श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें478 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/17-21 ]
सर्वसिद्धि होती है। अहो, श्रीकृष्णने अपने उन नामोंमें
अपनी सारी शक्तियोंको भर दिया है। किन्तु मेरा
दुर्भाग्य है कि ऐसे श्रीकृष्णनाममें मेरा तनिक भी
अनुराग नहीं है॥ 17-19 ॥
प्रेमप्राप्तिके लिये नामकीर्तनके लक्षणोंका वर्णन :-
येरूपे लइले नाम, प्रेम उपजाय।
तार लक्षण-श्लोक शुन, स्वरूप-रामराय ॥ 20 ॥
अनुवाद - 'हे स्वरूप ! हे रामराय ! जिस प्रकारसे
नाम ग्रहण करनेसे प्रेम उत्पन्न होता है, उसके
लक्षणोंको इस श्लोकमें सुनो ॥ 20 ॥
साध्यनाम-प्रेमको प्राप्त करनेके लिये नामसाधनकी
प्रणाली अथवा समस्त अपराधमूलक देहात्मबुद्धिका
निषेध और नामको निरन्तर करनेकी विधि :-
(पद्यावलीके 20 वें अंकमें उद्धृत
शिक्षाष्टकका तीसरा श्लोक)-
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्त्तनीयः सदा हरिः ॥ 21 ॥
अनुवाद - जो अपनेको तृणसे भी छोटा मानते हैं,
जो वृक्षके समान सहनशील हैं, अपने लिये मानशून्य
हैं और दूसरोंको सम्मान प्रदान करते हैं, वे ही सदा
हरिकीर्तन करनेके अधिकारी हैं॥ 21 ॥
अनुभाष्य - आदिलीला 17/31 संख्या देखें ॥ 21 ॥
अमृताणुकणा-श्रीगौरसुन्दरके मुख-निस्रुत उपदेश
अथवा शिक्षाष्टक ब्रह्मसूत्र और श्रुतिमन्त्रसमूहके पल्लवित,
मञ्जरित और पुष्पित फलोंका उद्यान है। विचारणीय
शिक्षाश्लोकका प्रथम पाद 'तृणादपि सुनीचेन' महावाक्य
“अहं ब्रह्मास्मि"-श्रुतिमन्त्रके वास्तविक तात्पर्यका ही
ज्ञापन करता है। यद्यपि “अहं ब्रह्मास्मि” और 'तृणादपि
सुनीचेन' इन दो वाक्योंके मध्यमें परस्पर आपात विरोध
दिखलायी देता है, तथापि उनमें अति सुन्दर समन्वय
श्रीरूपानुग गौरजनोंकी कृपासे देखा जा सकता है।
'तृणादपि सुनीचेन' अर्थात् “अहं गोपीभर्तुः
पदकमलयोर्दासदासानुदासः” – यह विज्ञान ही स्वरूपज्ञान
अथवा सम्बन्ध-ज्ञान है, वही 'अहं ब्रह्मास्मि' मन्त्रका
परिस्फुट तात्पर्य है। मैं मायाशक्तिसे उत्पन्न जड़वस्तु
नहीं हूँ, जड़का भोक्ता नहीं हूँ, मैं चेतन हूँ-मैं स्वरूपसे
पूर्णचेतनकी ही आलिङ्गित वस्तु-उनकी क्रोड़ीभूत वस्तु
हूँ। जड़ वस्तुओंमें सबकी अपेक्षा क्षुद्र-अभिमान जो
तृणके भीतर सदा रहता है, मैं वह भी नहीं हूँ, तथापि
मैं केशके अग्रभागके दस हजारवें भागरूप अणुचेतनमय
स्वरूपको पृथक् करके रखूँगा, जिसके द्वारा जड़के साथ
समन्वय-चेष्टा कभी भी ना घटित हो। श्रुतियोंने
भूत-शुद्धिके लिये जो “अहं ब्रह्मास्मि" मन्त्र सिखलाया
है, उसने ही 'तृणादपि सुनीचेन' महावाक्यसे सौन्दर्य
प्राप्त किया है।
उक्त श्लोकके दूसरे पादका 'तरोरपि सहिष्णुना'
महावाक्य “तत्त्वमसि श्वेतकेतो” (छाः 6/8/7) अर्थात् 'हे
श्वेतकेतो, तुम वही हो'-यह श्रुति मन्त्रका परिव्यक्त
रूप है। जो परब्रह्मकी वस्तु या जो परब्रह्म-जातीय
वस्तु है, वह पार्थिव किसी क्षुद्र अवास्तव-वस्तुसे
असहिष्णु नहीं हो सकता। जड़वस्तु जड़के द्वारा क्षुब्ध
और लुब्ध होती है, तभी उसमें असहिष्णुता आ जाती
है। और चेतन वस्तु जड़से कुछ भी प्रतिदान नहीं
चाहती, केवल चेतनके निकट पुनः पुनः चेतनकी
वार्त्ताको ही वहन करती है।
शिक्षा श्लोकके तीसरे पादमें “अमानिना मानदेन",
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (छाः 3/14/1), “नेह नानास्ति
किञ्चन” (बृः 4/4/19, कठ 2/1/11) अर्थात् परिदृश्यमान
जगत् समस्त ही ब्रह्मसे अभिन्न है, ब्रह्मस्वरूपमें कोई
जड़़ीय भेद नहीं है-यही श्रुतिमन्त्रका ही परिवर्धित रूप
है। जो समस्त वस्तुओंमें परब्रह्मका अधिष्ठान दर्शन
करते हैं- “वासुदेवः सर्वमिति” (गीता 7/19), जो
ब्रह्मस्वरूपमें जड़भेद दर्शन नहीं करते हैं, वे सभी