ग्रन्थसे उद्धृत किये हैं। उक्त नाटकके
चार वर्ष बाद श्रीकर्णपूरने 'गौरगणोद्देश-दीपिका' की रचना की। उनके ये सब ग्रन्थ
श्रीचैतन्यदेवके सम्बन्धमें अमल-प्रमाण भास्कर रूपमें गौड़ीय-गगनमें चिर उदित हुए हैं।
श्रीषड्गोस्वामियोंमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामी ही एकमात्र सुदीर्घ सोलह वर्ष श्रीस्वरूप दामोदर
प्रभुके आनुगत्यमें महाप्रभुके अन्तर्धान होनेतक उनकी विभिन्न अन्तरङ्ग सेवाओंमें नियुक्त होकर
उनकी अन्त्यलीलाके साक्षीस्वरूप हुए। “सेकाले ए दुइ रहेन महाप्रभुर पाशे। आर सब
कड़चा-कर्त्ता रहेन दूरदेशे॥” (अन्त्य १४/८)। श्रीदासगोस्वामी रचित 'स्तवावली' में
'श्रीगौराङ्ग-स्तवकल्पतरुः' आदि स्तोत्रोंमें श्रीचैतन्यदेवकी महिमा और अन्त्यलीलाकी विभिन्न
प्रकारकी अभिव्यक्ति देखी जाती है। 'स्वरूपेर रघु'-नामसे सुपरिचित श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके
निकट ही मूलतः 'श्रीस्वरूप-दामोदर-कड़चा' संरक्षित हुआ। परवर्तीकालमें श्रील दास
गोस्वामीके शिक्षागर्भमें लालित-पालित श्रीकृष्णदास कविराज प्रभु ही उसके धारक और वाहक
हुए। वस्तुतः श्रील कविराज गोस्वामीने श्रील स्वरूप दामोदर प्रभुके कड़चा और श्रील दास
गोस्वामीकी उक्त कड़चाकी व्याख्या और उनके श्रीमुखसे सुनी श्रीचैतन्यलीलाके आधारपर ही
'श्रीचैतन्यचरितामृत'-ग्रन्थका प्रणयन किया। “चैतन्यलीला-रत्न-सार, स्वरूपेर भाण्डार, तें हो
थुइला रघुनाथेर कण्ठे। ताँहा किछु ये शुनिलुँ, ताहा इहा विस्तारिलुँ, भक्तगणे दिलुँ एइ भेटे॥”
(मध्य २/८४)। “स्वरूप- 'सूत्रकर्त्ता', रघुनाथ- 'वृत्तिकार' । तार बाहुल्य वर्णि पाँजि-टीका-व्यवहार ॥”
(अन्त्य १४/१०)।
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