श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 14/70-77 चौदहवाँ अध्याय 367
करने लगे ॥ ६९ ॥
महाप्रभुका बाह्यदशामें आना :-
बहुक्षणे कृष्णनाम हृदये पशिला।
'हरिबोल' बलि' प्रभु गर्जिया उठिला ॥ ७० ॥
अनुवाद-उनके द्वारा बहुत देर तक कृष्णनाम
करनेके पश्चात् वह महाप्रभुके हृदयमें प्रविष्ट हो गया,
तब महाप्रभु 'हरिबोल' बोलकर गर्जन करते हुए
उठे॥ ७० ॥
चेतन पाइते अस्थि-सन्धि लागिल।
पूर्वप्राय यथावत् शरीर हइल ॥ ७१ ॥
अनुवाद-महाप्रभुमें चेतनता आनेपर उनकी अस्थियोंके
जोड़ जुड़ गये और उनकी देह पहले जैसी हो
गयी ॥ ७१ ॥
श्रीरघुनाथके द्वारा अपने ग्रन्थमें इस वृत्तान्तका वर्णन :-
एइ लीला महाप्रभुर रघुनाथदास।
'चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे' करियाछे प्रकाश ॥ ७२ ॥
अनुवाद-महाप्रभुकी ऐसी लीलाको श्रीरघुनाथ दास
गोस्वामीने स्वरचित 'चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष'में प्रकाशित
किया है॥ ७२ ॥
काशीमिश्रके घरमें कृष्णविरहग्रस्त महाप्रभुकी दशा :-
स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका चतुर्थ श्लोक-
क्वचिन्मिश्रावासे व्रजपतिसुतस्योरुविरहात्
श्लथच्छ्रीसन्धित्वादधदधिकदैर्घ्यं भुजपदोः।
लुठन् भूमौ काक्वा विकलविकलं गद्गदवचा
रुदन् श्रीगौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥ ७३ ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ७३ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-किसी समय श्रीकाशीमिश्रके
घरमें श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुके समस्त जोड़ खुल गये,
जिससे उनके हाथ और पैर बहुत लम्बे हो गये।
भूमिपर काकुस्वरमें व्याकुल होकर गद्गद वचन बोलते
हुए लोट-पोट खाते-खाते रोनेवाले वे गौराङ्ग मेरे
हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त कर रहे हैं ॥ ७३ ॥
अनुभाष्य-
क्वचित् मिश्रावासे (काशीमिश्रगृहे) व्रजपतिसुतस्य (नन्दनन्दनस्य)
उरुविरहात् (अत्यन्तविच्छेदात्) श्लथच्छ्रीसन्धित्वात् (श्लथन्
निजनिजाश्रयं त्यजन् श्रीः शोभा सन्धिश्च ययोः) भुजपदोः
(बाहुचरणयोः) अधिकदैर्घ्यं दधत् (धारयन्) भूमौ लुठन्
काक्वा (कातरया वाण्या) गद्गदवचा विकल-विकलम्
(अतिशयेन विकलं) रुदन् सः गौराङ्गः मम हृदये उदयन्
(प्रकटयन्) सन् मां मदयति (हर्षयति)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ७३ ॥
अर्द्धबाह्यदशामें महाप्रभुके द्वारा लोगोंके
एकत्रित होनेके कारणकी जिज्ञासा :-
सिंहद्वारे देखि' प्रभुर विस्मय हइला।
“क्या कर, किवा”-एइ स्वरूपे पुछिला ॥ ७४ ॥
अनुवाद-स्वयंको सिंहद्वारपर देखकर महाप्रभुको
बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरसे
पूछा,-“तुम लोग क्या कर रहे हो और क्यों कर रहे
हो?" ७४ ॥
अनुभाष्य-'क्या कर, किवा', -क्या कर रहे हो,
क्यों ॥ ७४ ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुको घरमें लाना
और सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन :-
स्वरूप कहे,-“उठ, प्रभु, चल निज-घरे।
तथाइ तोमारे सब करिमु गोचरे ॥ "७५ ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-“हे महाप्रभु !
उठिये, अपने वासस्थानपर चलिये। वहींपर मैं आपको
यह सब बतलाऊँगा ॥ "७५ ॥
एत बलि' प्रभुरे धरि' घरे लञा गेला।
ताँहार अवस्था सब कहिते लागिला ॥ ७६ ॥
अनुवाद-यह कहकर श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुको