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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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516 | श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला | देखि-पाद ]


[स्तम्भ १]

देखि' त्रास उपजिल सब २/१४४
देखेन, एक जालिया आइसे १८/४४
देखे, शीघ्र आसि' बसिला २/६२
देखे, —हरिदास-ठाकुर ११/१७
देखौं, —यदि कृष्ण करेन १४/१०६
देहत्यागादि तमो-धर्म ४/६०
देहत्यागादि यत, सब ४/५७
देहत्यागे कृष्ण ना पाइ ४/५६
देह' देह' बलि' प्रभु ११/८८
देह-देहि-भेद ईश्वरे कैले ५/१२१
देहमात्र धन तोमाय कैलुँ १२/७४
देहेर स्वभावे करेन स्नान १४/३९
दैन्य-वैराग्य-पाण्डित्येर १/२०१
द्वादश वत्सर ऐछे दशा २०/६९
द्वार चाहि' फिरि' शीघ्र १९/६३
द्वार-माना, हरिदास दुःखी २/११४
द्वारे बसि' शुन तुम नाम ३/२४०
'द्वैते' भद्राभद्र-ज्ञान, सब ४/१७६

ध

धन, जन नाहि मागों २०/३०
धर्म छाड़ाय वेणुद्वारे, हाने १७/३६
धाञा यायेन प्रभु, स्त्री १३/८३
ध्याने तबे प्रभु महाप्रभुरे ६/७७

न

नयने देखिमु तोमार चाँद ११/३३
ना कहिले हय मोर २०/१००
ना गणि आपन दुःख, सबे २०/५२
नाटक-लक्षण सब, सिद्धान्तेरे १/१९३
'नाटकालाङ्कार'-ज्ञान नाहिक ५/१०४
नाना-भाव-चन्द्रोदये हयेन २०/६६
नाना-रोगग्रस्त, —चलिते बसिते २०/९४


[स्तम्भ २]

नाम-प्रेम आस्वादिला मनुष्ये ३/२६२
नामसङ्कीर्त्तन—कलौ परम २०/८
नामसङ्कीर्त्तने हय सर्वानर्थ २०/११
नाम समाप्त हैले करिमु ३/२४०
ना मानिले दुःखी हइबेक ६/२७६
नामाभास हैते हय संसाररे ३/६१
नामाभास हैते हय सर्वपाप ३/६१
नामाभासे 'मुक्ति' हय सर्वशास्त्रे ३/६४
नामेर अक्षर-सबेर एइ त' ३/५९
नामेर फले कृष्णपदे प्रेम ३/१७७, ७/१०४
नामेर महिमा यँह करिला ११/९९
नामेर माधुरी ऐछे काँहा १/१०१
नामेर सहित प्राण करिला ११/५६
नारद-प्रह्लादादि आसे मनुष्य ३/२६१
नारायण-हृदि स्थिति, तबु २०/६०
निकटे ना आइस, चोरा ६/५०
निगूढ़ चैतन्यलीला बुझिते ७/१६५
निज-कृपागुणे प्रभु बान्धिला १२/८३
निज-देहे ये कार्य ना ४/९५
निज-भक्ते दण्ड करेन २/१४३
निज-सुखे माने लाभ २०/५५
नित्यसिद्ध सेइ, प्राय-सिद्ध ५/५०
नित्यानन्द-कृपापात्र-वृन्दावन २०/८२
नित्यानन्दप्रभु भोके व्याकुल १२/१९
नित्यानन्दे आज्ञा दिलुँ गौड़ेते १२/६९
नित्यानन्दे कहिला, —'तुमि ना १२/८१
नित्यानन्देर नृत्य देखेन आसि' २/८०
नित्यानन्देर नृत्य, —येन ताँहार ६/१०४
निवेदन-प्रभावेह तबु फले ९/११४
निरन्तर नाम कर तुलसी ३/१३६
निरपराधे नाम लैले पाय ४/७१
'निरपेक्ष' नहिले 'धर्म' ना ३/२३
निर्विकार देह-मन-काष्ठ-पाषाण ५/४१


[स्तम्भ ३]

'निर्विघ्ने चैतन्य पाउँ'—कर ६/१३३
निर्विण्ण हइनु, मोते 'विषय' ९/१३९
निषेधिह इँहारे, —येन ना करे ४/८८
निष्किञ्चन भक्त खाड़ा हय ६/२१७
निस्तारेर हेतु तां'र त्रिविध २/३
नीचजाति नहे कृष्णभजने ४/६६
नीच-शूद्र-द्वारा करेन धर्मेर ५/८४
नेत्रजले सेइ शिला भिजे ६/२९२

प

पञ्चगुणे करे पञ्चेन्द्रिय आकर्षण १५/८
पञ्चरोग-पीड़ा-व्याकुल, रात्रि २०/९४
पड़ियाछौं भवार्णवे मायाबद्ध २०/३३
पण्डित कहे, —'ये खाइबे १२/१३४
पण्डित हञा मने केने ३/१५
पण्डिते ना बुझे तार १९/१०८
पण्डितेर भाव-मुद्रा कहन ७/१५९
पण्डितेह तार चेष्टा बुझिते १९/१०४
पतिव्रता हञा पतिर नाम ७/१००
पतिर आज्ञा, —निरन्तर ताँर ७/१०३
पतिर आज्ञा पतिव्रता ना ७/१०३
पथे याइते तैलगन्ध मोर १२/११४
पथे सिञ्जे बाड़ी' हय, फुटिया १३/८१
परविधि 'निन्दा' करे 'बलिष्ठ' ८/७७
परम दुर्लभ एइ कृष्णाधरामृत १६/१३५
परमार्थ याय, आर हय रसेर ६/२२५
परमार्थे प्रभुर कृपा, सेह ९/१०८
परेर द्रव्य तुमि केने चाह ४/७७
परेर स्थाप्य द्रव्य केह ना ४/८८
पाइनु वृन्दावननाथ, पुन: १४/३७
पात्रा कृष्णेर लीला देखिते १४/१०५
पाँचगण्डार पात्र हय संन्यासी ९/४०
पाद-सम्वाहन कैल, कटि-पृष्ठ १०/९०