श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें410 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/107-115 ]
अलौकिक प्रसादके आस्वादनसे सभीका विस्मय :-
प्रसादेर सौरभ्य-माधुर्य करि' आस्वादन।
अलौकिक आस्वादे सबार विस्मय हैल मन ॥ 107 ॥
अनुवाद-प्रसादकी सुगन्ध और मधुरताका आस्वादन
करके उसके अलौकिक स्वादसे उनके मनमें बड़ा
आश्चर्य हुआ ॥ 107 ॥
महाप्रभुके द्वारा बद्धजीवके प्राकृत भोग्य-द्रव्य और
श्रीकृष्णके चित्-इन्द्रिय-भोग्य अप्राकृत चित्-उपकरण
नैवेद्यमें गुण-भेदका वर्णन :-
प्रभु कहे,—“एइ सब हय प्राकृत द्रव्य।
ऐक्षव, कर्पूर, मरिच, एलाइच, लवङ्ग, गव्य ॥ 108 ॥
रसवास, गुड़त्वक-आदि यत सब।
'प्राकृत' वस्तुर स्वाद सबार अनुभव ॥ 109 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,–“गुड़, कर्पूर, काली मिर्च,
इलाइची, लौंग, घी, सुगन्धित रसयुक्त इलायची और
दालचीनी आदि सब द्रव्य तो प्राकृत हैं। सभीको ही
प्राकृत-वस्तुओंके स्वादका अनुभव है ॥ 108-109 ॥
अनुभाष्य–'ऐक्षव',-गन्नेसे बना गुड़ अथवा चीनी;
'गव्य'-दूध, घी आदि ॥ 108 ॥
अनुभाष्य- 'रसवास',-सुगन्ध और रसयुक्त इलायची
और लौंग; 'गुड़त्वक',-दालचीनी; 'प्राकृत',-बद्धजीवके
स्व-सुख-विधानकी इच्छापर आधारित जो सब वस्तुएँ
उनकी इन्द्रियोंके भोगके लिये हैं, – वे सब खण्ड
(अपूर्ण), सीमित, नश्वर अथवा कालके साथ नष्ट
होनेवाले जड़ीय द्रव्य हैं ॥ 109 ॥
एइ द्रव्ये एत आस्वाद, गन्ध लोकातीत।
आस्वाद करिया देख, – सबार प्रतीत ॥ 110 ॥
श्रीकृष्णके उच्छिष्ट महाप्रसादका चिद्बल :-
आस्वाद दूरे रहु, गन्धे माते मन।
आपना बिना अन्य माधुर्य कराय विस्मरण ॥ 111 ॥
श्रीकृष्णके अधरके स्पर्शकी महिमा :-
ताते एइ द्रव्ये कृष्णाधरस्पर्श हैल।
अधरेर गुण सब इहाते सञ्चारिल ॥ 112 ॥
श्रीकृष्णके ओष्ठसे स्पर्श हुए चित्-उपकरण-
भक्तोंकी चित्-इन्द्रियोंके उन्मादक :-
अलौकिक-गन्ध-स्वाद अन्य-विस्मारण।
महा-मादक हय एइ कृष्णाधरेर गुण ॥ 113 ॥
सभीको अप्राकृत श्रद्धाके साथ
प्रसादका सम्मान करनेका आदेश :-
अनेक 'सुकृते' इहा हञाछे सम्प्राप्ति।
सबे एइ आस्वाद कर करि' महाभक्ति ॥”114 ॥
अनुवाद-किन्तु इन्हीं (प्राकृत) द्रव्योंसे युक्त
श्रीजगन्नाथके प्रसादका ऐसा अद्भुत स्वाद और अलौकिक
सुगन्ध है। इसका आस्वादन करके देखो, आपको स्वयं
ही इस बातका अनुभव होगा। इस प्रसादके आस्वादनकी
बात तो दूर रहे, इसकी सुगन्धसे ही मन मतवाला हो
जाता है। यह प्रसाद अपने अतिरिक्त अन्य सब
वस्तुओंकी मधुरताको सम्पूर्ण रूपमें भुला देता है।
इसीसे प्रमाणित होता है कि इन द्रव्योंसे श्रीकृष्णके
अधरोंका स्पर्श हुआ है और श्रीकृष्णके अधरोंके
समस्त गुण इस प्रसादमें सञ्चारित हो गये हैं।
अलौकिक सुगन्ध और स्वादका महा-मादक होना जो
अन्य वस्तुओंके स्वादको विस्मृत करवा दे, वास्तवमें
वह श्रीकृष्णके अधरोंका ही गुण है। अनेक सुकृतियोंके
फलसे इस गोपाल-वल्लभ महाप्रसादकी प्राप्ति हुई है।
आप सभी महा-भक्तिपूर्वक इस प्रसादका आस्वादन
करो॥”110-114 ॥
श्रीकृष्णके अधरामृतके आस्वादनसे सभीमें प्रेमावेश :-
हरिध्वनि करि' सबे कैला आस्वादन।
आस्वादिते प्रेमे मत्त हइल सबार मन ॥ 115 ॥
अनुवाद-उच्च स्वरसे हरिध्वनि करते हुए सभीने
उस प्रसादका आस्वादन किया। प्रसादका आस्वादन
करते ही सभी भक्तोंका मन प्रेममें मत्त हो उठा ॥ 115 ॥