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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2388, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2388

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[ 14/105–116 चौदहवाँ अध्याय 371
श्रीराधाकी दासीके अभिमानमें महाप्रभुके
द्वारा अपनी अवस्थाका वर्णन :-
“गोवर्धन हैते मोरे के इँहा आनिल?
पाञा कृष्णेर लीला देखिते ना पाइल॥ 105 ॥
इँहा हैते आजि मुइ गेनु गोवर्धने।
देखों,–यदि कृष्ण करेन गोधन-चारणे॥ 106 ॥
गोवर्धने चड़ि’ कृष्ण बाजाइला वेणु।
गोवर्धनेर चौदिके चरे सब धेनु॥ 107 ॥
वेणुनाद शुनि’ आइला राधाठाकुराणी।
सब सखीगण-सङ्गे करिया साजनि॥ 108 ॥
अनुवाद—“मुझे गोवर्धनसे यहाँपर कौन लाया ? मैं
श्रीकृष्णकी लीलाको देख रहा था, परन्तु अब उसे देख
नहीं पा रहा हूँ। आज मैं यहाँसे गोवर्धन यह देखने
गया था कि क्या वहाँ श्रीकृष्ण गौओंको चरा रहे हैं?
मैंने देखा कि श्रीकृष्ण गोवर्धनपर चढ़कर वेणु बजा रहे
हैं और गोवर्धनके चारों ओर गायें चर रही हैं। वेणुकी
ध्वनिको सुनकर श्रीराधा ठाकुराणी और उनके साथ
सब सखियाँ सजकर वहाँ आ गयीं॥ 105-108 ॥
अनुभाष्य—‘करिया साजनि’,–सजकर ॥ 108 ॥
राधा लञा कृष्ण प्रवेशिला कन्दराते।
सखीगण चाहे কেহ फुल उठाइते॥ 109 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण श्रीराधाको साथ लेकर एक
गुफामें प्रवेश कर गये। उन सखियोंने पुष्प चयन करते
समय उन्हें गुफामें प्रवेश करते देखा ॥ 109 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘कन्दराते’,–गुफामें ॥ 109 ॥
हेनकाले तुमि-सब कोलाहल कैला।
ताँहा हैते धरि’ मोरे इँहा लञा आइला॥ 110 ॥
श्रीकृष्णसङ्गसे वञ्चित महाप्रभुका
क्रन्दन, भक्तोंका भी क्रन्दन :-
केने वा आनिला मोरे वृथा दुःख दिते।
पाञा कृष्णेर लीला, ना पाइनु देखिते!!” 111 ॥
अनुवाद—तभी तुम सबने कोलाहल मचा दिया
और वहाँसे पकड़कर मुझे यहाँ ले आये। आप लोग
मुझे वृथा दुःख देनेके लिये यहाँ क्यों ले आये?
श्रीकृष्णकी लीलाको देखनेका अवसर प्राप्त करके भी
मैं उसे देख नहीं पाया ॥” 110-111 ॥
एत बलि’ महाप्रभु करेन क्रन्दन।
ताँर दशा देखि’ वैष्णव करेन रोदन ॥ 112 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु क्रन्दन करने लगे।
उनकी ऐसी दशाको देखकर सभी वैष्णव भी रोने
लगे॥ 112 ॥
महाप्रभुका बाह्यदशामें मर्यादा-प्रदर्शन :-
हेनकाले आइला पुरी, भारती,–दुइजन।
दुँहे देखि’ महाप्रभु हइल सम्भ्रम ॥ 113 ॥
अनुवाद—उसी समय वहाँपर श्रीपरमानन्द पुरी
और श्रीब्रह्मानन्द भारती आ गये। उन दोनोंको देखकर
महाप्रभुमें सम्भ्रम भाव आ गया ॥ 113 ॥
निपट्ट-बाह्य हइले प्रभु दुँहारे वन्दिला।
महाप्रभुरे दुइजन प्रेमालिङ्गन कैला ॥ 114 ॥
अनुवाद—सम्पूर्ण बाह्यदशामें आनेपर महाप्रभुने उन
दोनोंकी वन्दना की। तब उन दोनोंने महाप्रभुको
प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया ॥ 114 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘निपट्ट-बाह्य हइले’,–अनाच्छादित
बाह्य अर्थात् सम्पूर्ण बाह्यदशामें आनेपर ॥ 114 ॥
महाप्रभुके द्वारा उनके आगमनके कारणकी
जिज्ञासा और पुरीका उत्तर :-
प्रभु कहे,—“दुँहे केने आइला एत दूरे?”
पुरीगोसाञि कहे,—“तोमार नृत्य देखिबारे॥” 115 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“आप दोनों इतनी दूर
किसलिये आये हैं?” श्रीपरमानन्दपुरी गोस्वामीने कहा,—“हम