श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2500, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/29-35 बीसवाँ अध्याय 483
अथवा सुन्दर कविताकी कामना नहीं करता हूँ; मैं
मनमें यही कामना करता हूँ कि जन्म-जन्ममें आपमें
ही मेरी अहैतुकी भक्ति हो॥ 29 ॥
अनुभाष्य-
हे जगदीश, (जगन्नाथ,) अहं धनं न, जनं न, सुन्दरीं
कवितां वा (इत्यादि कैतवात्मक त्रिवर्गमूलं कर्म) न कामये
(न प्रार्थये किन्तु) मम जन्मनि जन्मनि (अतः अपौनर्भवरूपं
ज्ञानमपि न कामये, अपि तु) त्वयि (अधोक्षजे) अहैतुकी
(निष्कामा व्यवधानरहिता) भक्तिः भवतात् (भूयात्, - अहं
धर्मार्थकामात्मिकां भुक्तिं भवबन्धमोचनात्मिकां मुक्तिं न प्रार्थये,
केवलां शुद्धामेव सेवां त्वच्चरणे अहं याचे इत्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद-हे जगन्नाथ! मैं धन, जन
अथवा सुन्दर कवितादि छलनेवाले त्रिवर्गमूलक कर्मोंकी
कामना नहीं करता हूँ, किन्तु मैं जन्म-जन्ममें (अर्थात्
मोक्षरूपी ज्ञानकी भी कामना नहीं करता) आप
अधोक्षजमें मेरी अहैतुकी (निष्काम निरन्तर) भक्ति हो
(मैं धर्म-अर्थ-कामवाली भुक्ति और भवबन्धनका मोचन
करनेवाली मुक्तिकी भी इच्छा नहीं करता, केवल
आपके चरणकमलोंमें शुद्धभक्ति (सेवा) की याचना
करता हूँ, यही अर्थ है) ॥ 29 ॥
श्लोकार्थ-व्याख्या :-
धन, जन नाहि मागौँ कविता सुन्दरी।
'शुद्धभक्ति' देह' मोरे, कृष्ण कृपा करि'॥"30॥
दीनता और श्रीकृष्णसेवा-प्रवृत्तिका अटूट संयोग :-
अति दैन्ये पुनः मागे दास्यभक्ति-दान।
आपनारे करे संसारी जीव-अभिमान॥ 31 ॥
अनुवाद-स्वयंभगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु अपनेको
संसारी जीव मानते हुए श्रीकृष्णसे प्रार्थना करते हैं-मैं
आपसे धन, जन और सुन्दरी कविता नहीं चाहता।
मुझे तो आप अहैतुकी कृपा करके केवल अपनी
शुद्धभक्ति ही प्रदान करें। मैं पुनः-पुनः दीनतापूर्वक
श्रीचरणोंमें दास्यभक्तिका दान ही माँगता हूँ॥ 30-31 ॥
साधककी अपने स्वरूपमें चिद्विलासी
अधोक्षजसे कृपा-याचना :-
(पद्यावलीके 13वें अंकमें उद्धृत
शिक्षाष्टकका पाँचवाँ श्लोक)-
“अयि नन्दतनुज किङ्करं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ।
कृपया तव पादपङ्कजस्थितधूलीसदृशं विचिन्त्य ॥ 32 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 32 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-ओहे [सेवानन्दलीलारसविग्रह],
नन्दनन्दन, मैं आपका नित्यदास होकर भी अपने
दुष्कर्मोंके फलस्वरूप विषम भवसागरमें पड़ा हुआ हूँ,
आप कृपा करके मुझे अपने चरणकमलोंमें स्थित
धूलिके [क्रय किये निज नित्यदासके] समान मानिये॥ 32 ॥
अनुभाष्य-
अयि नन्दतनुज, (सेवानन्दलीलारसविग्रह व्रजेन्द्रसुत) विषमे
भवाम्बुधौ (संसार-समुद्रे) पतितं किङ्करं कृपया (अनुकम्पया)
तव पादपङ्कजस्थितधूलीसदृशं (पादः एव पङ्कजं पद्मं तस्मिन्
स्थिता अधिष्ठिता संलग्ना या धूली तस्याः सदृशं निजचिर-
क्रीतदासमेव) मां विचिन्त्य (भावय)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 32 ॥
श्लोकके अर्थकी व्याख्या :-
तोमार नित्य दास मुइ, तोमा पासरिया।
पड़ियाछौँ भवार्णवे मायाबद्ध हञा ॥ 33 ॥
कृपा करि' कर मोरे पदधूली-सम।
तोमार सेवक, करों तोमार सेवन ॥"34 ॥
अनुवाद-प्रभो! मैं आपका नित्यदास हूँ। आपको
भुलाकर मैं मायाबद्ध होकर अथाह भवसागरमें पड़ा हूँ।
आप कृपा करके मुझे श्रीचरणकमलकी धूलिके रूपमें
ग्रहण करें। मैं आपका सेवक बनकर नित्यकाल
आपकी सेवा करूँगा ॥ "33-34 ॥
नामसङ्कीर्तनमें सिद्धि-प्रार्थना :-
पुनः अति उत्कण्ठा, दैन्य हइल उद्गम।
कृष्ण-ठाञि मागे प्रेम-नामसङ्कीर्त्तन ॥ 35 ॥