श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2390, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 14/120–123 चौदहवाँ अध्याय 373
'व्रजमें गोवर्धन गिरिराजका दर्शन करूँगा' ऐसा कहकर
महाप्रभु द्रुतगतिसे चलने लगे। वैष्णवोंसे घिरे वे
गौराङ्गदेव मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त कर रहे
हैं॥ 120 ॥
चौदहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—
नीलाद्रेः (नीलाचलस्य) समीपे (निकटे) चटक-गिरिराजस्य
(सैकतस्तूपरूप-पर्वतस्य) कलनात् (ईक्षणात्) अये इतः (क्षेत्रात्)
गोष्ठे गोवर्धनगिरिपतिं लोकितुं (द्रष्टुं) व्रजन् अस्मि (व्रजामि)
इति उक्त्वा प्रमदः (प्रमत्तः) इव धावन् स्वैः गणैः (स्वरूपादिभिः)
अवधृतः (पश्चादनुसृतः), स गौराङ्गः मम हृदये उदयन् मां
मदयति (आनन्दयति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 120 ॥
चौदहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभुकी अलौकिक लीला :—
एबे प्रभु यत कैला अलौकिक-लीला।
के बुझिते पारे सेइ महाप्रभुर खेला ?? 121 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने जिन समस्त अलौकिक लीलाओंको
प्रकाशित किया, महाप्रभुकी उन लीलाओंको कौन
समझ सकता है ? 121 ॥
महाप्रभुके श्रीकृष्णविरहके अनुसरणमें ही
जीवको श्रीकृष्णचरणोंकी प्राप्ति :—
संक्षेपे कहिया करि दिक् दरशन।
येइ इहा शुने, पाय कृष्णेर चरण॥ 122 ॥
अनुवाद—मैं महाप्रभुकी लीलाओंको संक्षेपमें वर्णन
करके केवल दिग्दर्शन ही करवा रहा हूँ। जो कोई भी
महाप्रभुकी इन लीलाओंका श्रवण करता है, उसे
श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है॥ 122 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 123 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे
चटकगिरि-गमनरूप-दिव्योन्मादवर्णनं नाम चतुर्दशः परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है॥ 123 ॥
त्यखण्डमें चटकगिरि-गमनरूप-
दिव्योन्माद-वर्णन नामक चौदहवें अध्यायका अनुवाद
समाप्त।