श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2490, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 19/108-110 उन्नीसवाँ अध्याय 473
दूरीभूत एवं शरीर क्षीणत्वको प्राप्त हुआ है॥”9॥
सिन्धुपत्नी नदी सब, शुष्कनीर देखि' तब,
अरविन्द-शोभा नाइ आर।
कृशाङ्ग हयेछे तारा, निदाघे आनन्द-हारा,
सिन्धुसुख करे ना विस्तार॥
महिषीसकल दीना, शुष्कचित्त तनुक्षीणा,
मधुपति-प्रणय-रहित।
तोमरा कि सेइमत, तोयहीन शोभा-हत,
ताँर प्रेमदृष्टि-विवर्जित??9॥
[हे समुद्रपत्नी नदियों! हम देख रही हैं कि तुम्हारा
जल सूख गया है, उसमें कमलोंकी शोभा भी नहीं है,
तुम बहुत क्षीण हो गयी हो, तुम्हारा सम्पूर्ण आनन्द
दूर हो गया है और समुद्र तुम्हारे सुखका विस्तार नहीं
कर रहा है। मधुपतिके प्रणयसे रहित हम महिषियाँ
दीन, शुष्क-हृदय और क्षीण-देह हो गयी हैं, क्या
तुम्हारी भी इसी प्रकार जलरहित, शोभा-विहीन अवस्था
श्रीकृष्णकी प्रेमदृष्टिसे उपेक्षित होनेके कारण तो नहीं
है?]
“हंस स्वागतमास्यतां पिब पयो ब्रूह्यङ्ग शौरेः कथां
दूतं त्वां नु विदाम कच्चिदजितः स्वस्थ्यास्त उक्तं पुरा।
किंवा नश्चलसौहृदः स्मरति तं कस्माद्भजामो वयं
क्षौद्रालापय कामदं श्रियमृते सैवैकनिष्ठा स्त्रियाम्॥”10॥
“हे हंस, तुम्हारा सुखसे तो आगमन हुआ है ना?
अब तुम दुग्ध पान करो और श्रीकृष्णकी वार्त्ता
सुनाओ। हम तुम्हें उनका दूत ही जानती हैं। वे क्या
सुखसे हैं? हमारे पूर्वकालीन गोपनीय वचन क्या उन्हें
स्मरण हैं? हे क्षुद्रके दूत! हम किसलिये उनकी सेवा
करेंगी? यदि रतिके लिये वे हमारा आह्वान कर रहे
हैं, तो जो लक्ष्मी हमें वञ्चित करके अकेले उनकी
सेवा करती हैं, उन लक्ष्मीका त्याग करके केवलमात्र
उन कामप्रद प्रियतमको यहाँ लेकर आओ। यदि कहो,
लक्ष्मी उनके प्रति एकनिष्ठ चित्तवाली हैं, इसलिये
उनका परित्याग असम्भव है, तो क्या स्त्रियोंमें एकमात्र
वे ही एकनिष्ठ चित्तवाली हैं, हम क्या वैसी एकनिष्ठ
चित्तवाली नहीं हैं?॥”10॥
सुखे आसियाछ, हंस, एस समादरि।
कृष्णेर सन्देश बल, दुग्ध पान करि'॥
'कृष्णदूत' बलि' तोमा मोरा सदा जानि।
हरि किछु आमादेर बलियाछे वाणी??
सुखे त' आछेन कृष्ण?—जानिवारे चाइ।
आमादेर कथा कि ताँर मने किछु नाइ??
एका लक्ष्मी सेवे ताँरे, आमरा-किङ्करी।
अ-कामद-वाक्यव्ययि-जने किसे वरि??10॥
[हे हंस! तुम सुखपूर्वक आये हो ना, आओ,
तुम्हारा समादर है। तुम दूध पीकर श्रीकृष्णका सन्देश
सुनाओ। हम सदा तुम्हें 'कृष्णदूत'के रूपमें ही जानती
हैं। कृष्ण सुखपूर्वक तो हैं ना? क्या हरिने हमारे लिये
कुछ कहा है?—हम जानना चाहती हैं। क्या वे हमारे
विषयमें कुछ स्मरण नहीं करते हैं? क्या लक्ष्मी अकेले
ही उनकी सेवा करती है, हम भी तो उनकी दासियाँ
हैं। जो केवल मुखसे ही बोलते हैं, किन्तु कभी हमारी
कामनाओंको पूर्ण नहीं करते, हम उन कृष्णको कैसे
वरण कर सकती हैं?]॥108॥
उन्नीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
गुरु (श्रीनित्यानन्द)-गौराङ्ग-सेवकोंकी कृपाके
बलसे ही महाप्रभुकी अप्राकृत विप्रलम्भमयी
लीलामें विश्वासका उदय :—
महाप्रभु-नित्यानन्द, दोहार दासेर दास।
यारे कृपा करेन, तार हय इथे विश्वास॥109॥
अनुवाद—महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु—इन दोनोंके
दासोंके दास जिसपर कृपा करते हैं, उसीका महाप्रभुकी
अप्राकृत विप्रलम्भमयी लीलामें विश्वास होता है॥109॥
महाप्रभुके श्रीकृष्णविरहमें उत्पन्न विप्रलम्भ-भावके
अनुसरणसे ही अनर्थनिवृत्ति और श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :—
श्रद्धा करि' शुन इहा, शुनिते महासुख।
खण्डिबे आध्यात्मिकादि सकल-दुःख॥110॥
अनुवाद—इन लीलाओंको श्रद्धापूर्वक सुननेसे